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परमसत्य की खोज...10 ( Discovery of the absolute truth ... 10)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...10 11 दिसम्बर 2003 जाग्रति में भी सत्य, स्वप्न में भी सत्य, शब्द में भी सत्य, विचारों में भी सत्य, श्वासों में भी सत्य, सत्य ही सत्य। मैं समग्र रूप से सत्य हो गया हूँ। असत्य मेरे जीवन से पलायन कर चुका है। इस अवस्था तक आने के लिए मुझे बहुत कड़ा संघर्ष करना पड़ा, बहुत कुछ त्याग करना पड़ा, लेकिन वह त्याग कुछ भी नहीं इसके आगे, जो मुझे मिला है। अब मेरा जीवन पूर्णतः सत्य है। -8:13 a.m. अक्सर मेरे चिंतन के विषय अगले दिन अख़बार में लेखों में ढले हुए आते हैं। ये बात टेलीपथी (मनः संचार) को दृढ़ करती है। -9:05 a.m. अब मेरी अनुभूतियों गूंगी हो रही है, मेरे अनुभव निःशब्द हो रहे हैं, मेरी अभिव्यक्ति मौन हो रही है। कमजोरियों के हाथों खुद को सौंपना (कमजोरियों के गुलाम बनना) कमजोरियों को स्वीकार करना नहीं है बल्कि अपने पौरुष को अस्वीकार करना है। -9:40 a.m. बच्चों से घृणा नहीं, प्रेम किया जाता है। अब मेरा ज्ञान इस स्तर तक आ पहुंचा है कि अज्ञान से प्रेम करने लगे। -11:10 a.m. अज्ञान में इतना आकर्षण क्यों है? ज्ञान के पथ पर इतना विकर्षण क्यों है? ...