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Showing posts from May, 2020

कौन देगा जवाब...? (Who will answer...?)

अंतर्यात्रा कौन देगा जवाब... ? क्या ये वही भारत है , जिसे पुण्यभूमि कहा जाता है ? क्या ये वही भारत है , जहाँ देवताओं ने जन्म लिया ? क्या ये वही भारत है , जहाँ नारी को मातृशक्ति के रूप में पूजा जाता है ? क्या ये वही भारत है जिस पर विवेकानंद , गांधी , टैगोर और नेहरू जैसे लोगों को नाज़ था ? क्या ये वही भारत है , जहाँ गौतम , नानक और महावीर जैसे महापुरुषों ने मोक्ष प्राप्त किया ? क्या ये वही भारत है जिसकी देव संस्कृति को अपनाने के लिए विदेशी यहाँ खिंचे चले आते हैं ? अगर हाँ! तो फिर कहाँ सोए पड़े हैं आज वो देवता ? कहाँ सोया पड़ा है वो सर्वशक्तिमान ईश्वर ? क्या यही है गांधी और विवेकानंद के सपनों का भारत ? क्या यही है वो भारत , जहाँ गुवाहाटी-दादर एक्सप्रेस में वह वहशियाना कुकृत्य हुआ ? जहाँ एक मासूम लड़की की इज्जत से वहशत ने नंगा खेल खेला ? क्या ये वही भारत है , जहाँ कई आदमी मिलकर दो घंटे तक दरिंदगी की तमाम हदें पर करते रहे ? क्या ये वही भारत है , जहाँ कुछ लोग मानवता के चेहरे पर कालिख मलते रहे ? क्या उन्हें उस मासूम के चेहरे में अपनी माँ , बहन या बेटी नजर नहीं आई ? क्या उनकी आत्मा न...

पृष्ठभूमि... (Background...)

आज के योगी की आत्मकथा भाग - दो ( अंतर्यात्रा) पृष्ठभूमि... अपने और उस तीसरी अज्ञात शक्ति (प्रकृति या ईश्वर ?) के अस्तित्व को जानने के प्रश्न तो बहुत अल्पायु से ही उठते रहे मेरे मन में , पर इन प्रश्नों को सही दिशा नहीं मिल पाई और मैं भटकता रहा किताबों में , मंदिरों में , पाषाण-प्रतिमाओं में , उस परम शक्ति को जानने के लिए। कभी-कभी *मर्कट (क्षणिक) वैराग्य भी उत्पन्न हो जाता था , जो थोड़ी देर में चला भी जाता था और मैं इसी दुनिया में रमकर रह जाता था। मेरे प्रश्नो और मेरे प्रयासों ने सही दिशा और सही प्रबलता पाई गुवाहाटी-दादर एक्सप्रेस में हुए उस पैशाचिक कृत्य और उसके बाद हुए नर-संहार से। वहां हुए अन्याय और अत्याचार ने मेरे भावुक मन को झिंझोड़ कर रख दिया , मेरे अस्तित्व को हिलाकर रख दिया। और मेरे प्रश्न जहरीले बाण बन गए जो मुझे हर समय छेदते रहे और मेरे घावों को कुरेद-कुरेद कर गहरा करते रहे। उस पर ईश्वर के अस्तित्व के प्रश्न ने इन घावों पर तेजाब का काम किया और मैं छटपटा उठा , बिलबिला उठा , व्याकुल हो उठा। मेरे मन ने उसी समय से इस झूठे ईश्वर के अस्तित्व को मानने से इंकार कर दिया। मेरा ...

अंतर्यात्रा (Adventure of the truth)

आज के योगी की आत्मकथा भाग - दो ( अंतर्यात्रा) एक दृष्टि... ये सारे उपदेश मैंने स्वयं को दिए हैं। यदि आपको लगता है कि इसका अंशमात्र भी आपके कुछ काम आया तो मैं धन्य हुआ , मेरा जीवन कृतार्थ हुआ... जिनमे सत्य का साक्षात्कार करने का साहस है , जो सत्य को साहस पूर्वक स्वीकार कर सकते हैं , वे ही इसे पढ़ें , झूठे और फरेबी लोग इसके पृष्ठ न ही खोलें तो उचित होगा , उनके लिए ये मृत शब्द हैं और कुछ नहीं। अपने सांचे में ढालने के बाद ही तुम सच जान पाओगे , अनुभव कर पाओगे , लेकिन सावधान! सांचे के अंदर बेईमानी की राख न हो।    ये विचार एक गहन और गंभीर प्रयोग के परिणाम हैं। जिन्हे आप तभी समझ सकते हैं , जब ये प्रयोग आप भी कर के देखें। तर्क नहीं , अवलोकन ही है एकमात्र मार्ग सत्य का। ' आपके भीतर क्या चल रहा है , इसका हर समय अवलोकन करना ही आत्म-अवलोकन है। ' यदि इसे पढ़ने के बाद आपके अंदर प्रश्न नहीं उठें तो समझियेगा कि आपने ठीक से पढ़ा ही नहीं। ये मेरा धर्मग्रन्थ नहीं कर्मग्रन्थ है। इसे पढ़ने के बाद यदि आपके भीतर उदासी का तूफ़ान उठता है तो समझिए कि आप भी सत्य को पाने के लिए उत्सुक हैं। ...

ज्ञान...काम का रूपांतरण... (Knowledge... the conversion of sexual desires...)

ज्ञान...काम का रूपांतरण...  ज्ञान के राजमार्ग पर पहुंचने से पहले काम की संकीर्ण पुलिया से होकर गुजरना पड़ता है। जो काम की इस संकीर्ण पुलिया को अपना संतुलन बनाकर पार कर लेते हैं, वे ही ज्ञान के राजमार्ग पर चलने के अधिकारी होते हैं। यदि व्यक्ति अपने भीतर के काम को ज्ञान में रूपांतरित कर उसका उपयोग रचनात्मक एवं सृजनात्मक कार्यों में करता है तो वह कामरूपी संकीर्ण पुलिया में फंसने के बावजूद संघर्ष करके इससे बाहर निकल आता है अन्यथा जीवन भर इसी में फंसा रहता है। व्यावहारिक लोग कहते हैं कि काम के उपभोग के बिना जीवन संभव नहीं अर्थात विवाह के बिना जीवन कठिन हो जाता है। यह सत्य है कि काम के उपभोग के बिना जीवन व्यतीत करना बड़ा ही जटिल है परन्तु यह आवश्यक नहीं की काम का उपभोग केवल दाम्पत्य जीवन में ही किया जाए। काम का उपभोग रचनात्मक एवं सृजनात्मक कार्यों में भी किया जा सकता है। काम एक बहुत बड़ी शक्ति है। इसका ज्ञान में रूपांतरण ज्ञान के नए आयामों को जन्म देता है। अध्यात्म, विज्ञान और साहित्य में नित नई खोजें और नए रहस्य इसी के उदाहरण हैं। -११ नवंबर २००३ आपसे ईर्ष्या करने वाला आपकी नफर...

वियोग का योग... (Sum of the separation...)

वियोग का योग... वियोग ही शाश्वत है, मिलन क्षणिक है। मिलन के आनंद की कल्पना असंभव है विरह के दर्द के बिना। मिलन की एकरसता बहुत जल्दी उबाऊ बन जाती है। वह वियोग ही है जिसके क्षणों में प्रेमी प्रेमास्पद से एकाकार हो जाता है और अपने अस्तित्व को उसके अस्तित्व में विलीन कर देता है। वह वियोग की ही पीड़ा है जिसकी भट्टी में तपकर भक्त ईश्वर को पा लेता है।   देखने वाले को विरह एक पीड़ा प्रतीत होती है, एक वेदना प्रतीत होती है पर वास्तव में इस वेदना में वही आनंद छुपा होता है जो प्रसव वेदना में होता है। प्रेम में शारीरिक मिलन अथवा भौतिक मिलन का उतना महत्त्व नहीं है जितना कि उन अनुभूतियों का है, जो कि वियोग के क्षणों में होती है। ये अनुभूतियाँ व्यक्ति को सरलहृदयता और निष्कपटता की ओर प्रेरित करती हैं। इन अनुभूतियों के बिना प्रेम की कल्पना ही असंभव है। वियोग ही प्रेम की संकीर्णता को विस्तीर्णता   में बदल सकता है। जब प्रेम कुछ पाना चाहता है तब वह संकुचित   होने लगता है और संकुचित होकर वासना में परिवर्तित होने लगता है पर जब प्रेम सब कुछ लुटाना चाहता है तब वह विस्तारित होने लगता है।...

प्रेरणा (Inspiration)

प्रेरणा *           दृश्य तो सभी देखते हैं, अ दृश्य को देखने की कोशिश करो.           शब्द तो सभी सुनते हैं, मौन को सुनने की कोशिश करो.           उत्तर तो सभी जानने की कोशिश करते हैं, प्रश्न को जानने की कोशिश करो वही उत्तर बन जाएगा.           संभव तो सभी करते हैं, असंभव को करने की कोशिश करो.           स्वार्थी बनो, परम-स्वार्थी बनो, तभी तुम परमार्थ कर पाओगे। जब तक तुम ‘स्व’का अर्थ नहीं समझ लेते तब तक ‘पर’का अर्थ भी नहीं समझ सकते। स्वयं में डूब जाओ, स्वयं की गहराइयों को खंगालो, स्व के अंदर डूब कर अर्थ का मोती निकाल लो फिर तुम संसार के सबसे धनवान व्यक्ति हो जाओगे, जिसकी संपदा को कोई नहीं लूट सकेगा और जो दोनो हाथों से लुटाने पर भी बढ़ती ही जाएगी।           स्वप्न को संभावनाओं में बदलो और संभावनाओं को आकांक्षाओं में और आकांक्षाओं को आका...

मन के हारे हार है... (The losers have lost their mind...)

मन के हारे हार है... हमारा मन एक ज़िद्दी बच्चे की तरह चंचल होता है, जो कहीं भी मचल जाता है। जो इसकी हर जायज-नाजायज मांग को मानकर इसे उन्मुक्त बनाते हैं, वे अस्थिर प्रवृत्ति के हो जाते हैं।   उनके अंदर भोग-लिप्सा जागने लगती है,जिससे उनका चारित्रिक पतन होने लगता है। जो इसकी हर बात न मानकर अपने विवेक से उचित-अनुचित का निर्णय कर इसे अपने वश में कर लेते हैं वे कालजयी हो जाते हैं और मन को काबू में करने की सबसे पहली सीढ़ी है - स्वादेंद्रिय पर नियंत्रण। आवश्यकता से अधिक और ज्यादा स्वादिष्ट भोजन आलस्य और प्रमाद को जन्म देता है। हमारे अंदर काम-वासना को जगाता है इसलिए हमारे धर्म-ग्रंथों में उपवास पर अधिक जोर दिया गया है। -२२ नवंबर २००२ कायरता भरे जीवन से साहसपूर्ण मौत अच्छी। -२५ नवंबर २००२ यदि इस दुनिया में कोई सबसे बड़ा पाप है तो वो है किसी की मजबूरी का फायदा उठाना... -३० जनवरी २००३   आदमी अपनी हीनता को छिपाने के लिए ही झूठे और बाहरी आडम्बर को ओढ़ता है। -१६ मई २००३ सामान्यतः व्यक्ति अपनी गलतियों को अपना कौशल और अपनी असफलताओं तथा अक्षमताओं को अपना त्याग सिद्ध करना चा...

सपनों का मनोविज्ञान... (Psychology of Dreams...)

सपनों का मनोविज्ञान... ·                      सपने वो सच होते हैं जो अक्सर सच नहीं हो पाते। सपने ज़िन्दगी की हकीकत का आइना होते हैं। सपने हमारी मनःस्थितियों को प्रदर्शित करते हैं, हमारी कमजोरियों को दर्शाते हैं। कभी-कभी तो ये उन परिस्थितियों को व्यक्त करते हैं जिनसे जूझने का हम साहस नहीं जुटा पाते। ·                      सपने एक प्रकार से हमारे अंदर की मानसिक भूख और प्यास को अभिव्यक्त करते हैं, जिन्हे हम पूरा करने की कोशिश करते हैं या पूरा करने की इच्छा रखते हैं। इनका सम्बन्ध बहुत कुछ शारीरिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। ·                      वास्तव में सपने हमारी उन वर्तमान मानसिक परिस्थितियों को भी दिखाते है, जिनसे हम इंकार करते हैं, जिन्हे हम नकारना चाहते हैं या जिनको हम झ...

फरेब-ए-वफ़ा... ज़िंदगी... (Life... The deceit of dedication)

फरेब-ए-वफ़ा... ज़िंदगी... ऐ ज़िंदगी! तूने मेरे साथ कैसे-कैसे खेल खेले हैं? जिस पर यकीन किया, वो दग़ा दे गया और जिस पर यकीन नहीं किया, जिसको अपनी ज़िंदगी से दूर करने की कोशिश करता रहा... जिससे दूर भागता रहा...वही मसीहा निकला... उसी ने मेरे ज़ख्म सहलाए...वही हमदर्द निकला... उसकी दर्द में डूबी हुई फ़रियाद को मैं नफरत और बदले की आग समझता रहा... उसके आंसुओं के सैलाब को मैं झूठ और फरेब समझता रहा...   हाय री अक्ल! मुझे तुझ पर कितना नाज़ था... मुझे तुझ पर बदगुमानी थी...जहाँ खुद को जोड़ना चाहा, वहां से तूने तोड़ दिया और जहाँ से टूटना चाहा, वहां इस कदर बाँध दिया कि जिंदगी भर कोशिश करूँ तो भी उन नाजुक जज्बाती रिश्तों से खुद को अलग नहीं कर सकता... ऐ ज़िंदगी! बता ये तेरे कैसे खेल हैं..? उम्र को दांव पर लगा कर भी तेरे दांव समझ नहीं पाया...जीत मिली तो हार के सदमे ग़म के समंदर में डुबोते रहे... ऐ ज़िंदगी! बता, ये तेरे कैसे खेल हैं..? झूठी उम्मीदों के सहारे उम्र कटती रही... और मैं खुद को पराई आस पर बहलाता रहा... अब तो तूने ख्वाबों की सिपर (ढाल) भी डाल दी है... हक़ीक़त के जहर बुझे खंजर आते हैं, यादों ...

वो... अजीब सा शख्स... (That strange man...)

वो ... अजीब सा शख्स ... अदम्य साहस !! गजब का आत्मविश्वास !! अद्भुत धैर्य !! विलक्षण सोच और समझ !! और थोड़ी सी बेवकूफी भरी लापरवाही !! हाँ ! यही सब कुछ है उसके व्यक्तित्व में , जो उसके चेहरे से कभी जाहिर नहीं होता। निराशाओं और सफलताओं की खिल्ली बनाकर उड़ा देना उसकी आदत है और आशाओं को घोलकर पी जाना उसका जूनून !! वह एक अजेय योद्धा है , जिसे शायद कोई नहीं हरा सकता। हाँ ! शायद मौत और किस्मत भी नहीं क्योंकि अपनी किस्मत वह खुद लिखता है। असफलताओं के कचरे के ढेर में से सफलताओं के हीरे चुनने का हुनर उसको आता है। किस्मत उसके साथ पतंग के संग डोर की तरह चलती है। सफलताएं उसके क़दमों तक शॉर्टकट ढूंढते हुए चली आती हैं। वो हकीकत में क्या है , ये तो मुझे इतना ही मालूम है लेकिन वो आगे क्या होगा ये मुझे नहीं मालूम। उसके व्यक्तित्व में नेपोलियन भी छिपा है , सिकंदर भी और हिटलर भी। शायद आपने ऐसे आदमी देखे न हों लेकिन यकीन मानिए ! ऐसे आदमी होते त...