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Showing posts from February, 2020

एक तलाश (A search...)

एक तलाश सुबह हुई... दुनिया जागी... परिंदों ने अपने घोंसले छोड़ दिए... अपने दाना-पानी की तलाश में... और शुरू हुआ एक अनजाना सफर... एक अनजाना भटकाव... मैं भी निकला...  एक अनजाने सफर पर ... एक अनजाने भटकाव में ... फर्क सिर्फ इतना था कि परिंदे जानते थे की उनके भटकाव का मकसद क्या है ... मगर मैं अब तक अपने भटकाव का मकसद नहीं जान पाया ... अपनी भूख और प्यास को नहीं समझ पाया ... और फिर भी शुरू हो गई एक तलाश, ज़िंदगी के भटकाव में ... हाँ, सच है, ज़िंदगी एक भटकाव है ... एक अनजाना सफर है ... पर कौन जाने, कहाँ ख़त्म हो ... कितनी सदियों की मरीचिका है ... और कितनी सदियों तक यूँ ही चलती रहेगी ... कस्तूरी मृग नहीं जानता कि ये खुशबू उसी के अंदर छिपी है ... पर मैं जानता हूँ कि ये खुशबू मेरे ही अंदर बसी है ... लेकिन बाहर की राहें ढूंढना आसान है ... पर अपने भीतर की राह ढूंढना मुश्किल है ... पर फिर भी जारी है... एक तलाश ... - २७ अप्रैल २००२  A search...   Morning occurred ... T...

सरग़ोशी...( Whisper...)

जो भ्रम में जीते हैं, उनका वर्तमान सुखद और संतोषजनक होता है परन्तु जो भ्रम की परिधियों को तोड़कर सत्य का साक्षात्कार करना चाहते हैं, उनका वर्तमान सदैव दुखद और असंतोषजनक होता है... -२१ अप्रैल २००२ सत्य को कसौटियों पर तो उतरना ही पड़ता है। -२५ अप्रैल २००२ सरग़ोशी ... हवा आई... धीरे से परदा हिलाया... और मेरे कानों को छूती हुई निकल गई... शायद कुछ कानाफूसी कर गई... मैं सोचता रहा... शायद किसी   के एहसास की छुअन लेकर आई थी... या किसी की खुशियों की खनखनाहट... या फिर किसी बच्चे की उम्मीदों की लहर... या... मेरी मंज़िल की सदा... -२६ अप्रैल २००२ One who lives in the illusion their present is perfected and satisfied. But one who want to face the truth by breaking up the circumferences of the illusion their present is always tragic and unsatisfactory... -21 Apr 2002   Truth has to meet the criterion... -25 Apr 2002   Whisper... Breeze came... Waved curtain gently... Rustled leaves... And went out touching my ears... Perhaps whispered...

मौत-एक साक्षात्कार (Death- An Interview)

मौत-एक साक्षात्कार वो एक सपना था... सपना था...? जो भी हो, पर अपना था... सन्नाटों भरी रात... मैं चला जा रहा था , अँधेरे को चीरते हुए, किसी की तलाश में, शायद तन्हाइयों की तलाश में... मैं तनहा था, लेकिन तन्हा नहीं था, मेरे साथ ज़माने के शोरगुल चल रहे थे, जो मेरे अंदर गूँज रहे थे... और तब कहीं दूर से किसी के हंसने की आवाज़ सुनाई दी, मैं हैरान होकर खोजता चला जा रहा था, और कहकहे गहरे होते चले जा रहे थे... तभी एक अदृश्य कल्पना ने आकार लिया, मैं हैरान था, तभी एक आवाज़ गूंजी- "शायद तुम्हे मेरी ही तलाश है !" मैंने विस्मित होकर पूछा-"तुम कौन हो ?" आवाज़ फिर गूंजी -"मौत" मैंने आत्मविश्वास के साथ कहा -"हाँ, मुझे तुम्हारा ही इंतज़ार था... " कहकहा फिर गूंजा-"ये इंतज़ार कभी ख़त्म नहीं होगा..." मैंने  पूछा-" क्यों?" जवाब मिला-"क्योंकि मैं तुम्हे कभी नहीं मिल सकती..." मैंने पूछा-"क्यों?" जवाब मिला-"मैं तो उन लोगों का पीछा करती हूँ जो मुझसे दूर भागते हैं, पर तुम तो ख...

भावनाओं का समुद्र... (The sea of emotions...)

भावनाओं का समुद्र... हाँ! मैंने देखा है... सुहाग की निशानी को नालियों में बहते हुए... माँ की ममता को दम तोड़ते हुए... माँ को खुद वात्सल्य का गाला घोंटते हुए... ये सारा खेल भावनाओं का ही तो है, हाँ! केवल कुछ भावनाओं का, ज़िंदगी उम्र भर भावनाओं के झूले में झुलाती है, और आखिरी में छोड़ जाती है - निस्तब्धता, नीरवता... और केवल कुछ मूक प्रश्न, जिनके उत्तर में मिलती है - तड़प और घुटन... जीवन का अस्तित्व क्या है? सिर्फ तड़पते और सुलगते रहने के सिवा, जीवन का अर्थ क्या है? कुछ आशाओं और अभिलाषाओं के बंधन के सिवा, कुछ अंतहीन स्वप्नों की कड़ियों के सिवा... जीवन का अंत क्या है ? एक रिक्तता, शून्यता और एक चुभन के सिवा, केवल एक प्रश्नचिन्ह के सिवा, जो जीवन स्मृतिपटल पर छोड़ जाता है... ये सारा संसार भावनाओं का एक समुद्र है, जिसमे भावनाएं तरंगों की तरह हिलोरें लेती रहती हैं, बनती और बिगड़ती रहती हैं... -२८ दिसंबर २००१ आज मैने खुद से एक प्रश्न किया- 'बता! तू कौन है?' उत्तर मिला-'एक प्रश्न।' -२८ दिसंबर २००१ ज़िन्दगी कुंवारी  है औ...

समर्पण या छल...? (Dedication or deceit...?)

प्रार्थना (पूजा) एक मानवीय संवेदना है, कृतज्ञता की सर्वोच्च अभिव्यक्क्ति है, मानवीय सभ्यता का एक अंग है, जो यह अनुभूति कराती है कि मनुष्य पशुओं से भिन्न है। -२८ अगस्त २००१ सही और गलत का निर्णय हम अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर करते हैं और ये अनुभव घटनाओं की पुनरुक्ति के आधार पर बनी धारणाएं होती हैं अतः झूठ को बार-बार दोहराते रहने पर वह भी सच की शक्ल ले लेता है। -१४ सितम्बर २००१ किसी समस्या अथवा सिद्धांत की आलोचना करना तो अत्यंत सरल कार्य है परन्तु उसका निदान या समाधान देना उतना ही कठिन। किसी लड़खड़ाती हुई प्रणाली को दोष देना तो सहज है पर उसे सहारा देना उतना ही कठिन है। आज के आदमी को दुनिया भर के ज्ञान ने निषेधों से भर दिया है कि ये मत करो, वो मत करो, ऐसा मत करो, वैसा मत करो और आदमी को अकर्मण्य बना दिया है, उसे नपुंसक बना दिया है। किसी भी गलती को दूर करने का एकमात्र सहज उपाय है कि गलती करने वाले को उस कार्य के करने का सही तरीका बता दें, गलती तो अपने-आप ही दूर हो जाएगी लेकिन केवल दोषों को कोसते   रहने से और मनुष्य में निषेधों को भरते रहने से वह दूर नहीं होगा वरन और विकृत हो ज...

चुटकी भर राख...(My Existence...)

चुटकी भर राख... मैं जल रहा था, मेरा वज़ूद सिमटता चला जा रहा था, उस एक लौ में... उस एक लौ से ही मेरा वज़ूद बना था, और उसी लौ में मेरा वज़ूद सिमट जाना था... मुझे उसी लौ में मिलकर खो जाना था... मेरा सब कुछ सिमट   रहा था, मैं ख़त्म होता चला   जा रहा था, पर लौ बढ़ती चली जा रही थी, जैसे-जैसे रौशनी तेज होती चली जा रही थी, वैसे-वैसे   मेरा अंत निकट आता जा रहा था... हाँ! मैं जलता रहा, जलता ही रहा... और आखिरी क्षण तक जलता चला गया, और जलते-जलते अचानक भभक कर बुझ गया। कुछ देर पहले जहाँ एक दीपशिखा नजर आ रही थी, अब वहां शून्य था, शून्य के अलावा कुछ भी नहीं था, और मेरी जगह उस अँधेरे कोटर में बची थी, चुटकी भर राख, पर गौर से देखने पर उसमे एक शक्ल नजर आई , जो अपनी मूक भाषा में अपनी जगह एक नई रौशनी का पता दे रही थी... -२० अप्रैल २००१ My Existence... I was burning, Yeah ... I was burning continuously... My existence had been shrinking... in that flame... From the same one flame my existence was made up of, And in the same flame my existence h...

पूजा की सार्थकता... (Significance of worship...)

पूजा की सार्थकता... मेरे विचार से ईश्वर की पूजा वस्तुतः इतिहास की पूजा है।   धर्मग्रन्थ क्या हैं? धार्मिक और आध्यात्मिक घटनाओं तथा विचारों का इतिहास, और धर्म क्या है? धर्मग्रंथों का आचरण। जब हम ईश्वर के रूप में किसी अप्राकृतिक मानव रूप की पूजा करते हैं तो वह रूप या तो ऐतिहासिक होता है या पौराणिक। वास्तव में हम उस रूप की पूजा नहीं करते बल्कि उस रूप में निहित शक्ति की पूजा करते हैं जो शक्ति इतिहास में पूर्व-वर्णित होती है।   अतः अवतारों की पूजा वस्तुतः उन अलौकिक शक्तियों की पूजा है जो समय-समय पर उद्घाटित हुईं। इन अवतारों की पूजा करके हम उनकी शक्तियों और आदर्शों को अपने सामने रखते हैं, जो हमारी शक्तियों को उद्दीपित करते हैं, हमारी अन्तर्निहित शक्तियों को उत्प्रेरित करते हैं। अतः पूजा एक मार्ग है अपनी अंतर्मुखी शक्तियों को जानने तथा समझने का तथा उनका जनकल्याण के लिए उपयोग करने का, मगर वस्तुतः ऐसा नहीं होता, वस्तुतः तो हमारी पूजा अंधानुकरण ही होती है, जिसमे करने वाले को पता भी नहीं होता कि हम क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं? -२५ मार्च २००१   असफलताएँ सफ...

प्रत्यक्षानुभूति... (Direct cognition...)

प्रत्यक्षानुभूति... फ्रायड ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि मनुष्य के सारे क्रियाकलापों का मुख्य केंद्र बिंदु यौन-भावना (सेक्स) ही है। मानव जीवन एक वर्तुल में घूम रहा है जिसका केंद्र यौन-सुख है। सेक्स में लिपटे अपने जीवन की हकीकत को लगभग दुनिया का हर आदमी नकारता है।   एक सामान्य मनुष्य की विडम्बना यह है कि उसका जीवन सेक्स से बाहर हो ही नहीं सकता, उसका जीवन आरम्भ से अंत तक सिर्फ और सिर्फ सेक्स है। दुनिया का हर आदमी जिस सेक्स का सामना रोज करता है उसी को झुठलाना चाहता है इसलिए इस दुनिया में सेक्स इतना दमित, कुंठित और विकृत हो गया है। बहुत कम लोगों में इतना साहस होता है कि वे अपनी कमजोरियों को अपने अहम के परदे से ढांके बिना उसे यथावत स्वीकार कर लें। मैं शुरू से स्वच्छंद व्यक्ति रहा हूँ। सिवाय अपने मनमौजीपन, ज़िद और सनक को पूरा करने के, मैंने और कुछ नहीं किया। मैंने अक्सर वर्तमान के लिए भविष्य को दांव पर लगाया है। मैंने पूरी स्वच्छंदता के साथ सिर्फ और सिर्फ वर्तमान को जिया है। मैंने फ्रायड का यह विवादास्पद कथन तो बहुत बाद में पढ़ा पर इसका अनुभव अपनी १४-१५ वर्ष की आयु में ही कर लिय...

शब्द-शक्ति... (Power of words...)

शब्द-शक्ति... शब्द शक्ति क्या है? ·                      संवेदनाओं की अभिव्यक्ति हैं शब्द... ·                      अनुभवों की अभिव्यक्ति हैं शब्द... ·                      कल्पनाओं और प्रेरणा शक्ति का स्त्रोत हैं ये शब्द... ·                      जानवर और इंसान के बीच का फर्क हैं ये शब्द... ·                      विचार, वे विचार जो शब्द के झुण्ड के अलावा कुछ भी नहीं, मस्तिष्क में क्रांति ला देते हैं। विवेक और आत्मा को झिंझोड़ कर रख देते हैं। यहाँ तक कि जीवन की दिशा तक को मोड़ देने म...