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Showing posts from 2021

परमसत्य की खोज...28 (Discovery of the absolute truth ... 28)

(अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...28 30 दिसम्बर 2003 न कोई मरता है, न कोई मारता है। दुर्बलता मरती है, शक्ति मारती है। किसी के पतन का कारण कोई दूसरा नहीं, उसकी दुर्बलता है। ये सारा विश्व शक्ति और दुर्बलता का खेल ही तो है। ये सारा संसार शक्ति और दुर्बलता का संघर्ष ही तो है। जीवन-मरण, उत्थान-पतन, यश-अपयश इन सबका कारण शक्ति का उत्थान-पतन ही तो है। एक जगह शक्ति दुर्बलता को दबाती है तो दूसरी जगह वही शक्ति दुर्बलता को उठाकर शक्ति बना देती है। बिलकुल ज्वार भाटे की लहरों की तरह। यदि शक्ति को पाना है तो दुर्बलता से जूझना पड़ेगा, दुर्बलता को मिटाना पड़ेगा। -7:18 A.M.   मुझे मालूम है, हर लड़ाई का फैसला मेरे हक़ में ही होगा। मैं जानता हूँ कि हर लड़ाई में जीत मेरी ही होगी क्योंकि मैं शक्ति हूँ, मैं शक्ति हूँ सत्य की। -7:22 A.M.   मुझे कोई नहीं मार सकता, मैं अमर हूँ क्योंकि मैं शक्ति हूँ, मैं शक्ति हूँ सत्य की। -7:30 A.M.   मुझे गर्व है अपनी शक्ति पर कि मैं गीता को जी रहा हूँ। गीता कमजोरों का धर्मग्रन्थ नहीं, साहसी योद्धाओं का धर्मग्रन्थ है। इसे कमजोर लोग नहीं समझ सकते। इसे ...

परमसत्य की खोज...27 (Discovery of the absolute truth ... 27)

  (अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...27 29 दिसम्बर 2003 इस संसार में ऐसी कोई चीज नहीं, जो व्यर्थ हो। -9:00 A.M.   मैंने जान लिया कि ये जीवन एक भ्रम है, एक सपना है, तो सपने पर क्या खुश होना और क्या दुखी होना। सपने में क्या लाभ और क्या हानि। सपने पर कैसा राग और कैसा द्वेष। कैसा शोक, कैसी व्याकुलता। तो फिर सपने पर मैं क्यों रोऊँ। क्यों क्रोधित होऊं। क्यों दुखी होऊं। हाँ, आनंदित जरूर हो सकता हूँ। -9:10 A.M.   मैंने जान लिया कि मृत्यु क्या है? मैंने जान लिया मृत्यु का रहस्य। मृत्यु एक अवस्था है, एक स्वप्न के टूटने से दूसरे स्वप्न के शुरू होने के बीच की। अवस्था है एक जीवन के अंत तथा दूसरे जीवन के आरम्भ के बीच की। पर मेरे लिए मृत्यु होगी स्वप्न के टूटने के बाद जागने की अवस्था। पूर्ण जाग्रति। मेरे लिए मृत्यु अवस्था होगी जीवन के अंत के बाद परम जीवन में प्रवेश की। मेरे लिए मृत्यु अवस्था होगी मेरी शक्ति की परम शक्ति में विलय की। मेरे लिए मृत्यु अवस्था होगी पूर्ण मुक्ति की, पूर्ण आनंद की, परम आनंद की। मेरी मृत्यु मेरे लिए एक उत्सव होगी, एक महा उत्सव। -9:50 A.M.   प...

परमसत्य की खोज...26 (Discovery of the absolute truth ... 26)

  (अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...26 28 दिसम्बर 2003 जिस प्रकार दुर्बलता अंतःपरावर्तित होकर दुर्बलता को बढ़ाती है, उसी प्रकार शक्ति भी अन्तः परावर्तित होकर साहस को बढ़ाती है। जिस प्रकार भय अन्तः परावर्तित होकर भय को बढ़ाता है उसी प्रकार साहस भी अन्तः परावर्तित होकर साहस को बढ़ाता है। जिस प्रकार दुःख अन्तः परावर्तित होकर दुःख को बढ़ाता है उसी प्रकार आनंद भी अन्तः परावर्तित होकर आनंद को बढ़ाता है। आपके भीतर जिस भाव की उत्पत्ति होने लगती है, वही भाव अन्तः परावर्तित होकर परिमाण में बढ़ते जाता है। -6:30 A.M. आत्मज्ञान की चरम अवस्था निर्दोष ज्ञान में बदल जाती है तथा निर्दोष ज्ञान अज्ञान का आभास देता है। ज्ञान की उपस्थिति का आभास भी एक दोष है। ज्ञान का बोध भी एक दोष है। ज्ञान की पूर्ण अनुपस्थिति (अज्ञान) का आभास ही निर्दोष ज्ञान है परन्तु यह अवस्था सच्चे ज्ञान के बाद ही आ सकती है। ज्ञान ही निर्दोष ज्ञान को जन्म देता है, अज्ञान नहीं। ज्ञान के समुद्र के एक किनारे अज्ञान होता है तथा दूसरे किनारे पर निर्दोष ज्ञान। निर्दोष ज्ञान की अवस्था ज्ञान के समुद्र को पार करने के बाद ही मिल सकती ...

परमसत्य की खोज...25 (Discovery of the absolute truth ... 25)

  (अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...25 27 दिसम्बर 2003 अनुशंसा, अनुदान, पुरस्कार योग्यता के हक़ हैं, अधिकार हैं, खैरात या भीख नहीं।   -7:00 A.M. मुझे पहचानो! मैं वही शक्ति हूँ, जिससे भारत का उत्थान होगा। मैं वही शक्ति हूँ, जिससे मानवता का उत्थान होगा।   मैं वही शक्ति हूँ, जिसके बारे में स्वामी विवेकानंद कहा करते थे।   मैं वही शक्ति हूँ, जो ईसा के भीतर से बोल उठी थी कि मैं फिर आऊंगा।    मैं वही कृष्ण हूँ जिसने कहा था कि मैं बार-बार इस पृथ्वी पर जन्म लेता हूँ, इस धरती के पाप मिटाने के लिए। मैं वही राम हूँ जिसने मर्यादा पुरुषोत्त्तम बनकर उत्तम पुरुष की मर्यादाएं निर्धारित की थीं। मैं वही खुदा का बंदा हजरत मुहम्मद हूँ जो उस खुदा का पैगाम सुनाने पैगम्बर बनकर इस जमीं पर उतरा था। मैं वही बुद्ध हूँ, जो प्राणियों के ह्रदय में करुणा जगाने आया था। मैं ही नानक, कबीर और फरीद हूँ। पहचानो मुझे! मैं सत्य की शक्ति हूँ। पहचानो! पहचानो मुझे! यदि तुममे दृष्टि है।   -7:40 A.M.   समय अपने आप को दोहराता है, घटनाएं अपने आप को दोहराती हैं, ...

परमसत्य की खोज...24 (Discovery of the absolute truth ... 24)

  (अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...24 26 दिसम्बर 2003 आदर्श का सामने रहना जरूरी है, भले ही वह अप्राप्य रहे। -6:50 A.M. अपने सत्य में डूब जाओ। यदि अज्ञान सत्य है तो अज्ञान में डूब जाओ। यदि 'असत्य' सत्य है तो असत्य में डूब जाओ। यदि दुर्बलता सत्य है तो दुर्बलता में डूब जाओ। यदि पीड़ा सत्य है तो पीड़ा में डूब जाओ। जो भी तात्कालिक सत्य तुम्हारे सामने है उसी को पूर्णतः अंगीकार कर लोगे तो तुम शाश्वत सत्य तक पहुँच जाओगे, अपनी वास्तविक शक्ति का अनुभव कर लोगे। दुर्बलता और पीड़ा के भ्रम होने का अनुभव कर लोगे। जब तक हम अपनी शक्ति को नहीं जान पाते, तब तक वेदनाएं और दुर्बलताएँ हमें दबाती हैं, डराती हैं, परन्तु जब हम अपनी वास्तविक शक्ति को जान लेते हैं तब ये हमसे डरकर दूर भाग जाती हैं। -7:20 A.M. किसी पीड़ा या दुर्बलता के आगे हमारी स्थिति ठीक वैसी ही होती है जैसी उस अंधे भिखारी की होती है जो अपनी झोली में करोड़ों के हीरे रखकर बैठा है और उसका ज्ञान न होने के कारण वह रोता, गिड़गिड़ाता भीख मांग रहा है और प्रलाप कर रहा है कि कोई उसकी मदद नहीं करता। -7:25 A.M. सर्वे बताते हैं कि सबसे अध...

परमसत्य की खोज...23 (Discovery of the absolute truth ... 23)

  (अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...23 25 दिसम्बर 2003   पहले मैं स्वयं से घृणा करता था, स्वयं से लड़ता था, खुद को सजाएं देता था, अब मैं स्वयं से प्रेम करता हूँ। -8:42 A.M. मैं निरंतर बढ़ता चला आ रहा हूँ, निम्नतर सत्य से उच्चतर सत्य की ओर, सत्य से परम सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, शक्ति के अगाध समुद्र की ओर। -9:40 A.M. बाहरी नशा होता है आत्म-विस्मृति के लिए किन्तु जो आत्म-स्मृति का नशा चख लेता है वह कभी इस नशे से बाहर आना नहीं चाहता। बाहरी नशे में आदमी निरंतर खोता चला जाता है लेकिन आत्मस्मृति के नशे में आदमी जितने गहरे जाते जाता है उतना ही निरंतर पाते चला जाता है। -9:50 A.M. जब हम स्वयं को इस समग्र विश्व के हिस्से के रूप में देखते हैं तो व्यक्तिगत, जातिगत और देश-काल -निमित्तगत बंधनों से मुक्त हो जाते हैं, रिश्ते और नातों के संकुचित अर्थों से मुक्त हो जाते हैं। -10:50 A.M. छोटे से छोटे कार्यों को यदि व्यापक दृष्टि रखते हुए किया जाए तो वे महान बन जाते हैं। -10:55 A.M. एक छोटा बच्चा कितनी ही भीड़ में क्यों न हो, अपने माँ-बाप का चेहरा पहचान लेता है और दौड़...

परमसत्य की खोज...22 (Discovery of the absolute truth ... 22)

  (अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...22 23 दिसम्बर 2003 आईना हमें देख के हैरान है बहुत, कभी कतरा, कभी दरिया, कभी समंदर नजर आते हैं हम। -7:05 A.M. तन्हाई हमसे पूछती है, हर कदम-कदम, ये जोश किस बला का तेरे साथ-साथ है।   जिंदगी रोज़ हमसे पूछती है आके ख्वाब में, ये कौन बस गया है, जो जादू जगा रहा है। -7:15 A.M. इच्छाशक्ति से बढ़कर और कोई शक्ति नहीं। -7:20 A.M. हवा भला कब किसी के साथ के लिए थमी है? आग भला कब किसी के साथ के लिए रुकी है? तूफ़ान ने कब किसी का इन्तजार किया है? शक्ति ने कब किसी की प्रतीक्षा की है? कौन इन सब का हमसफ़र हो सका है? तो फिर मेरा हमसफ़र कोई कैसे हो सकता है? फिर भला मैं किसी के साथ के लिए कैसे रुक सकता हूँ? -7:30 A.M. बाधाएं तुम्हें परखती हैं। अगर तुम सफल होते हो तो तुम्हें शक्ति से मालामाल करती चली जातीं हैं और अगर तुम असफल होते हो तो तुम्हारी रही-सही शक्ति भी छीन लेतीं हैं। -9:40 A.M. अब मैं अनुभव कर रहा हूँ कि परमसत्य एक आनंद है, महा-आनंद। हाँ, वह इस महा-आनंद के सिवा कुछ और हो ही नहीं सकता। जैसे-जैसे मैं परमसत्य के निकट प...