(अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...26 28 दिसम्बर 2003 जिस प्रकार दुर्बलता अंतःपरावर्तित होकर दुर्बलता को बढ़ाती है, उसी प्रकार शक्ति भी अन्तः परावर्तित होकर साहस को बढ़ाती है। जिस प्रकार भय अन्तः परावर्तित होकर भय को बढ़ाता है उसी प्रकार साहस भी अन्तः परावर्तित होकर साहस को बढ़ाता है। जिस प्रकार दुःख अन्तः परावर्तित होकर दुःख को बढ़ाता है उसी प्रकार आनंद भी अन्तः परावर्तित होकर आनंद को बढ़ाता है। आपके भीतर जिस भाव की उत्पत्ति होने लगती है, वही भाव अन्तः परावर्तित होकर परिमाण में बढ़ते जाता है। -6:30 A.M. आत्मज्ञान की चरम अवस्था निर्दोष ज्ञान में बदल जाती है तथा निर्दोष ज्ञान अज्ञान का आभास देता है। ज्ञान की उपस्थिति का आभास भी एक दोष है। ज्ञान का बोध भी एक दोष है। ज्ञान की पूर्ण अनुपस्थिति (अज्ञान) का आभास ही निर्दोष ज्ञान है परन्तु यह अवस्था सच्चे ज्ञान के बाद ही आ सकती है। ज्ञान ही निर्दोष ज्ञान को जन्म देता है, अज्ञान नहीं। ज्ञान के समुद्र के एक किनारे अज्ञान होता है तथा दूसरे किनारे पर निर्दोष ज्ञान। निर्दोष ज्ञान की अवस्था ज्ञान के समुद्र को पार करने के बाद ही मिल सकती ...
It is a little lamp of truth, which is giving dim light of truth but it has thousands of suns inside it...