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Showing posts from April, 2021

परमसत्य की खोज...17 (Discovery of the absolute truth ... 17)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...17 18 दिसम्बर 2003 प्रकृति के नियमों का अतिक्रमण करके ही मानव अतिमानव बनता है। आरम्भ में उसे इसके लिए प्रकृति से संघर्ष करना पड़ता है, पर बाद में प्रकृति भी उसका साथ देने लगती है। -8:10 a.m. ईश्वर (परमसत्य) इतना जटिल नहीं है जितना धार्मिक लाल-बुझक्कड़ों ने इसे बना दिया है। -9:20 a.m. 'हम जानते हैं!' या 'हमें मालूम है!' यह सोचकर हम बहुत सी छोटी-छोटी बातों की उपेक्षा कर उन्हें दिमाग से निकाल देते हैं जबकि यही बातें हमारे चरित्र गठन तथा हमारी सफलता के लिए महत्त्वपूर्ण होती हैं।   -10:00 a.m. सत्य का साथ वहां तक देने में सबको ख़ुशी होती है, जहाँ तक कोई कष्ट न हो। -10:55 a.m. सत्य का आकर्षण दुनिया का सबसे तीव्र आकर्षण है बशर्ते आपके अंदर असली फौलाद (ईमानदारी) हो।   -12:55 p.m.   स्वयं को माया में फंसा कर, भ्रम में उलझाकर सत्य की खोज कैसे की जा सकती है? सत्य की खोज इसलिए दूभर हो गई है क्योंकि लोग माया के आकर्षण से खुद को बचा नहीं पाते और इसमें उलझकर सत्य से निरंतर दूर होते जाते हैं। सत्य की खोज केवल वे ही कर सकते हैं...

परमसत्य की खोज...16 (Discovery of the absolute truth ... 16)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...16 17 दिसम्बर 2003 यदि सच्ची सफलता चाहते हो तो कड़े से कड़ा अनुशासन अपनाना पड़ेगा। संघर्षो के कष्टों को झेलना पड़ेगा। जितना अधिक संघर्ष करोगे, जितना अधिक कष्ट झेलोगे, उतनी ही शीघ्र आगे बढ़ोगे, उतने ही लक्ष्य के समीप पहुंचोगे। संघर्षों से खुद को बचाने वाले और किस्मत के भरोसे बैठे रहने वाले कभी सच्ची सफलता नहीं पा सकते, उन्हें सिर्फ दूसरों की सफलता की जूठन मिल सकती है। गलत तरीके से तथा दूसरों के सहारे मिली सफलता ज्यादा दिनों तक ख़ुशी तथा संतुष्टि नहीं दे सकती, वह तो मरे हुए शिकार के समान होती है। मरा हुआ शिकार लोमड़ी को ही प्रसन्न कर सकता है, शेर को नहीं। मरा हुआ शिकार तथा दूसरों की जूठन शेर के किसी काम की नहीं होती। -10:15 a.m. एक पल का निर्णय ही काफी होता है आपकी ज़िंदगी को स्वर्ग में बदल देने के लिए और एक पल का निर्णय ही काफी होता है आपकी ज़िन्दगी को बर्बाद कर नर्क बना देने के लिये। -10:30 a.m. अगर किसी का चूल्हा फोड़ोगे तो उसका पेट भी तुम्हे ही भरना पड़ेगा। उसकी पेट की आग में तुमको ही जलना पड़ेगा। उसकी भूख में तुमको ही मिटना पड़ेगा। तुम्हारा ...

परमसत्य की खोज...15 (Discovery of the absolute truth ... 15)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...15 16 दिसम्बर 2003 मूर्ख लोग केवल दंड की भाषा ही समझते हैं इसलिए उनके लिए दंड का प्रावधान रखा गया है। मूर्खों और अपराधियों को उनके सुधार के लिए दंड न देना भी अन्याय होगा। -9:50 A.M. आज मैंने जानबूझकर क्रोध किया, आज मुझे जानबूझकर क्रोध करना पड़ा। वास्तव में वह क्रोध नहीं, क्रोध का अभिनय था, मिथ्याचार था। उस समय मेरे लिए क्रोध करना भी अनिवार्य हो गया था। कुछ परिस्थितियों में क्रोध तथा बल-प्रदर्शन अनिवार्य हो जाता है, तब उसका जनहित में प्रयोग करना अनुचित नहीं। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार कि पुलिस का क्रोध व बल-प्रदर्शन अनुचित नहीं। कर्मवादी बनने पर इस संसार में रहने के लिए थोड़ा बहुत मिथ्याचरण भी अभिनय के रूप में करना पड़ेगा अर्थात जो हमारे भीतर नहीं है वह भी दिखाना पड़ेगा। यदि इस मिथ्याचार से जनसामान्य को कोई हानि न होकर फायदा ही हो तो ऐसा करना अनुचित नहीं। -10:20 A.M. यदि आप स्वयं के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं, पूर्णतः कर्तव्यनिष्ठ हैं, पूर्णतः सत्यनिष्ठ हैं, पूरी तरह ईमानदार हैं तो यही आपके लिए पर्याप्त है। यदि आप अपनी आत्मा तथा विवेक से...

परमसत्य की खोज...14 (Discovery of the absolute truth ... 14)

( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...14 15 दिसम्बर 2003 जब आत्मज्ञान की अग्नि जल जाती है तो फिर उसे और भड़काने के लिए सत्संग, स्वाध्याय, आत्मपरीक्षण, आत्म-अवलोकन आदि की जरूरत पड़ती है ताकि वह फिर न बुझ जाए। -7:30 a.m. ·          प्रेम आध्यात्मिक आकर्षण है, वासना शारीरिक आकर्षण। ·          प्रेम हमेशा खोता है और खोकर भी संतुष्ट और प्रसन्न रहता है, वासना हमेशा पाती है और पाकर भी हर बार असंतुष्ट रहती है। ·          प्रेम शक्ति है, वासना दुर्बलता। ·          जब वासना मिटती है तभी प्रेम जागृत होता है, ये दोनों एक साथ कभी नहीं चल सकते। ·          वासना निम्नतर अवस्था है और प्रेम उच्च से भी उच्चतर। ·          वासना मिटकर प्रेम में पनपती है और प्रेम की बेल फैलकर अपनी खुशबू सम्पूर्ण संसार में बिखेर देती है। ·       ...