' ऐसा क्यों होता है? ' ऐसा क्यों होता है कि मुझे अपने परिश्रम का फल नहीं मिलता, जैसे कोई किसान बड़ी मेहनत और लगन से अपने खेत को पसीने से सींचता है और फसल पकने पर खलिहान में आग लग जाती है और उसका सारा परिश्रम निरर्थक हो जाता है। ऐसा क्यों होता है कि हर बार एक तूफ़ान आकर मेरे सारे प्रयासों को असफल कर देता है। यह मेरे प्रयासों में कोई कमी है या फिर भाग्य का कोई खेल... कि परिस्थितियां मुझे आजमाना चाहती हैं... -२१ जुलाई १९९९ मैं सोचता हूँ... सोचता हूँ और बस सोचता चला जाता हूँ कि ये दुनिया वैसी क्यों नहीं है, जैसा हम इसे बनाना चाहते हैं, जैसा हम इसे महसूस करना चाहते हैं? सपनों, और हकीकत में इतना अंतर क्यों? कल्पना और वास्तविकता में इतना अंतर क्यों? सपनों और कल्पनाओं का सकारात्मक धरातल वास्तविकता में आते ही नकारात्मकता में क्यों बदल जाता है? इन सब सवालों का जवाब मैं बचपन से ढूंढता आ रहा हूँ, खुद में, अपने आसपास, जहाँ तक नजरें जाती हैं पर दुनिया की बाद से बदतर शक्ल नजर आती है। दुनिया का इतना गन्दा, घिनौना चेहरा देख चुका हूँ कि नहीं चाहता की इसे कोई और भी देखे, जो अपने भविष्...
It is a little lamp of truth, which is giving dim light of truth but it has thousands of suns inside it...