(अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...22 23 दिसम्बर 2003 आईना हमें देख के हैरान है बहुत, कभी कतरा, कभी दरिया, कभी समंदर नजर आते हैं हम। -7:05 A.M. तन्हाई हमसे पूछती है, हर कदम-कदम, ये जोश किस बला का तेरे साथ-साथ है। जिंदगी रोज़ हमसे पूछती है आके ख्वाब में, ये कौन बस गया है, जो जादू जगा रहा है। -7:15 A.M. इच्छाशक्ति से बढ़कर और कोई शक्ति नहीं। -7:20 A.M. हवा भला कब किसी के साथ के लिए थमी है? आग भला कब किसी के साथ के लिए रुकी है? तूफ़ान ने कब किसी का इन्तजार किया है? शक्ति ने कब किसी की प्रतीक्षा की है? कौन इन सब का हमसफ़र हो सका है? तो फिर मेरा हमसफ़र कोई कैसे हो सकता है? फिर भला मैं किसी के साथ के लिए कैसे रुक सकता हूँ? -7:30 A.M. बाधाएं तुम्हें परखती हैं। अगर तुम सफल होते हो तो तुम्हें शक्ति से मालामाल करती चली जातीं हैं और अगर तुम असफल होते हो तो तुम्हारी रही-सही शक्ति भी छीन लेतीं हैं। -9:40 A.M. अब मैं अनुभव कर रहा हूँ कि परमसत्य एक आनंद है, महा-आनंद। हाँ, वह इस महा-आनंद के सिवा कुछ और हो ही नहीं सकता। जैसे-जैसे मैं परमसत्य के निकट प...
It is a little lamp of truth, which is giving dim light of truth but it has thousands of suns inside it...