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Showing posts from May, 2021

परमसत्य की खोज...22 (Discovery of the absolute truth ... 22)

  (अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...22 23 दिसम्बर 2003 आईना हमें देख के हैरान है बहुत, कभी कतरा, कभी दरिया, कभी समंदर नजर आते हैं हम। -7:05 A.M. तन्हाई हमसे पूछती है, हर कदम-कदम, ये जोश किस बला का तेरे साथ-साथ है।   जिंदगी रोज़ हमसे पूछती है आके ख्वाब में, ये कौन बस गया है, जो जादू जगा रहा है। -7:15 A.M. इच्छाशक्ति से बढ़कर और कोई शक्ति नहीं। -7:20 A.M. हवा भला कब किसी के साथ के लिए थमी है? आग भला कब किसी के साथ के लिए रुकी है? तूफ़ान ने कब किसी का इन्तजार किया है? शक्ति ने कब किसी की प्रतीक्षा की है? कौन इन सब का हमसफ़र हो सका है? तो फिर मेरा हमसफ़र कोई कैसे हो सकता है? फिर भला मैं किसी के साथ के लिए कैसे रुक सकता हूँ? -7:30 A.M. बाधाएं तुम्हें परखती हैं। अगर तुम सफल होते हो तो तुम्हें शक्ति से मालामाल करती चली जातीं हैं और अगर तुम असफल होते हो तो तुम्हारी रही-सही शक्ति भी छीन लेतीं हैं। -9:40 A.M. अब मैं अनुभव कर रहा हूँ कि परमसत्य एक आनंद है, महा-आनंद। हाँ, वह इस महा-आनंद के सिवा कुछ और हो ही नहीं सकता। जैसे-जैसे मैं परमसत्य के निकट प...

परमसत्य की खोज...21 (Discovery of the absolute truth ... 21)

(अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...21 22 दिसम्बर 2003 जिस प्रकार हम सोचते हैं कि 'मानव जाति का पतन सुअर जाति में होता होगा।' उसी तरह सुअर भी सोचते होंगे कि 'सुअर जाति का पतन मानव जाति में होता होगा।' जिस प्रकार हम सोचते हैं कि 'हम मानव के जन्म में सर्वश्रेष्ठ जीवन बिता रहे है' और इस जीवन को छोड़ना नहीं चाहते अर्थात मरना नहीं चाहते। बहुत संभव है कि सुअर भी सोचते होंगे कि 'हम पृथ्वी पर सुअर के रूप में सर्वश्रेष्ठ जीवन बिता रहे हैं, परमात्मा ने हमें पृथ्वी से मनुष्यों की गंदगी दूर करने का महत्त्वपूर्ण कार्य देकर इस पृथ्वी पर भेजा है।‘ वे परमात्मा को भी सुअर के रूप में देखते होंगे। इस तरह सूअर अपने गंदे जीवन को भी छोड़ना नहीं चाहते। जिस प्रकार सुअर अपने जीवन में मस्त होकर अपनी उच्चतर अवस्था (मानव अवस्था) को पाना नहीं चाहते उसी प्रकार साधारण मनुष्य भी अपने जीवन में मस्त होकर अपनी उच्चतर अवस्था को पाना नहीं चाहता। -7:15 A.M. जिन साधनों के बगैर पहले जिंदगी बिताना असंभव लगता था अब वे साधन भी व्यर्थ हो गए हैं, अपने आप ही मुझसे छूट गए हैं। जिन चीजों की कल्पना पहले...

परमसत्य की खोज...20 (Discovery of the absolute truth ... 20)

  (अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...20 21 दिसम्बर 2003 इंसान इतना बेवफा है कि वह खुद से भी सच्चा प्रेम नहीं करता, जिस दिन वह खुद से सच्चा प्रेम करना सीख जाएगा, उस दिन वह अपने भीतर छिपी शक्ति को पहचान जाएगा। जिस दिन वह खुद से सच्चा प्रेम करना सीख जाएगा, उस दिन के बाद वह किसी से घृणा नहीं कर सकेगा। -7:15 A.M. दुनिया का हर बेवकूफ खुद की नजर में सबसे बड़ा अक्लमंद होता है और उसकी हर बेवकूफी उसकी नजर में एक अक्लमंदी होती है इसलिए हमें होशियार रहना होगा कि कहीं हमारी अक्लमंदी भी हमारी बेवकूफी ही न हो। -4:10 p.m. खुद से बातें करने वाला या तो ज्ञानी होता है या पागल। मैं भी तो खुद से बातें करता हूँ, तो फिर मैं क्या हूँ? -4:30 p.m. कभी कभी ज्ञान का अनुसरण भी पागलपन का भ्रम देता है। मेरा ज्ञान तो मुझसे छूटते जा रहा है। मैं ज्ञान की तरफ बढ़ रहा हूँ या अज्ञान की तरफ, या फिर शून्य की तरफ? -4:35 p.m. गरीबी और अमीरी की अवस्था भौतिक कम और मानसिक रोग ज्यादा है। साधन और शक्ति सभी के लिए उपलब्ध हैं। जो इन साधनों का उचित दोहन कर ले वह अमीर और जो इन साधनों का उचित दोहन न कर शक्ति का अपव्...

परमसत्य की खोज...19 (Discovery of the absolute truth ... 19)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...19 20 दिसम्बर 2003 जहाँ तक संभव हो, दूसरों की आलोचना से बचें। दूसरों की आलोचना हमारी विचारधारा को संकीर्ण करती है। हमारी मानसिकता को कुंठित करती है, हमारी मानसिक एवं आत्मिक उन्नति में बाधा उत्पन्न करती है। दूसरों की आलोचना करके हमें कुछ हासिल नहीं होगा। स्वयं के आलोचक बनें, स्वयं की समीक्षा करें, तभी हम वह सब कुछ हासिल कर पाएंगे, जो हम चाहते हैं। -2:30 p.m. पहले मैं सोचता था कि अपना समय कैसे व्यतीत करूँ। अब मैं सोचता हूँ कि अपने नित्य निर्धारित कामों को ख़त्म करने के लिए और अधिक समय कहाँ से लाऊँ। मैं भली भांति समझ चुका हूँ इस मुहावरे का अर्थ 'व्यस्त रहो, मस्त रहो।' हम हमेशा ये प्रयास करें कि यदि हम दूसरों पर अपना अच्छा प्रभाव नहीं डाल सकते तो उस पर अपना कुप्रभाव भी न पड़ने दें। यदि उसकी विचारधारा को सकारात्मक दृष्टिकोण नहीं दे सकते तो नकारात्मक दृष्टिकोण भी न दें। यदि हम दूसरे की भूख को शांत नहीं कर सकते तो उसकी भूख को विकृत करके उसे पागल भी न बनाएं। हरेक आदमी हर गुण को ग्रहण नहीं कर सकता। हर चीज हर आदमी के लिए नहीं बनी होती। दूसरों म...

परमसत्य की खोज...18 (Discovery of the absolute truth ... 18)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...18 19 दिसम्बर 2003 लोग... अपने अज्ञान को अपना ज्ञान, अपने दोष को अपना गुण, अपनी कमजोरी को अपनी शक्ति, अपने अहंकार को अपनी शक्ति, अपनी शक्ति को अपनी कमजोरी, अपनी अक्षमता को अपना दुर्भाग्य, अपनी कायरता को चालाकी, भय तथा कापुरुषता को अक्लमंदी, भगोड़ेपन को अपनी होशियारी, सापेक्षिक भ्रमों को अपनी खुशियां, जीवन की सच्चाई को दुःख, असत्य (माया) को सत्य, सच्चे आनंद को चमत्कार, तथा सत्य को असंभव मानते हैं। -8:40 a.m. आज फिर वही विचित्र शक्ति दौड़ रही है मेरे शरीर में। आज फिर वही शक्ति मेरे रोम-रोम को स्पंदित कर रही है। आज फिर मैं रोमांचित हो रहा हूँ उसी शक्ति के प्रवाह में। अनगिनत तरंगें उठ रही हैं मेरे हृदयस्थल से और विस्तृत होकर फैलती जा रही हैं, विलीन होती जा रही हैं मेरे शरीर के चारों तरफ, आभामंडल में। आज फिर मेरे ह्रदय से उठ रहा है शक्ति का भूचाल और ले जा रहा है मुझे किसी दूसरी दुनिया में। मेरे मस्तिष्क के प्रकम्पन मुझे एक यात्रा का आभास करा रहे हैं, मानों मैं अपने सूक्ष्म शरीर के साथ किसी और ही दुनिया में विचरण कर र...