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Showing posts from October, 2020

परमसत्य की खोज...5 (Discovery of the absolute truth ... 5)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...5 6 दिसम्बर 2003 कुछ दिनों पहले मैं अपने ही बनाए हुए बंधनों में बंधा कुत्ता था और भौंकने को ही अपनी असली शक्ति समझ रहा था। अब मैं जंगल में आजाद घूमता हुआ शेर हूँ, अब शक्ति मुझमे प्रत्यक्ष है। -११:०७ p.m. अब मैं विकार शून्य हो गया हूँ। -८:१० a.m. सत्य हमें कड़वा लगता है, ह्रदय में शूल की भांति चुभता है, क्यों? क्योंकि हम इतने दुर्बल हैं कि अपनी दुर्बलता का सत्य भी स्वीकार नहीं कर सकते। हममें इतनी भी शक्ति नहीं की अपनी अशक्ति को अपना सकें अपनी दुर्बलता के सत्य को अपना सकें। -८:१३ a.m. क्या तुम नहीं चाहते सिंह जैसी निर्भयता ? शक्ति की प्रचंडता, अपने भीतर ? यदि चाहते हो तो तुम्हे भी सत्य की खोज को अपनाना पड़ेगा। -८:१५ a.m. कुछ दिन पहले मैं ज़िंदगी के पीछे भाग रहा था, अब ज़िंदगी मेरे पीछे भाग रही है। -८:२२ a.m. स्वयं को आदेश दो, स्वयं को उपदेश दो। यदि तुम अपने उद्देश्य को कभी भी न भूलो तो दुनिया की कोई बाधा तुम्हे तुम्हारे मार्ग से विचलित नहीं कर सकती। दुनिया की कोई ताकत तुम्हे तुम्हारे लक्ष्य तक पहुँचने से नहीं रोक सकती। ...

परमसत्य की खोज...4 (Discovery of the absolute truth ... 4)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...4 5 दिसम्बर २००३ लोगों का अज्ञान ही उन्हें ज्ञान को स्वीकारने नहीं देता और स्वयं को ज्ञान तथा सच्चे ज्ञान को अज्ञान साबित करने की कोशिश करता है। अब मैं मस्तिष्क की अतीन्द्रिय क्षमताओं से परिचित होने लगा हूँ। सचमुच ब्रह्मचर्य में बहुत बड़ी ताकत है। स्वप्नों में डर होता है, दर्द नहीं। सुख होता है, स्वाद नहीं, रस नहीं। जीवन में अब न कोई खुशी है, न दुःख, बस एक रहस्य... जीवन का रहस्य। -८:०० a.m. ये जीवन, वो मृत्यु, ये जाग्रति, वो निद्रा... ये वास्तविकता, वो स्वप्न... सब कुछ एक जादू है, रहस्य है। ये दिन, वो रात, ये आनंद, वो रुदन, ये धूप, वो छांव... सब कुछ एक जादू है, एक रहस्य है। सचमुच प्रकृति एक जादू भवन है। -८:४७ a.m. अब संसार अनोखा लगता है, बिल्कुल परियों की कहानी जैसा। -९:२० a.m. मन का पीछा मत करो, वह जहाँ भी जाना चाहे, उसे जाने दो और तटस्थ होकर दूर से देखते रहो, कुछ देर बाद खुद को अकेला पाकर वह खुद ही किसी बच्चे की तरह तुम्हारे पास लौट आएगा। -९:३० a.m. मैं आगे बढ़ रहा हूँ या पीछे लौट रहा हूँ। -९:३७ a.m. का...

परमसत्य की खोज...3 (Discovery of the absolute truth ... 3)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...3 4 दिसम्बर २००३ विगत रात्रि का स्वप्न -     मेरा एक मित्र 'क' मेरे पास आया। वह अपने साथ रस्सी का एक फंदा बना कर लाया था। मैंने उसके हाथ में वह फंदा देखकर पूछा कि इसे क्यों लाए हो ? उसने जवाब दिया कि इसे गले में फंसाकर ध्यान लगाऊंगा। मैंने समझने की कोशिश की -'इस तरह से कहीं ध्यान होता है, ऐसे तो तुम अपनी जान गंवा बैठोगे।' पर वह सत्य स्वीकार करना ही नहीं चाहता था। थोड़ी देर बाद मित्र 'ख' आते हैं, बेहद परेशान हालत में। मैं उनकी परेशानी जानना चाहता हूँ। वे अपनी परेशानी व्यक्त करते हैं (जो मुझे याद नहीं) और इस परेशानी का समाधान करने के लिए मुझे कहीं ले जाना चाहते हैं। मैं जानता हूँ कि मेरे जाने से कोई समाधान नहीं मिलेगा पर जानते हुए भी इनकार नहीं कर पाता और उसका दिल रखने के लिए अगले दिन की हामी भर देता हूँ। अगले दिन वह निर्धारित समय पर अपनी स्कूटर लेकर आता है और हॉर्न बजाकर मुझे बुलाता है। तभी एक खास परिचित आ जाते हैं और आते ही खबर देते हैं कि उन्होंने अपने घर का फ़ोन कटवाकर मोबाइल ले लिया है, अगर मैं उनका इंस्ट्रूमेंट लाना...