( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...5 6 दिसम्बर 2003 कुछ दिनों पहले मैं अपने ही बनाए हुए बंधनों में बंधा कुत्ता था और भौंकने को ही अपनी असली शक्ति समझ रहा था। अब मैं जंगल में आजाद घूमता हुआ शेर हूँ, अब शक्ति मुझमे प्रत्यक्ष है। -११:०७ p.m. अब मैं विकार शून्य हो गया हूँ। -८:१० a.m. सत्य हमें कड़वा लगता है, ह्रदय में शूल की भांति चुभता है, क्यों? क्योंकि हम इतने दुर्बल हैं कि अपनी दुर्बलता का सत्य भी स्वीकार नहीं कर सकते। हममें इतनी भी शक्ति नहीं की अपनी अशक्ति को अपना सकें अपनी दुर्बलता के सत्य को अपना सकें। -८:१३ a.m. क्या तुम नहीं चाहते सिंह जैसी निर्भयता ? शक्ति की प्रचंडता, अपने भीतर ? यदि चाहते हो तो तुम्हे भी सत्य की खोज को अपनाना पड़ेगा। -८:१५ a.m. कुछ दिन पहले मैं ज़िंदगी के पीछे भाग रहा था, अब ज़िंदगी मेरे पीछे भाग रही है। -८:२२ a.m. स्वयं को आदेश दो, स्वयं को उपदेश दो। यदि तुम अपने उद्देश्य को कभी भी न भूलो तो दुनिया की कोई बाधा तुम्हे तुम्हारे मार्ग से विचलित नहीं कर सकती। दुनिया की कोई ताकत तुम्हे तुम्हारे लक्ष्य तक पहुँचने से नहीं रोक सकती। ...
It is a little lamp of truth, which is giving dim light of truth but it has thousands of suns inside it...