( अंतर्यात्रा) सत्य की खोज...3 १७ नवंबर २००३ , सोमवार विद्वजन , ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि ईश्वर सृष्टि के कण-कण में है। मैं वहशी दरिंदों में ईश्वर को कैसे देखूं ? पापी , दुराचारियों में ईश्वर को कैसे देखूं ? यदि हर व्यक्ति में ईश्वर है तो फिर ईश्वर इतना वहशी , इतना दरिंदा कैसे हो सकता है ? वह इतने बुरे कर्म कैसे कर सकता है ? और अगर कर सकता है तो फिर वह ईश्वर ही नहीं ? - ९:०५ p.m. सारा संसार केवल एक भ्रमजाल नजर आ रहा है , ठीक वैसे ही , जैसे कोई एक ३-डी फिल्म देख रहा हो। एक विचित्र सी आतंरिक चेतना का अनुभव हो रहा है , जो बाह्य अचेतनता का अनुभव करा रही है। अंदर का कोलाहल इतना बढ़ता जा रहा है कि बाहर का कोलाहल मिटता जा रहा है। और अब स्वयं का अस्तित्व एक स्वचालित यंत्र मानव सा जान पड़ रहा है। कभी-कभी पुराने संस्कार गहरे काले धब्बों की तरह अपनी ओर आकर्षित करते हैं पर मेरी आंतरिक चेतना ने मुझे जकड़ रखा है। - १०:१२ a.m. मन एकांत चाहता है , दूसरों से मिलने पर खीझता है। दूसरों से मिलना असहनीय , कष्टकारक होता जा रहा है। कभी-कभी आतंरिक चेतना और बाह्य चेतना मन को बॉलीबॉल की ग...
It is a little lamp of truth, which is giving dim light of truth but it has thousands of suns inside it...