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Showing posts from June, 2020

सत्य की खोज...3 (Discovery of the truth ... 3)

( अंतर्यात्रा) सत्य की खोज...3 १७ नवंबर २००३ , सोमवार विद्वजन , ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि ईश्वर सृष्टि के कण-कण में है। मैं वहशी दरिंदों में ईश्वर को कैसे देखूं ? पापी , दुराचारियों में ईश्वर को कैसे देखूं ? यदि हर व्यक्ति में ईश्वर है तो फिर ईश्वर इतना वहशी , इतना दरिंदा कैसे हो सकता है ? वह इतने बुरे कर्म कैसे कर सकता है ? और अगर कर सकता है तो फिर वह ईश्वर ही नहीं ? - ९:०५ p.m. सारा संसार केवल एक भ्रमजाल नजर आ रहा है , ठीक वैसे ही , जैसे कोई एक ३-डी फिल्म देख रहा हो। एक विचित्र सी आतंरिक चेतना का अनुभव हो रहा है , जो बाह्य अचेतनता का अनुभव करा रही है। अंदर का कोलाहल इतना बढ़ता जा रहा है कि बाहर का कोलाहल मिटता जा रहा है। और अब स्वयं का अस्तित्व एक स्वचालित यंत्र मानव सा जान पड़ रहा है। कभी-कभी पुराने संस्कार गहरे काले धब्बों की तरह अपनी ओर आकर्षित करते हैं पर मेरी आंतरिक चेतना ने मुझे जकड़ रखा है। - १०:१२ a.m. मन एकांत चाहता है , दूसरों से मिलने पर खीझता है। दूसरों से मिलना असहनीय , कष्टकारक होता जा रहा है। कभी-कभी आतंरिक चेतना और बाह्य चेतना मन को बॉलीबॉल की ग...

सत्य की खोज...२ (Discovery of truth ... 2)

( अंतर्यात्रा) सत्य की खोज...२ १६   नवंबर   २००३ , रविवार मेरे सामने अभी दो प्रश्न हैं - १. यदि ईश्वर है , तो उसकी सृष्टि , संसार इतना विकृत क्यों है ? संसार में इतने पाप , अन्याय , अत्याचार , फरेब , मक्कारी और बलात्कार क्यों है ? सुख से ज्यादा दुःख क्यों है ? वह इतना बेबस और लाचार   क्यों है कि अपनी सृष्टि को सुखों और अच्छाइयों से सजा-संवारकर नहीं रख सकता। वह इतना बेबस क्यों है कि अपनी सृष्टि से इन बुराइयों को दूर नहीं कर सकता ? और यदि वह इतना बेबस और  लाचार  है तो वह ईश्वर ही क्या ? २. यदि ईश्वर नहीं है तो इतनी बड़ी सृष्टि का संचालन कैसे हो रहा है ? कैसे एक नियम में आबद्ध होकर सारी सृष्टि चल रही है ? और उससे भी बड़ी बात कि इतनी अद्भुद सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ ? उसकी शुरुवात कैसे और कहाँ से हुई ? विद्व-जन कहते हैं कि ईश्वर अव्यक्त है , निराकार है , असीम है तो फिर उन्होंने इसका साक्षात्कार कैसे कर लिया ? वे यह भी कहते हैं कि ईश्वर एक रहस्य है जिसे जानने के बाद जानने वाला उसे किसी तरह भी व्यक्त नहीं कर सकता। फिर उस अव्यक्त को व्यक्त करने के ल...

सत्य की खोज...1 (Discovery of the truth...1)

  ( अंतर्यात्रा)   सत्य की खोज... 1 १५ नवंबर २००३ , शनिवार आज मैं पहली बार रोया हूँ , इंसान की बेबसी पर और इंसान की दरिंदगी पर। नहीं चाहिए ऐसा बेबस और लाचार ईश्वर , जो गंदे , घिनौने , घृणित , वहशत और दरिंदगी के नंगे खेल देखे और कुछ न कर सके। मैं नहीं मानता ऐसे ईश्वर के अस्तित्व को। आज से मैं नास्तिक हूँ , कट्टर नास्तिक।   - २:१४ p.m.    क्या वो ईश्वर होगा , जो असहाय , मजबूर , कमजोर और मासूम लोगों के बहते हुए आंसू देखे , उनकी चीत्कार सुने , उनका करुण रुदन सुने और उसका कलेजा न दहले , उसकी आत्मा न हिले ? नहीं। ईश्वर जैसा कुछ भी इस धरती पर कहीं नहीं है , वह इस दुनिया में कहीं नहीं हो सकता। अगर दुनिया में ताकत ही सब कुछ है , सच्चाई , ईमानदारी और नैतिकता कुछ भी नहीं तो फिर कोई उसके एहसान क्यों उठाए जिसका कोई नामोनिशान नहीं , सिवाय मिटटी और पत्थरों के ढेर के सिवा। मुझे अब उसकी कोई जरूरत नहीं। मैं खुद ही अपना भगवान हूँ , मैं खुद ही अपना ईश्वर हूँ , मैं खुद ही अपना खुदा हूँ। - २:३४ p.m. यहाँ किसी को किसी के दुःख से वास्ता नहीं , कोई किसी और का द...