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Showing posts from April, 2020

सुख कहीं सूख न जाएँ... (Happiness shouldn't dry...)

सुख कहीं सूख न जाएँ... उसने कहा - कौन हो तुम? मैंने कहा - एक प्रश्न...? उसने कहा -   और उत्तर...? मैंने कहा - '--------' (निरुत्तर, मौन में है मेरा उत्तर...) उसने कहा - तुम अर्थहीन परिभाषा हो, ऐ प्यासे समंदर... मैंने कहा - ये शब्दों का बवंडर है व्यर्थ का आडम्बर... उसने कहा - भूला हुआ सा सपना है... मैंने कहा - जो भी है पर अपना है... उसने कहा - भटकती हुई राहें कहाँ ले जाएंगी...? मैंने कहा - राहें ही एक दिन लक्ष्य बन जाएंगी... उसने कहा - इस उलझे हुए जीवन से क्या मिल पाएगा... मैंने कहा - खोकर ही जीवन में नवसृजन हो पाएगा... (---------------------------) और वो चुप हो गया.! -१५ सितम्बर २००२ Happiness shouldn't dry... She said - Who are you? I said - a question...? She said - and the answer...? I said - '--------' (silence, silence is my answer ...) She said - you're meaningless definition, O thirsty sea... I said - This whirlwind of words is a pointless hypocrisy... She said – It’s a forgotten little dream... I sai...

'सुकून' (‘Peace’)

मेरे प्रिय मित्रों, आज मैं आप लोगों को अपने प्रिय मित्र दीपक तिवारी 'दिव्य' से मिलाना चाहूँगा।   इन्होने मेरे पूर्व लिखित ब्लॉग 'विद्रोह' का सकारात्मक पक्ष दिखलाया। इन्होने उस समय मेरी डायरी में 'विद्रोह' के जवाब में 'सुकून' लिखा था।   आज यहाँ मैं उसे प्रस्तुत करना चाहूंगा।   हम दोनों एक दूसरे के लिए प्रेरणा हैं। हम दोनों एक दूसरे के लिए मार्गदर्शक हैं। और हम दोनों एक दूसरे के कार्यों के समीक्षक भी हैं। मैं अपने इस मित्र का ह्रदय से आभारी हूँ। तो अब समय है उस 'सुकून' को पढ़कर महसूस करने का... 'सुकून' काले पत्थरों की ऊंचाइयां, दोनों ओर, तल की गहराइयों में मैं हूँ, ऊपर के किसी बिंदु पर एक सूक्ष्म धुंधलका सा है, जो 'था' हुआ जाता है। जैसे जैसे वक़्त गुजरता जा रहा है, मेरी तड़प बढ़ती जा रही है। शायद आखिरी तड़प, वो धुंधलका शायद अब मुझे देख नहीं पा रहा है, जिस पर मेरा सारा ध्यान लगा है। शरीर का एहसास नहीं, आभास नहीं, विश्वास नहीं, कि ध्यान भी धुंधलके के साथ जा रहा है। अब कौन है अकेला, केवल शरीर, माटी, या फिर तलछटी की ...

विद्रोह... (A rebellion...)

विद्रोह... और कितने सपने दिखाएगा तू...!!!    और कितने  सपने तोड़ेगा...!! सपने दिखाकर बहलाता भी तू है और सपनों को तोड़कर चकनाचूर भी तू ही करता है... आखिर सीधी-सादी राह पर चलने वाले को ही ऐसी सजा क्यूँ...? ? इतने सारे सपने देकर मायूसियों और नाकामियों   से मेरा जीवन भरने से तुझे क्या हासिल होगा... हौसला भी कहाँ तक कोई रखे? आखिर उम्मीद की कोई तो झलक नजर आए... काँटों के जाल में एकाध तो फूल मिले... एकाध तो कामयाबी मिले... आखिर क्या चाहता हूँ मैं ऐसा, जो तू मुझे नहीं दे सकता... सच्चाई और ईमानदारी की राह पर चलना चाहता हूँ। इस दुनिया में प्रेम और खुशियां बिखेरना चाहता हूँ, इतनी छोटी सी मर्ज़ी है मेरी, उस पर भी इतनी ज़िल्लत...! क्यूँ...? ऐसी नाकामी क्यूँ? आखिर क्यूँ मुझे इस तरह तोड़कर बर्बाद करना चाहता है... देख , देख...कहे देता   हूँ...इस तरह   मुझे मत आज़मा... अगर मैं टूट गया तो फिर कहीं का नहीं रहूंगा... अब और मेरे सब्र का इम्तेहान मत ले ... अगर मैं बन नहीं सका तो इस कदर बिगड़ जाऊंगा कि तेरी तो क्या इंसानियत की भी रूह काँप उठेगी। अब तक तो मैं प्यार और...

तल्खियाँ... (Bitterness...)

तल्खियाँ... मैं नहीं जानता कि कभी-कभी मेरा रुख इतना कड़वा क्यों हो जाता है। शायद दोष मेरा नहीं, सच का कड़वा होना नैसर्गिक है।   सच्चाई और ईमानदारी की राह पर चलते-चलते मुसाफिर कड़वा हो ही जाता है क्योंकि उसके जीवन में अनुभवों की कड़वाहट पर कड़वाहट घुलते जाती है। मेरे सिद्धांत नंगे और बेबस खड़े हैं इस दुनिया में, पर इन्हे सहमति के कपडे पहनने वाला यहाँ कोई नहीं।   समझौते के खिलौने मेरे सिद्धांतों को बहलाते हैं, फुसलाते हैं लेकिन सिद्धांत तो हठीले बालक होते हैं, ये अपनी हठ किसी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहते। -१६ अगस्त २००२ Bitterness... I do not know why sometimes my attitude is so bitter. Perhaps the fault is not mine, be bitter truth is natural. Walking on the path of truth and honesty, travelers become bitter because the bitterness of his experiences dissolves bitterness in life. My principles are stand naked and defenseless in this world, no one is here to wear them the clothes of concurrence. The toys of consent amuse my principles, cajole my principal but principle...

जनरेशन गैप का मनोविज्ञान... (Psychology of Generation Gap...)

जनरेशन गैप का मनोविज्ञान... 'जनरेशन गैप एक छोटा सा शब्द है जो आपको मॉडर्न होती युवा पीढ़ी में टीन-एजर्स और उनके माता-पिता के बीच होने वाली बहस में कहीं भी सुनने को मिल जाएगा। ये शब्द कोई नया नहीं है, पीढ़ियों से उपयोग में आता रहा है और पीढ़ियों तक उपयोग में आता रहेगा। आइये, जाने क्या है इसका मनोविज्ञान... जनरेशन गैप दो पीढ़ी में एक-दूसरे को समझ न पाने की भावना को लेकर मतभेद की स्थिति है। क्यों होता है यह मतभेद... ? जनरेशन गैप का मुख्य कारण है माता-पिता का बच्चों को वे काम करने से मना करना जो या तो वे खुद कर चुके होते हैं या कर रहे होते हैं, जिससे बच्चे भावनात्मक रूप से अपने माता-पिता के प्रति विश्वास की भावना खो बैठते हैं। विश्वास के जाने से संबंधों में अपेक्षित अनिवार्य श्रद्धा ख़त्म होती जाती है और वे अपनी पुरानी पीढ़ी को सम्मान नहीं दे पाते। यदि आप किसी को कोई काम करने से मना करते हैं और खुद उस काम को करते हैं तो उसके मन से आपके प्रति श्रद्धा स्वाभाविक रूप से चली जाएगी। अतः उपदेशक बनने से पहले हमें अपने सिद्धांत पर अमल करने वाला कर्ता होना चाहिए। जनरेशन गैप हक़ीक़त में कु...

एक योगी (A yogi...)

एक योगी आदमी वासना की गुलामी में जो न करे वह थोड़ा है। आदमी अपने विवेक से अँधा होकर अपना सारा जीवन वासना की भट्टी में झोंक देता है फिर भी उसे तृप्ति नहीं मिलती और उसे जितने ही जीवन मिलें वह उन सबको वासना की इस भट्टी में झोंक देना चाहता है। हे प्रभु! तेरे जीव के जीवन में ये कैसी माया है? जिस प्रकार पतंगा जानता है कि चिराग की लौ में वह जल-भुन कर राख हो जाएगा पर फिर भी वहीं-वहीं मण्डराकर अंत में उस अग्निशिखा में कूद कर अपनी जान दे देता है। उसी प्रकार ये आदमी वासनाओं और कामनाओं में लिप्त होकर अपना जीवन बर्बाद कर लेता है।   मैंने बचपन में एक योगी की कहानी सुनी थी, वह ऐसी थी कि एक साधु ने किसी कारणवश क्रोध में आकर एक आदमी को यह श्राप दे दिया कि जा तेरा पूरा खानदान वासना की आग में झुलसता रहेगा और यह आग तब तक नहीं बुझेगी, जब तक कि तेरे खानदान में एक भी आदमी जिन्दा रहेगा और तब से यह सिलसिला चला आ रहा था। पीढ़ी दर पीढ़ी इस अभिशाप को झेलती चली आ रही थी और अपना जीवन नरक बनाती आ रही थी। इस प्रकार दिन बीतने पर उसी खानदान का एक आखिरी वारिस पैदा हुआ। भाग्य से उसे अच्छा वातावरण मिला, सत...