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Showing posts from November, 2019

अंतर्प्रेरणा... (Instinct...)

अंतर्प्रेरणा... पूर्णता एक शब्द है, एक मापदंड के लिए, लेकिन वास्तव में पूर्णता की स्थिति कभी प्राप्त नहीं की जा सकती। जिसे हम एक मापदंड के लिए पूर्णता कहते हैं, दूसरे बड़े मापदंड पर वह अपूर्ण सिद्ध होती है। जिस प्रकार एक गिलास में पानी पूरा भरा हुआ है और उस पानी को किसी बड़े जार में डाल दिया जाए तो जार अपूर्ण सिद्ध होगा अतः पानी कभी पूर्ण या अपूर्ण नहीं नहीं होता, केवल मापदंड पूर्ण-अपूर्ण हो सकते हैं। ठीक इसी प्रकार ज्ञान कभी पूर्ण नहीं हो सकता। जो यह कहते हैं कि मुझे इस विषय में पूर्ण ज्ञान है वे मूर्ख ये नहीं जानते कि मस्तिष्क का मापदंड बहुत स्थूल है इसलिए कोई भी किसी भी विषय में पूर्ण ज्ञानी नहीं हो सकता, ज्ञान तो अथाह है। केवल वह दूसरों के मापदंड से कम या ज्यादा हो सकता है... मेरा लक्ष्य... ज़िंदगी की राह पर चलते-चलते लगता है कि अपने-आप ही राहें आसान होती जा रही हैं लेकिन जैसा कि मानव स्वभाव है कि हर मंज़िल को वह केवल एक पड़ाव ही समझता है, उसी तरह मैं भी अपनी ज़िंदगी की छोटी-बड़ी सफलताओं   को पड़ाव ही समझता हूँ... एक-एक करके हर रात गुजरती जाती है और सपनों की कड़ियों में ए...

तन्हाई से बातें... (Talk to loneliness...)

  तन्हाई से बातें ... हरेक व्यक्ति के जीवन में सुनहरा अवसर भेष बदल कर जरूर आता है लेकिन वे जो समय रहते सचेत हो जाते हैं और अवसर को पहचान कर उसे पकड़ लेते हैं, उसका उपयोग कर लेते हैं, चमक जाते हैं।  जो इसे खो देते हैं वे अपना जीवन बोझ की तरह बिताते हैं...  -२३ फरवरी १९९७ संस्कारों के धरातल पर, विचारों और भावनाओं की पृष्ठभूमि पर ही आदर्शों और आचरणों का निर्माण होता है। -३ अप्रैल १९९७ आरम्भ से ही बुद्धि की सत्ता बल की सत्ता पर शासन करती आई है और सदैव ही बल  बुद्धि पर निर्भर रहा है इसलिए यदि अपने आपको सबसे अधिक बलवान बनाना हो तो अपनी बुद्धि को बलवान बनाओ। -४ अप्रैल १९९७ सत्य हमें निडरता व साहस प्रदान करता है। -१२ अप्रैल १९९७ सत्य से हमें बल मिलता है, वह बल जो आत्मविश्वास को बढ़ता है और आत्मविश्वास से आत्म-संतृप्ति प्राप्त होती है, इसलिए सत्य को छिपाने के लिए कोई भी कार्य ऐसा नहीं करना चाहिए जो हमें अपनी ही नजरों से गिरा दे... -१३ अप्रैल १९९७ नदियों की वे धाराएं, जो अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाने के लिए दिशा-विहीन होकर अलग बहने लगती हैं तथा वास्तवि...

ज़िंदगी क्या है... (What is Life...)

ज़िंदगी क्या है ... ज़िंदगी , एक समझौता है चंद सांसों का ... ज़िंदगी वह क्षितिज है , जो दूर से ज़मीन और आसमान को एक करती है , पर वास्तव में क्या है ? एक भ्रम जिसमे सभी भ्रमित हैं ... ज़िंदगी रेगिस्तान की तपती धूप में वह मारीचिका है , जो मन के पथिक को दुःख के मरुस्थल में प्यासा भटकाती है। ज़िंदगी एक अनसुलझी पहेली है , ज़िंदगी एक ऐसा तिलिस्म है कि इसके एक दरवाजे को खोल कर हम समझते हैं कि हमने सफलता हासिल कर ली , लेकिन दरवाजा खोलने पर हम क्या पाते हैं ? हम पाते हैं एक और दरवाजा , और फिर उसे खोलने के लिए जुट जाते हैं। उसे खोल कर हम फिर वही स्थिति पाते हैं कि सामने एक और बंद दरवाजा मौजूद है खोलने के लिए , ठीक वैसे ही , जैसे एक आईने के सामने दूसरे आईने को रखने पर उसके असंख्य प्रतिबिम्ब बनते जाते हैं , आईने के अंदर आईना .. आईने के अंदर आइना ... आईने के अंदर आइना , और इस तरह प्रतिबिम्ब के छोर को ढूंढ नहीं पाते। ज़िंदगी एक टूटता हुआ तारा...