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परमसत्य की खोज...23 (Discovery of the absolute truth ... 23)

  (अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...23 25 दिसम्बर 2003   पहले मैं स्वयं से घृणा करता था, स्वयं से लड़ता था, खुद को सजाएं देता था, अब मैं स्वयं से प्रेम करता हूँ। -8:42 A.M. मैं निरंतर बढ़ता चला आ रहा हूँ, निम्नतर सत्य से उच्चतर सत्य की ओर, सत्य से परम सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, शक्ति के अगाध समुद्र की ओर। -9:40 A.M. बाहरी नशा होता है आत्म-विस्मृति के लिए किन्तु जो आत्म-स्मृति का नशा चख लेता है वह कभी इस नशे से बाहर आना नहीं चाहता। बाहरी नशे में आदमी निरंतर खोता चला जाता है लेकिन आत्मस्मृति के नशे में आदमी जितने गहरे जाते जाता है उतना ही निरंतर पाते चला जाता है। -9:50 A.M. जब हम स्वयं को इस समग्र विश्व के हिस्से के रूप में देखते हैं तो व्यक्तिगत, जातिगत और देश-काल -निमित्तगत बंधनों से मुक्त हो जाते हैं, रिश्ते और नातों के संकुचित अर्थों से मुक्त हो जाते हैं। -10:50 A.M. छोटे से छोटे कार्यों को यदि व्यापक दृष्टि रखते हुए किया जाए तो वे महान बन जाते हैं। -10:55 A.M. एक छोटा बच्चा कितनी ही भीड़ में क्यों न हो, अपने माँ-बाप का चेहरा पहचान लेता है और दौड़...