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Showing posts from September, 2020

परमसत्य की खोज...2 (Discovery of the absolute truth ... 2)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...2 3 दिसम्बर २००३ आज की यात्रा का आरम्भ भी विगत रात्रि के स्वप्न से ही करते हैं- स्वप्न - मैं घर से निकलकर मुख्य सड़क पर टहल रहा हूँ। सड़क के किनारे एक टपरे से मैं दो सिगरेटें खरीदता हूँ।, एक वहीँ पी लेता हूँ   और दूसरी जेब में रख लेता हूँ । आगे जाकर एक मित्र की दुकान पर पहुँचता हूँ। । उसके पास भी दो-तीन अलग-अलग ब्रांड के सिगरेट के पैकेट रखे हैं, वह भी सिगरेट ऑफर करता है और कुछ खास इच्छा न होते हुए भी मैं उससे सिगरेट लेकर जला लेता हूँ। इसके बाद हम दोनों घूमने निकलते हैं। आगे चलकर वह फिर एक पान ठेले से सिगरेट खरीदता है और मुझे फिर से ऑफर करता है, मैं इनकार करना चाहता हूँ पर उसके आग्रह के आगे इंकार नहीं कर पाता और एक और सिगरेट पी लेता हूँ। अब हम सड़क पार करने वाले हैं पर तभी कोई जुलूस निकल पड़ता है। बैनर, झंडे, धूल और धुआं उड़ाते वाहन निकलते जा रहे हैं और हम सड़क के इसी किनारे खड़े होकर उस काफिले को देख रहे हैं। स्वप्नफल का अनुमान – सिगरेट मेरी दुर्बलता को दर्शा रही है। मैं चाहकर भी इस दुर्बलता को नहीं छोड़ पा रहा हूँ। वह मित्र मेरा ही नकार...

परमसत्य की खोज...१ (Discovery of the absolute truth ... 1)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...१ २ दिसम्बर २००३ जो नकली था, झूठा था, आभासी था, मिथ्या था, भ्रम था, दम्भ था, वह टूट गया, जो सत्य है वह बचा रह गया। -७:२५ a.m. अब तक मैं सपनों को महत्वहीन समझता रहा, मिथ्या कल्पना समझता रहा मन की, किन्तु अब मैं समझता हूँ कि हमें इन कल्पनाओं में से भी सत्य को ढूंढकर निकलना होगा। तो आइये, आगे की यात्रा शुरू करते हैं विगत रात्रि के स्वप्नों से- पहला स्वप्न – मैं कुछ लोगों के साथ एक लाश को स्ट्रेचर पर लिए घूम रहा हूँ, अपनी भूतपूर्व शाला की विभिन्न कक्षाओं में और सभी कमरों में उस लाश को रखने के लिए उचित जगह की तलाश कर रहा हूँ। हालांकि कमरे तो पूरी तरह खाली हैं परंतु आश्चर्य कि सभी कमरों की छतों से बड़ी तेज मूसलाधार बरसात हो रही है। मैं लोगों के साथ उस लाश को हर कमरे में रखने की कोशिश करता हूँ पर साथ के लोग चिल्ला उठते हैं - 'अरे! यहाँ तो लाश सड़ जाएगी, चलो कोई और कमरा देखते हैं।' इस तरह हम बारी-बारी से सभी कमरों में जाकर उस लाश को रखने की कोशिश करते हैं। पर हर कमरे में उसी तरह मूसलाधार वर्षा मिलती है, फिर हम ऊपर के कमरों में जाते हैं। इस ...

सत्य की खोज...18 (Discovery of the truth...18)

( अंतर्यात्रा) सत्य की खोज... 18 2 दिसम्बर २००३ अब मैं अनुभव कर रहा हूँ कि राम भी मैं ही था, कृष्ण भी मैं ही था, बुद्ध भी मैं ही था, ईसा भी मैं ही था, महावीर भी मैं ही था, मुहम्मद भी मैं ही था, विवेकानंद भी मैं ही था, ओशो भी मैं ही था। मैं ही तो था इन सब में क्योंकि मैं शक्ति हूँ सत्य की। कहीं मेरी बातों में आकर मुझे भी इन्ही लोगों की तरह पूजने मत लग जाना, नहीं तो मेरी सत्य की खोज का बंटाढार हो जाएगा। अगर मेरी बातों में विश्वास है तो अपने अंदर जगा कर देखना इन सबको। मैं उतने ही आत्मविश्वास से कह रहा हूँ कि आप भी वही हैं, पर मैं जान चुका हूँ और आप अनभिज्ञ हैं। यदि जानना चाहते हैं तो शुरू कर दीजिये 'सत्य की खोज'। -१२:१५ a.m. सभी धर्म सत्य से ही शुरू हुए हैं किन्तु इतनी सदियों से लोग चलते-चलते भटक गए हैं इन रास्तों पर, इसलिए मैं आया हूँ रास्ता दिखाने।  लोग इन रास्तों पर चलने की बजाय इन्हें सिन्दूर, अगरबत्ती लगाकर पूज रहे हैं, नारियल फोड़कर प्रसाद चढ़ा रहे हैं कि परमात्मा इस रास्ते से चलकर इनके पास आ जाए पर न तो रास्ते चलते हैं और न ही वो परमात्मा। चलना तो लोगों को ...