( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...2 3 दिसम्बर २००३ आज की यात्रा का आरम्भ भी विगत रात्रि के स्वप्न से ही करते हैं- स्वप्न - मैं घर से निकलकर मुख्य सड़क पर टहल रहा हूँ। सड़क के किनारे एक टपरे से मैं दो सिगरेटें खरीदता हूँ।, एक वहीँ पी लेता हूँ और दूसरी जेब में रख लेता हूँ । आगे जाकर एक मित्र की दुकान पर पहुँचता हूँ। । उसके पास भी दो-तीन अलग-अलग ब्रांड के सिगरेट के पैकेट रखे हैं, वह भी सिगरेट ऑफर करता है और कुछ खास इच्छा न होते हुए भी मैं उससे सिगरेट लेकर जला लेता हूँ। इसके बाद हम दोनों घूमने निकलते हैं। आगे चलकर वह फिर एक पान ठेले से सिगरेट खरीदता है और मुझे फिर से ऑफर करता है, मैं इनकार करना चाहता हूँ पर उसके आग्रह के आगे इंकार नहीं कर पाता और एक और सिगरेट पी लेता हूँ। अब हम सड़क पार करने वाले हैं पर तभी कोई जुलूस निकल पड़ता है। बैनर, झंडे, धूल और धुआं उड़ाते वाहन निकलते जा रहे हैं और हम सड़क के इसी किनारे खड़े होकर उस काफिले को देख रहे हैं। स्वप्नफल का अनुमान – सिगरेट मेरी दुर्बलता को दर्शा रही है। मैं चाहकर भी इस दुर्बलता को नहीं छोड़ पा रहा हूँ। वह मित्र मेरा ही नकार...
It is a little lamp of truth, which is giving dim light of truth but it has thousands of suns inside it...