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Showing posts from 2019

'ऐसा क्यों होता है?' (Why does this happen...)

' ऐसा क्यों होता है? ' ऐसा क्यों होता है कि मुझे अपने परिश्रम का फल नहीं मिलता, जैसे कोई किसान बड़ी मेहनत और लगन से अपने खेत को पसीने से सींचता है और फसल पकने पर खलिहान में आग लग जाती है और उसका सारा परिश्रम निरर्थक हो जाता है। ऐसा क्यों होता है कि हर बार एक तूफ़ान आकर मेरे सारे प्रयासों को असफल कर देता है। यह मेरे प्रयासों में कोई कमी है या फिर भाग्य का कोई खेल... कि परिस्थितियां मुझे आजमाना चाहती हैं... -२१ जुलाई १९९९ मैं सोचता हूँ... सोचता हूँ और बस सोचता चला जाता हूँ कि ये दुनिया वैसी क्यों नहीं है, जैसा हम इसे बनाना चाहते हैं, जैसा हम इसे महसूस करना चाहते हैं? सपनों, और हकीकत में इतना अंतर क्यों? कल्पना और वास्तविकता में इतना अंतर क्यों? सपनों और कल्पनाओं का सकारात्मक धरातल वास्तविकता में आते ही नकारात्मकता में क्यों बदल जाता है? इन सब सवालों का जवाब मैं बचपन से ढूंढता आ रहा हूँ, खुद में, अपने आसपास, जहाँ तक नजरें जाती हैं पर दुनिया की बाद से बदतर शक्ल नजर आती है। दुनिया का इतना गन्दा, घिनौना चेहरा देख चुका हूँ कि नहीं चाहता की इसे कोई और भी देखे, जो अपने भविष्...

कर्म तथा चरित्र... (Deeds and character...)

कर्म तथा चरित्र... कर्म तथा चरित्र एक दूसरे के पूरक हैं। पूर्व में किये गए कर्म चरित्र का गठन करते हैं तथा चरित्र बाद में किये जाने वाले कर्मों को निर्धारित करता है। -१६ अगस्त १९९८ अतीत वर्तमान को बनाता है और वर्तमान भविष्य को। अतीत पर तो हमारा अधिकार नहीं होता अतः हमें वर्तमान को संवारना चाहिए। -१७ अगस्त १९९८ मुझे अपने उच्च आदर्शों, महत्वाकांक्षाओं और स्वप्नों को लेकर प्रयास करते हुए असफल होकर मर जाना भी स्वीकार है लेकिन इनसे समझौता करके, संसार के कड़वे अनुभवों को अपनाकर घिसी-पिटी लीक पर घिस-घिस कर जीना स्वीकार नहीं... -३ सितम्बर १९९८ पहले के ज़माने में हुस्न और जिस्म की नुमाइश के बाज़ार कोठे और वेश्यालय हुआ करते थे पर आजकल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और घटिया साहित्य के जरिये ये घर-घर तक आ पहुंचे हैं। -२६ मई १९९९ कुछ अनसुलझे सवाल ऐसे होते हैं, जिन्हे अनसुलझा छोड़ देना ही उचित होता है अन्यथा कभी-कभी अनसुलझे सवालों को सुलझाते-सुलझाते सुलझाने वाला खुद ही उलझ जाता है।   -७ जून १९९९ दाम्पत्य जीवन का अर्थ है, अपने सारे सुख-दुःख-सपने-महत्वाकांक्षाएं एक-दूसरे के बीच बाँट ल...

मेरी दुविधा... (my dilemma)

मेरी दुविधा ... समस्या... हर बार की तरह आज भी मैं दुविधा में फंस गया हूँ। एक तराजू है, जिसके एक पलड़े में मेरे अपने सिद्धांत और मेरा लक्ष्य हैं और दूसरे पलड़े में संसार और धन-दौलत है। यदि मैं सिद्धांत के पलड़े में जाता हूँ तो मेरा सांसारिक पक्ष हल्का हो जाता है और यदि दूसरे पक्ष में जाता हूँ तो मेरे सिद्धांत झूठे पड़ जाते हैं।  यह समस्या नई नहीं हैं। मुझसे पहले भी कई लोगों ने इसे झेला है और शायद मेरे बाद भी कुछ लोग इसे झेलेंगे। आज मेरे लक्ष्य के लिए धन की आवश्यकता है लेकिन यदि मैं इसकी पूर्ति में लग जाता हूँ तो मुझे सांसारिक प्रपंचों में आना पड़ेगा, अपने ही बनाए सिद्धांतों को पैरों तले रौंदना होगा। यदि मैं ऐसा नहीं करता हूँ तो लक्ष्य जहाँ का वहीँ रह जाता है और यदि ऐसा करता हूँ तो अपने अस्तित्व पर कलंक का धब्बा लगाता हूँ। सांसारिकता में आने पर पथभ्रष्ट होना पड़ेगा। यह संसार मेरे अस्तित्व और लक्ष्य के बीच बाधा  बन गया है। अकर्मण्य की भांति बैठने पर मन कोसने लगता है, धिक्कारने लगता है और कर्ता बनने पर पथभ्रष्ट हो जाने का भय है। क्या करूँ क्या नहीं, समझ नहीं आता? ...

अंतर्प्रेरणा... (Instinct...)

अंतर्प्रेरणा... पूर्णता एक शब्द है, एक मापदंड के लिए, लेकिन वास्तव में पूर्णता की स्थिति कभी प्राप्त नहीं की जा सकती। जिसे हम एक मापदंड के लिए पूर्णता कहते हैं, दूसरे बड़े मापदंड पर वह अपूर्ण सिद्ध होती है। जिस प्रकार एक गिलास में पानी पूरा भरा हुआ है और उस पानी को किसी बड़े जार में डाल दिया जाए तो जार अपूर्ण सिद्ध होगा अतः पानी कभी पूर्ण या अपूर्ण नहीं नहीं होता, केवल मापदंड पूर्ण-अपूर्ण हो सकते हैं। ठीक इसी प्रकार ज्ञान कभी पूर्ण नहीं हो सकता। जो यह कहते हैं कि मुझे इस विषय में पूर्ण ज्ञान है वे मूर्ख ये नहीं जानते कि मस्तिष्क का मापदंड बहुत स्थूल है इसलिए कोई भी किसी भी विषय में पूर्ण ज्ञानी नहीं हो सकता, ज्ञान तो अथाह है। केवल वह दूसरों के मापदंड से कम या ज्यादा हो सकता है... मेरा लक्ष्य... ज़िंदगी की राह पर चलते-चलते लगता है कि अपने-आप ही राहें आसान होती जा रही हैं लेकिन जैसा कि मानव स्वभाव है कि हर मंज़िल को वह केवल एक पड़ाव ही समझता है, उसी तरह मैं भी अपनी ज़िंदगी की छोटी-बड़ी सफलताओं   को पड़ाव ही समझता हूँ... एक-एक करके हर रात गुजरती जाती है और सपनों की कड़ियों में ए...

तन्हाई से बातें... (Talk to loneliness...)

  तन्हाई से बातें ... हरेक व्यक्ति के जीवन में सुनहरा अवसर भेष बदल कर जरूर आता है लेकिन वे जो समय रहते सचेत हो जाते हैं और अवसर को पहचान कर उसे पकड़ लेते हैं, उसका उपयोग कर लेते हैं, चमक जाते हैं।  जो इसे खो देते हैं वे अपना जीवन बोझ की तरह बिताते हैं...  -२३ फरवरी १९९७ संस्कारों के धरातल पर, विचारों और भावनाओं की पृष्ठभूमि पर ही आदर्शों और आचरणों का निर्माण होता है। -३ अप्रैल १९९७ आरम्भ से ही बुद्धि की सत्ता बल की सत्ता पर शासन करती आई है और सदैव ही बल  बुद्धि पर निर्भर रहा है इसलिए यदि अपने आपको सबसे अधिक बलवान बनाना हो तो अपनी बुद्धि को बलवान बनाओ। -४ अप्रैल १९९७ सत्य हमें निडरता व साहस प्रदान करता है। -१२ अप्रैल १९९७ सत्य से हमें बल मिलता है, वह बल जो आत्मविश्वास को बढ़ता है और आत्मविश्वास से आत्म-संतृप्ति प्राप्त होती है, इसलिए सत्य को छिपाने के लिए कोई भी कार्य ऐसा नहीं करना चाहिए जो हमें अपनी ही नजरों से गिरा दे... -१३ अप्रैल १९९७ नदियों की वे धाराएं, जो अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाने के लिए दिशा-विहीन होकर अलग बहने लगती हैं तथा वास्तवि...

ज़िंदगी क्या है... (What is Life...)

ज़िंदगी क्या है ... ज़िंदगी , एक समझौता है चंद सांसों का ... ज़िंदगी वह क्षितिज है , जो दूर से ज़मीन और आसमान को एक करती है , पर वास्तव में क्या है ? एक भ्रम जिसमे सभी भ्रमित हैं ... ज़िंदगी रेगिस्तान की तपती धूप में वह मारीचिका है , जो मन के पथिक को दुःख के मरुस्थल में प्यासा भटकाती है। ज़िंदगी एक अनसुलझी पहेली है , ज़िंदगी एक ऐसा तिलिस्म है कि इसके एक दरवाजे को खोल कर हम समझते हैं कि हमने सफलता हासिल कर ली , लेकिन दरवाजा खोलने पर हम क्या पाते हैं ? हम पाते हैं एक और दरवाजा , और फिर उसे खोलने के लिए जुट जाते हैं। उसे खोल कर हम फिर वही स्थिति पाते हैं कि सामने एक और बंद दरवाजा मौजूद है खोलने के लिए , ठीक वैसे ही , जैसे एक आईने के सामने दूसरे आईने को रखने पर उसके असंख्य प्रतिबिम्ब बनते जाते हैं , आईने के अंदर आईना .. आईने के अंदर आइना ... आईने के अंदर आइना , और इस तरह प्रतिबिम्ब के छोर को ढूंढ नहीं पाते। ज़िंदगी एक टूटता हुआ तारा...