मैं और वो... मैं- क्या तुम्हे लगता है कि ये फैसला तुमने ठीक लिया है? कभी कभी हम अपने फैसले जज़्बातों की रौ में आकर करते हैं और फिर पछताते रह जाते हैं। वो- कभी-कभी फैसले हम नहीं करते, ज़िन्दगी करती है और हम खड़े देखते रह जाते हैं... शतरंज की बिसात पर मोहरों की तरह... हम चलते चले जाते है पर चाल ज़िंदगी की होती है... मैं- क्या तुम्हे लगता है कि तुम जीवन के इस मोड़ पर आकर मेरे साथ-साथ चल सकोगे? मैं तो हर कदम पर कई बार ठुकराया गया हूँ। दुनिया की भीड़ में कुचला गया हूँ...मेरा जीवन सिर्फ प्यास ही प्यास है, तड़प ही तड़प है, और कुछ नहीं, मैं तुम्हे क्या दे पाउँगा...? वो- ये भी तो हो सकता है कि तुम मुझमे समा जाओ और मैं तुममे समा जाऊं और दोनों का वजूद एक-दूसरे के लिए दरिया बन जाए और हम दोनों की प्यास बुझ जाए... मैं- दो प्यासे एक-दूसरे की प्यास को बढ़ा तो सकते हैं मगर बुझा नहीं सकते और दो दरिया भी कभी एक साथ नहीं चल सकते। जो खुद प्यासा हो उसका वजूद क्या दूसरे के लिए दरिया बनेगा...? वो- खैर! मैं तो शुरू से दुनिया के रिवाज़ों की पटरी पर रेल की तरह हूँ, जो चाहकर भी इससे जुदा नहीं...
It is a little lamp of truth, which is giving dim light of truth but it has thousands of suns inside it...