Skip to main content

Posts

Showing posts from March, 2020

मैं और वो... (I and she...)

मैं और वो... मैं- क्या तुम्हे लगता है कि ये फैसला तुमने ठीक लिया है? कभी कभी हम अपने फैसले जज़्बातों की रौ में आकर करते हैं और फिर पछताते रह जाते हैं। वो- कभी-कभी फैसले हम नहीं करते, ज़िन्दगी करती है और हम खड़े देखते रह जाते हैं... शतरंज की बिसात पर मोहरों की तरह... हम चलते चले जाते है पर चाल ज़िंदगी की होती है...   मैं- क्या तुम्हे लगता है कि तुम जीवन के इस मोड़ पर आकर मेरे साथ-साथ चल सकोगे? मैं तो हर कदम पर कई बार ठुकराया गया हूँ। दुनिया की भीड़ में कुचला गया हूँ...मेरा जीवन सिर्फ प्यास ही प्यास है, तड़प ही तड़प है, और कुछ नहीं, मैं तुम्हे क्या दे पाउँगा...? वो- ये भी तो हो सकता है कि तुम मुझमे समा जाओ और मैं तुममे समा जाऊं और दोनों का वजूद एक-दूसरे के लिए   दरिया बन जाए और हम दोनों की प्यास बुझ जाए... मैं- दो प्यासे एक-दूसरे की प्यास को बढ़ा तो सकते हैं मगर बुझा नहीं सकते और दो दरिया भी कभी एक साथ नहीं चल सकते। जो खुद प्यासा हो उसका वजूद क्या दूसरे के लिए दरिया बनेगा...? वो- खैर! मैं तो शुरू से दुनिया के रिवाज़ों की पटरी पर रेल की तरह हूँ, जो चाहकर भी इससे जुदा नहीं...

उलझने... (Mazes...)

उलझने... जुगनू चमकते थे तो लगता था कि सहर होने वाली है... पर अपनी किस्मत में तो काली अँधेरी रात ही थी... सोचा कि उलझनों को सुलझा लूँगा... पर इन्हे सुलझाते-सुलझाते खुद एक उलझन बन गया...   रिश्तों की दरारों में एक ज़ख्म भी भर नहीं पाता था की और दो चार नए ज़ख्म मिल जाते थे... उम्र यूँ ही गुजरती जा रही थी... ज़ख्मों को गिनने और सहलाने में... सोचता था कि शायद कोई मसीहा मिल जाए... जो कभी मेरे दर्द को समझ सके... पर ज़िंदगी केवल पूरी हो जाने वाली हसरतें ही नहीं हुआ करती... प्यास भी होती है... नफरतों की आंधी हर शै बहा कर ले गई... अब कुछ भी नहीं बचा मेरे पास... दूसरों को ख़ुशी देने की तमन्ना भी ग़मों के समंदर ही लेकर आई... किसी का भी किसी चीज़ पर अख्तियार नहीं... हवाओं के इशारों पर उड़ता हुआ पत्ता जानता है कि उसका हवाओं पर कोई अख्तियार नहीं... मगर फिर भी हवाओं से लड़ता चला जाता है... -२० जुलाई २००२ Mazes...   Fireflies shone then it seemed that dawn is about to come... But my luck had only a black dark night... I thought I will solve the mazes... ...

गुफ़्तग़ू... (Interlocution..)

गुफ़्तग़ू... ·                      ये रात की तन्हाई... ये रात का सन्नाटा... न जाने क्या कह रहे हैं... अपनी ही गुनगुनाती आवाज़ एक नए आत्मिक संगीत को जन्म दे रही है... ज़हन में कल्पनाओं के पर फड़फड़ाने लगे हैं... ·                      ये रात की तन्हाई... ये रात का सन्नाटा... रौशनी घुप्प अँधेरे को चीरती जा रही है... अँधेरा रौशनी को निगलता जा रहा है... रौशनी अँधेरे में सिमटती जा रही है... ·                 ये रात की तन्हाई... ये रात का सन्नाटा... दिल-ऐ-नादाँ फिर से अजीब सी सनकों और फ़ितरतों से घिरने लगा है... कभी एक पल में इस पर रोने का जी करता है तो कभी एक पल में इस पर हंसने का जी करता है... वो ही जाने... ये मुश्किलें हैं कि हल... ·                   ...

मोहभंग... (Disillusionment...)

मोहभंग ... जैसे-जैसे ज़िंदगी की रेल आगे बढ़ती चली जा रही थी... रिश्तों के मोहजाल का कुहरा छंटता चला जा रहा था... मक़ाम पर मक़ाम ग़ुजरते जा रहे थे और रिश्ते-नातों की परिभाषाएँ सुलझतीं जा रहीं थी... एक-दूसरे के दिलों से जुड़े भावनाओं के तार स्वार्थ के खिंचाव के कारण उलझते और टूटते जा रहे थे... और रह-रह के सामने आ रहा था स्वयं के वजूद का प्रश्न ... दुनिया के रिश्ते-नातों के जंगल में गूंजता एक मूक प्रश्न... जैसे-जैसे मैं खुद में डूबने की कोशिश करता, वैसे-वैसे ये दुनिया मुझमे डूबने का प्रयत्न करती... और मेरे अंदर की गहराइयों में भावनाओं के समुद्र में हलचल मचाती  जाती... और उलझने पैदा करती जाती... पर शायद ये उलझने भी मेरे भविष्य की किताब के चेप्टर हैं...  -११ जून २००२  Disillusionment... As the train of life was going to move forward... The haze of pishogue of relationships was scattering... Territories were passing one by one and the definitions of the relationships-kinships were solving... The strings of emotions associated with each ot...

सावधान ! शायद आपके अंदर भी छिपा है एक बम... (Beware! Probably you also have hidden a bomb inside...)

सावधान ! शायद आपके अंदर भी छिपा है एक बम... अकेला आदमी एक विस्फोटक बम की तरह होता है बशर्ते वह अपने अंदर छिपी हुई क्षमता को पहचान ले। एक अकेले आदमी में इतनी क्षमता छिपी होती है कि वह सारी दुनिया में उथल-पुथल मचा सकता है। पदार्थ के सबसे छोटे भाग एक अकेले नाभिक में इतनी क्षमता होती है कि वह सारी दुनिया में तहलका मचा सकता है। समाज आदमी के इसी अकेलेपन के विस्फोट से डरता है, इसी अकेलेपन को ख़त्म करने के लिए तरकीबें जुटाता रहता है , एक अकेले आदमी को दुश्मन के नज़रिये से देखता है , उसके चारों तरफ नियमों, सीमाओं और बंधनों के मकड़जाल फैलाता है ताकि उसमे छिपी हुई शक्तियां इसी जाल से लड़ने और इनको तोड़ने में उलझकर ख़त्म होती चली जाएँ। जिस तरह एक शिकार खतरनाक शिकार को पकड़ने या मारने के लिए आकर्षक चारे का उपयोग करता है यह समाज व्यक्ति की अदृश्य विस्फोटक शक्तियों को मारने के लिए स्त्री अथवा पुरुष का चारे के रूप में प्रयोग करता है , एक अकेले पुरुष के साथ एक स्त्री को जोड़ देता है या एक अकेली स्त्री के साथ एक पुरुष को जोड़ देता है और फिर शुरू हो जाता है सामाजिक दायरों, नियमों, बंधनों औ...

अंतहीन...अविराम... (Endless ... non-stop...)

अंतहीन...अविराम... ज़िन्दगी की राह पर चलते-चलते अचानक यूँ लगा... जैसे राहें अचानक ख़त्म हो गईं और जीने के लिए कोई राह नहीं बची... मैं उदासीन होकर थक-हारकर बैठ गया... पर मेरी आत्मा के किसी छोर से आवाज़ आई कि चलते-चलते राही ख़त्म हो जाते हैं पर राहें ख़त्म नहीं होतीं... ये तेरी नज़रों का धोखा है... एक फरेब है... चल! आगे बढ़... थक-हार कर बैठ जाना तेरा काम नहीं... तेरा काम है आखिरी सांस तक आगे बढ़ते जाना ... चलते जाना... और जैसे कोई मेरा हाथ थामकर मुझे आगे ले जाने लगा...   और चंद कदमो पर ही चलकर मुझे रास्ता साफ़ नज़र आने लगा... राह खत्म हो जाने का फरेब केवल एक अँधा मोड़ था... हाँ! केवल एक अँधा मोड़... अक्सर हम मोड़ को राह का खत्म समझ बैठते हैं और राह छोड़ कर खड़े हो जाते हैं... पर जीवन केवल दुखद अनुभूतियाँ नहीं है... बल्कि एक दिव्य शक्ति भी है... -७ जून २००२ Endless ... non-stop... While moving on the way of the life, suddenly it seemed... As paths were ended abruptly and there is no way left to live... ...

राज़... रात का... (Secret ... of the night...)

राज़... रात का... उसने हर चीज़ के दो रूप बनाए... हर सिक्के के दो पहलू बनाए... दहकता सूरज बनाया तो चमकता चाँद भी बनाया... ज़मीन बनाई तो आसमान भी बनाया... नदियां बनाई तो पहाड़ भी बनाए... बेजान पत्थर बनाए तो जज़्बातों से सराबोर इंसान भी बनाए... फिर उसने इंसानी फितरत के भी दो रुप बनाए... एक तो सच्चाई और भलाई का और दूसरा शैतानी बुराई का... उसने दिन बनाए नेकी और सच्चाई को उभारने के लिए तो रातें बनाईं काले गुनाहों को रात की कालिख में छिपाने के लिए... हर वो काम जो इंसान दिन के उजाले में करने से डरता है, रात के अँधेरे में आसानी से कर जाता है... रात के अँधेरे में उसके अंदर सोया हुआ शैतान जाग जाता है... हर वो काम जो इंसान को रात के अँधेरे में छिपकर करना पड़े और इंसान को कमजोर बनाए, गुनाह है... -१७ मई २००२ परोपकारी हर परिस्थिति में परोपकार ही करते हैं चाहे कोई उनकी प्रशंसा करे चाहे बुराई। प्रशंसा या निंदा उनके कर्तव्य पथ को प्रभावित नहीं करती क्योंकि उनकी प्रकृति ही परोपकार करने की होती हैं। उनका अस्तित्व ही परोपकार करने के लिए बना होता है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार की एक...

बेखुदी...कब तक? (Senselessness ... How long?)

बेखुदी...कब तक? साक़ी (ईश्वर) शराब (ज़िंदगी) उड़ेलता रहा और पैमाने छलकते रहे... मैं पीता गया और खुमार बढ़ता गया... पैमाने बदलते गए... और जाम छलकते रहे... महफ़िल में सुरूर बढ़ता गया... और मदहोशी बढ़ती गई... और अचानक महफ़िल इन्तहां ( समाप्ति ) पर आ गई... मयकश पीते-पीते झूमते-झूमते बेहोश होने लगे ... लेकिन मुझमें अभी थोड़ा सा ख़ुलूस (होश) बाकी था... साक़ी के चेहरे पर अब तक नक़ाब था...   पीनेवाले जाम के नशे में साक़ी के हुस्न को भूल गए ... मेरा खुलूस मुझसे कह रहा था कि इससे पहले कि तू भी बेखुद हो जाए... नक़ाब उलट दे ... और हुस्न के ताब का दीदार कर ले ... और मैं अपनी बेखुदी से लड़ता गया ... लड़ता गया ... और अब तक लड़ता आ रहा हूँ ... -२९ अप्रैल २००२ Senselessness ... How long?   Barmaid (God) had been pouring wine (life) and glasses had been spilling... I had been drinking and hangover had been rising... Glasses had been changing... And drinks had been overflowing... Aftereffect of intoxication had been growing in the gathering... Inebria...