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'ऐसा क्यों होता है?' (Why does this happen...)


'ऐसा क्यों होता है?'

ऐसा क्यों होता है कि मुझे अपने परिश्रम का फल नहीं मिलता, जैसे कोई किसान बड़ी मेहनत और लगन से अपने खेत को पसीने से सींचता है और फसल पकने पर खलिहान में आग लग जाती है और उसका सारा परिश्रम निरर्थक हो जाता है।
ऐसा क्यों होता है कि हर बार एक तूफ़ान आकर मेरे सारे प्रयासों को असफल कर देता है। यह मेरे प्रयासों में कोई कमी है या फिर भाग्य का कोई खेल... कि परिस्थितियां मुझे आजमाना चाहती हैं...
-२१ जुलाई १९९९
मैं सोचता हूँ... सोचता हूँ और बस सोचता चला जाता हूँ कि ये दुनिया वैसी क्यों नहीं है, जैसा हम इसे बनाना चाहते हैं, जैसा हम इसे महसूस करना चाहते हैं? सपनों, और हकीकत में इतना अंतर क्यों? कल्पना और वास्तविकता में इतना अंतर क्यों? सपनों और कल्पनाओं का सकारात्मक धरातल वास्तविकता में आते ही नकारात्मकता में क्यों बदल जाता है?
इन सब सवालों का जवाब मैं बचपन से ढूंढता आ रहा हूँ, खुद में, अपने आसपास, जहाँ तक नजरें जाती हैं पर दुनिया की बाद से बदतर शक्ल नजर आती है। दुनिया का इतना गन्दा, घिनौना चेहरा देख चुका हूँ कि नहीं चाहता की इसे कोई और भी देखे, जो अपने भविष्य को बनाने का सपना संजोए है।  मैंने खुद को दुनिया की भीड़ में हर पल अकेला महसूस किया है।  मेरे सपनों ने, मेरी इच्छाओं ने, मेरी अभिलाषाओं ने मुझे इस दुनिया से इतनी दूर कर दिया है कि अब मैं इस दुनिया में चाहूँ तो भी लौटकर नहीं आ सकता। लोग कहते हैं कि इस दुनिया से इतनी नफरत क्यों? मुझे इस दुनिया ने अकेलेपन और ठोकरों के अलावा दिया ही क्या है, जो मैं इसे सम्मान या प्रेम भरी नजरों से देखूं। मैं इस दुनिया की भीड़ में रहते हुए भी एक अजनबी हूँ, किसी दूसरे ग्रह के प्राणी की तरह, जिसका इस दुनिया से कहीं कोई मेल नहीं, पर जी रहा हूँ इस दुनिया के साथ, शायद इसका कोई हिसाब-किताब चुकाना बाकी है, इसलिए...
मेरे अज़ीज़ दोस्त मेरी इन बातों से रू-ब-रू होकर समझते हैं कि क्या कभी किसी के सपने पूरे हुए हैं? क्या कभी किसी के आदर्श और सिद्धांत सच की कसौटी पर खरे उतरे हैं और मैं हमेशा यही जवाब देता हूँ कि न सही, पहले न सही, पर आगे तो ऐसा होना ही होगा।  मैं एक स्वप्नदर्शी हूँ, हमेशा सपनों में ही जिया हूँ क्योंकि वास्तविकता का घिनौना रूप कभी मुझे रास नहीं आया। मुझे अपने उद्देश्यों के लिए प्रयास करते हुए मर जाना भी स्वीकार है पर समझौता स्वीकार नहीं...
मेरा एकमात्र लक्ष्य है, अपने अस्तित्व को जानना और इसे सार्थक करना।  मैं दुनिया को वो सच दिखाना चाहता हूँ जो लोग देखते हुए भी नहीं देख पा रहे हैं क्योंकि उनकी आँखों पर स्वार्थ का पर्दा पड़ा हुआ है और वे जान-बूझकर अनजान बने रहना चाहते हैं।  मैं लोगों की चेतना को अपने प्रयासों से जाग्रत करना चाहता हूँ..
-५ मार्च २०००
किसी व्यक्ति द्वारा किया गया विरोध उसके कटु अनुभवों की भाषा होती है, जिनसे वह गुज़र चुका होता है।
-२८ सितम्बर २०००
हम असफल होते हैं,क्योंकि प्राप्त होने वाली छोटी-छोटी खुशियों में अपने महत्वपूर्ण लक्ष्य को भुला बैठते हैं। 

-५ अगस्त २०००  

Why does this happen...


Why does this happen that I do not get the fruits of my labor, as a farmer waters his farm with sweat painstakingly and diligently and at harvest the barn catches fire and all his labor becomes redundant. Why does this happen that every time a storm comes and makes all my efforts fail? Is this a limitation in my efforts or a game of luck... Conditions want to try me...
-21 July 1999

I think... think... and just go to think that why the world is not as we want to make it, as we want to feel it? Why such a difference in dreams and reality? Why such a difference in fantasy and reality? Why does positive ground of dreams and fantasies turn to the negativity when they face the reality?
The answers to all these questions I'm searching for childhood... in myself, in my surroundings, as far my sight can go but the face of the world appears from bad to worse. Such a messy, ugly face of the world I have seen that I don’t want anyone to see it, who is treasured dream of making his future. Every moment I felt myself alone in the crowd the world.  My dreams, my desires brought me so far away from this world that Even if I want to come back in this world I cannot. People say, why so much hatred from the world. I say, what this world has given me besides loneliness and stumbles. How I see it with eyes full of respect or love. I am a stranger being in the crowd in this world, someone like an alien, which has no match in the world but still I am living with this world, perhaps there is any old accounts remains to pay.
My dear friends explain me facing these things, has anyone ever fulfill the dreams? Ever anyone’s ideal and principles have stood the test of truth, and I reply, if not, if not before, it will be now. I am a dreamer. I always lived in dreams and my dreams have to prove true. I want to show people the truth, to which people are not able to see while seeing because there is a veil of Selfishness on their eyes.
-5 Mar 2000

 Protest done by a person is the language of his bitter experiences through which he has undergone..
-28 Sep 2000

We fail because invest ourselves in small joys received and forget our important goal.
-5 Aug 2000

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