Skip to main content

मेरी दुविधा... (my dilemma)

मेरी दुविधा...
समस्या...
हर बार की तरह आज भी मैं दुविधा में फंस गया हूँ। एक तराजू है, जिसके एक पलड़े में मेरे अपने सिद्धांत और मेरा लक्ष्य हैं और दूसरे पलड़े में संसार और धन-दौलत है। यदि मैं सिद्धांत के पलड़े में जाता हूँ तो मेरा सांसारिक पक्ष हल्का हो जाता है और यदि दूसरे पक्ष में जाता हूँ तो मेरे सिद्धांत झूठे पड़ जाते हैं।  यह समस्या नई नहीं हैं। मुझसे पहले भी कई लोगों ने इसे झेला है और शायद मेरे बाद भी कुछ लोग इसे झेलेंगे। आज मेरे लक्ष्य के लिए धन की आवश्यकता है लेकिन यदि मैं इसकी पूर्ति में लग जाता हूँ तो मुझे सांसारिक प्रपंचों में आना पड़ेगा, अपने ही बनाए सिद्धांतों को पैरों तले रौंदना होगा। यदि मैं ऐसा नहीं करता हूँ तो लक्ष्य जहाँ का वहीँ रह जाता है और यदि ऐसा करता हूँ तो अपने अस्तित्व पर कलंक का धब्बा लगाता हूँ। सांसारिकता में आने पर पथभ्रष्ट होना पड़ेगा। यह संसार मेरे अस्तित्व और लक्ष्य के बीच बाधा  बन गया है। अकर्मण्य की भांति बैठने पर मन कोसने लगता है, धिक्कारने लगता है और कर्ता बनने पर पथभ्रष्ट हो जाने का भय है। क्या करूँ क्या नहीं, समझ नहीं आता?  
समाधान...
स्पष्टवादी बनो, निडरता व साहस के साथ सत्य को साथ लेकर आगे बढ़ो।
-८ जुलाई ९८
कर्म तथा चरित्र...
कर्म तथा चरित्र एक दूसरे के पूरक हैं। पूर्व में किये गए कर्म चरित्र का गठन करते हैं तथा चरित्र बाद में किये जाने वाले कर्मों को निर्धारित करता है।
-१६ अगस्त १९९८
अतीत वर्तमान को बनाता है और वर्तमान भविष्य को। अतीत पर तो हमारा अधिकार नहीं होता अतः हमें वर्तमान को संवारना चाहिए।
-१७ अगस्त १९९८
मुझे अपने उच्च आदर्शों, महत्वाकांक्षाओं और स्वप्नों को लेकर प्रयास करते हुए असफल होकर मर जाना भी स्वीकार है लेकिन इनसे समझौता करके, संसार के कड़वे अनुभवों को अपनाकर घिसी-पिटी लीक पर घिस-घिस कर जीना स्वीकार नहीं...
-३ सितम्बर १९९८
पहले के ज़माने में हुस्न और जिस्म की नुमाइश के बाज़ार कोठे और वेश्यालय हुआ करते थे पर आजकल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और घटिया साहित्य के जरिये ये घर-घर तक आ पहुंचे हैं।
-२६ मई १९९९
कुछ अनसुलझे सवाल ऐसे होते हैं, जिन्हे अनसुलझा छोड़ देना ही उचित होता है अन्यथा कभी-कभी अनसुलझे सवालों को सुलझाते-सुलझाते सुलझाने वाला खुद ही उलझ जाता है। 
-७ जून १९९९
दाम्पत्य जीवन का अर्थ है, अपने सारे सुख-दुःख-सपने-महत्वाकांक्षाएं एक-दूसरे के बीच बाँट लेना। दांपत्य का अर्थ ही है दो का मिलकर एक होना फिर चाहे उन में से कोई एक निम्न-स्तर की मानसिकता वाला क्यों न हो। यदि दोनों में से किसी एक में भी इतनी समझ नहीं है कि वह दूसरे को समझ सके तो दो जीवन व्यर्थ हो जाते हैं। दाम्पत्य का अर्थ है- हर कदम पर साथ मिलकर चलना और हर कदम पर परिस्थिति और एक-दूसरे से समझौता करके चलना। जिसमे समझौता करने का सामर्थ्य न हो या जो अति-महत्वकांक्षी हों उसे दाम्पत्य जीवन में प्रवेश नहीं करना चाहिए वर्ना एक नहीं दो जीवन बर्बाद हो जायेंगे...
-७ जून १९९९
मैंने कई घटिया व ओछी मानसिकता वाले बड़े-बड़े लोग देखे हैं। ईश्वर मुझे ऐसा बड़प्पन कभी न दे।
-७ जून १९९९
शक्ति सौंदर्य की उपासक होती है और सौंदर्य शक्ति पर अन्तः-समर्पित होता है...
-२६ जून १९९९
व्यक्ति कितना भी बुरा क्यों न हो उसके भीतर किसी कोने में अच्छाई भी छिपी होती है परन्तु बुराई को प्रेरित करने वाली परिस्थितियां उसे और अधिक बुराई की ओर धकेल देती है।  यदि उसके समक्ष अच्छाई को प्रेरित करने वाली परिस्थितियां उत्पन्न हो जाएं और उस पर प्रभावी हो जाएं तो बुरे से बुरा व्यक्ति भी एक अच्छा और महान व्यक्ति बन जाता है...
-१२ जुलाई १९९९


Problem...
Today, I'm again in a quandary like always. There is a weigher, on one side of which my goal and my own principles are there and on other side wealth and world. If I take my principle’s side then my mundane side becomes lighter. And if I go on the other side, my principles prove false. The problem is not new. Many people have experienced it before me and maybe some people experience after me. Today my goal requires money. But if I go to look at its fulfillment then I have to come in worldly delusion, I have to trample my own created principles. If I do not do it, the goal remains unattainable. And if so, I'll put a stain of disgrace on my existence.
If I come to the worldliness, I would be misguided. The world has become a barrier between my existence and goals. Sitting like mandarin, the mind begins bashing and cursing. And being a subject the there is a fear of going astray. What I do, do not understand...
-8 July 1998
Solution...
Be forthright, with fearlessness and courage go forward with the truth.
-8 July 1998
Deeds and character...
Deeds and character are complementary to each other. The Deeds in the past have formed character and the character determines to the subsequent actions.
-16 Aug. 1998

The past makes the present and the present makes the future. On the past, we would not have the right but we can shape the present definitely.
-17 Aug. 1998

I would like to accept the death after failure in attempting my high ideals, ambitions and dreams and imaginations but I won’t accept to compromise my ideals to live with worldly threadbare experiences.
-3 Sep 1998

In the past there were brothel as a market of beauties and body expose. Now days, there is electronic media and cheap literature have brought them home to home.
-26 May 1999

There are some such unresolved questions that it is better to leave them unsolved; otherwise sometimes in solving them solver gets entangled him.
The meaning of conjugal life is to share all the happiness-sorrows-dreams-aspirations-emo in each other. Conjugality means consisting of two to be one, whether one of them might be a small or low-level mentality. If either one is not having understanding well enough that one can understand the other then two lives become vain. Conjugality means walk together at every step and walk together by compromising with situations and with each other at every step. One who cannot afford to compromise or who are over-ambitious they should not enter into married life, Otherwise not one but two lives would be ruined.
I have seen many poor petty-minded great prominent persons. May God never give me such greatness.
-7 June 1999

Power is worshiper of Beauty and Beauty is inter-dedicated at the Power.
-26 June 1999

The person may be much worse, there is goodness hidden in a corner in his personality. But the conditions to inspire evil push him more on evil side. If circumstances inspiring him to goodness arise in front of him and would be effective on him then even the most evil person becomes a good and great man.
-12 July 1999

Comments

Popular posts from this blog

परमसत्य की खोज...16 (Discovery of the absolute truth ... 16)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...16 17 दिसम्बर 2003 यदि सच्ची सफलता चाहते हो तो कड़े से कड़ा अनुशासन अपनाना पड़ेगा। संघर्षो के कष्टों को झेलना पड़ेगा। जितना अधिक संघर्ष करोगे, जितना अधिक कष्ट झेलोगे, उतनी ही शीघ्र आगे बढ़ोगे, उतने ही लक्ष्य के समीप पहुंचोगे। संघर्षों से खुद को बचाने वाले और किस्मत के भरोसे बैठे रहने वाले कभी सच्ची सफलता नहीं पा सकते, उन्हें सिर्फ दूसरों की सफलता की जूठन मिल सकती है। गलत तरीके से तथा दूसरों के सहारे मिली सफलता ज्यादा दिनों तक ख़ुशी तथा संतुष्टि नहीं दे सकती, वह तो मरे हुए शिकार के समान होती है। मरा हुआ शिकार लोमड़ी को ही प्रसन्न कर सकता है, शेर को नहीं। मरा हुआ शिकार तथा दूसरों की जूठन शेर के किसी काम की नहीं होती। -10:15 a.m. एक पल का निर्णय ही काफी होता है आपकी ज़िंदगी को स्वर्ग में बदल देने के लिए और एक पल का निर्णय ही काफी होता है आपकी ज़िन्दगी को बर्बाद कर नर्क बना देने के लिये। -10:30 a.m. अगर किसी का चूल्हा फोड़ोगे तो उसका पेट भी तुम्हे ही भरना पड़ेगा। उसकी पेट की आग में तुमको ही जलना पड़ेगा। उसकी भूख में तुमको ही मिटना पड़ेगा। तुम्हारा ...

परमसत्य की खोज...18 (Discovery of the absolute truth ... 18)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...18 19 दिसम्बर 2003 लोग... अपने अज्ञान को अपना ज्ञान, अपने दोष को अपना गुण, अपनी कमजोरी को अपनी शक्ति, अपने अहंकार को अपनी शक्ति, अपनी शक्ति को अपनी कमजोरी, अपनी अक्षमता को अपना दुर्भाग्य, अपनी कायरता को चालाकी, भय तथा कापुरुषता को अक्लमंदी, भगोड़ेपन को अपनी होशियारी, सापेक्षिक भ्रमों को अपनी खुशियां, जीवन की सच्चाई को दुःख, असत्य (माया) को सत्य, सच्चे आनंद को चमत्कार, तथा सत्य को असंभव मानते हैं। -8:40 a.m. आज फिर वही विचित्र शक्ति दौड़ रही है मेरे शरीर में। आज फिर वही शक्ति मेरे रोम-रोम को स्पंदित कर रही है। आज फिर मैं रोमांचित हो रहा हूँ उसी शक्ति के प्रवाह में। अनगिनत तरंगें उठ रही हैं मेरे हृदयस्थल से और विस्तृत होकर फैलती जा रही हैं, विलीन होती जा रही हैं मेरे शरीर के चारों तरफ, आभामंडल में। आज फिर मेरे ह्रदय से उठ रहा है शक्ति का भूचाल और ले जा रहा है मुझे किसी दूसरी दुनिया में। मेरे मस्तिष्क के प्रकम्पन मुझे एक यात्रा का आभास करा रहे हैं, मानों मैं अपने सूक्ष्म शरीर के साथ किसी और ही दुनिया में विचरण कर र...

परमसत्य की खोज...11 (Discovery of the absolute truth ... 11)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...11 12 दिसम्बर 2003 विगत रात्रि का स्वप्न - मैं अपने एक मित्र सरदार जी के साथ अपने झोपड़ीनुमा सादे-कच्चे से मकान में एक रस्सी वाली नंगी खाट पर बैठा हूँ और हम खाना खा रहे हैं। सामने पटे पर सूखी रोटी और एक प्लेट में चटनी रखी है। मैं उसे प्रेमपूर्वक और लेने का आग्रह करता हूँ।   सरदार जी ताना मारते हुए कहते हैं -"ओए! ये भी कोई आदमियों का खाना है, चल मेरे साथ मैं बताता हूँ तुझे, आदमियों का खाना कैसा होता है।" मैं कहता हूँ -"भैया, हम गरीबों का खाना तो ऐसा ही होता है, हमें इसी खाने में वो संतोष मिल जाता है जो तुम्हें छप्पन तरह के पकवानों में नहीं मिलता।" सरदार जी कहते हैं -" तू मेरी एक बात बस मान ले, मैं तुझे बेईमान बनने को भी नहीं कह रहा हूँ और न ही कोई गलत काम करने को कह रहा हूँ, बस तू मेरा ये गिफ्ट ले ले। इसमें तो तुझे कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए।" मैं मना करना चाहता हूँ पर वह मेरे मुंह पर हाथ रखकर मुझे रोक देता है और वह गिफ्ट छोड़कर चला जाता है। मैं उसे खोलकर देखता हूँ तो उसमें एक सोने की ईंट रखी हुई मिलती है। उस ...