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सत्य की खोज...1 (Discovery of the truth...1)


 (अंतर्यात्रा)

 सत्य की खोज...1

१५ नवंबर २००३, शनिवार

आज मैं पहली बार रोया हूँ, इंसान की बेबसी पर और इंसान की दरिंदगी पर।
नहीं चाहिए ऐसा बेबस और लाचार ईश्वर, जो गंदे, घिनौने, घृणित, वहशत और दरिंदगी के नंगे खेल देखे और कुछ न कर सके। मैं नहीं मानता ऐसे ईश्वर के अस्तित्व को। आज से मैं नास्तिक हूँ, कट्टर नास्तिक। 
-२:१४ p.m.  
क्या वो ईश्वर होगा, जो असहाय, मजबूर, कमजोर और मासूम लोगों के बहते हुए आंसू देखे, उनकी चीत्कार सुने, उनका करुण रुदन सुने और उसका कलेजा न दहले, उसकी आत्मा न हिले? नहीं। ईश्वर जैसा कुछ भी इस धरती पर कहीं नहीं है, वह इस दुनिया में कहीं नहीं हो सकता। अगर दुनिया में ताकत ही सब कुछ है, सच्चाई, ईमानदारी और नैतिकता कुछ भी नहीं तो फिर कोई उसके एहसान क्यों उठाए जिसका कोई नामोनिशान नहीं, सिवाय मिटटी और पत्थरों के ढेर के सिवा। मुझे अब उसकी कोई जरूरत नहीं। मैं खुद ही अपना भगवान हूँ, मैं खुद ही अपना ईश्वर हूँ, मैं खुद ही अपना खुदा हूँ।
-२:३४ p.m.
यहाँ किसी को किसी के दुःख से वास्ता नहीं, कोई किसी और का दुःख नहीं सहता, सबको अपना दुःख खुद ही सहना पड़ता है। लोग दूसरों के दुःख में थोड़ी देर द्रवित होने का नाटक करते हैं, झूठी सहानुभूति प्रकट करते हैं और फिर उसमे भी आनंद उठाने लगते हैं। जख्म के दर्द का एहसास तो उसे ही होता है जिसे नश्तर चुभते हैं।
-२:४४ p.m.
जिसकी बुनियाद ही झूठ पर डाली गई हो, उस रास्ते पर चलकर सत्य को नहीं पाया जा सकता।
-५:५० p.m.

Adventure of the Truth…
Discovery of the truth...1
November 15, 2003, Saturday

I have cried first time today, on the helplessness and atrocity of human. I don’t want such a helpless God, who can see dirty, disgusting, atrocious and naked play and can't do anything. I do not believe the existence of such a God. Since today, I am an atheist, a staunch atheist.                                                           
-2: 14 p.m.
Will he be the God, who sees the tears of helpless, vulnerable and innocent people, who hears their scream, who hears their tragic cry and his heart should not shake, his soul should not shake? No. there is nothing like God anywhere on earth, he cannot be anywhere in the world. If strength is everything in the world, truth, honesty and ethics are nothing then why one should take his favor which has no mark except a pile of soil and stones? I do not need him now. Now I am the God myself.
-2: 34 p.m.
No one here is sad about anyone's misery, no one tolerates the pain of others; everyone has to endure his /her grief own. People pretend to be liquefied in others suffering for a while, people show false sympathy and then they start to enjoy in it. The pain of the wound is realized by the one who suffer the prick of lancet.
-2: 44 p.m.
The truth cannot get in that mean, foundation of which has been laid on the lies.
-5: 50 p.m.

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