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सत्य की खोज...२ (Discovery of truth ... 2)


(अंतर्यात्रा)

सत्य की खोज...२

१६  नवंबर  २००३, रविवार

मेरे सामने अभी दो प्रश्न हैं -
१. यदि ईश्वर है, तो उसकी सृष्टि, संसार इतना विकृत क्यों है? संसार में इतने पाप, अन्याय, अत्याचार, फरेब, मक्कारी और बलात्कार क्यों है? सुख से ज्यादा दुःख क्यों है? वह इतना बेबस और लाचार  क्यों है कि अपनी सृष्टि को सुखों और अच्छाइयों से सजा-संवारकर नहीं रख सकता। वह इतना बेबस क्यों है कि अपनी सृष्टि से इन बुराइयों को दूर नहीं कर सकता? और यदि वह इतना बेबस और लाचार है तो वह ईश्वर ही क्या?
२. यदि ईश्वर नहीं है तो इतनी बड़ी सृष्टि का संचालन कैसे हो रहा है? कैसे एक नियम में आबद्ध होकर सारी सृष्टि चल रही है? और उससे भी बड़ी बात कि इतनी अद्भुद सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ? उसकी शुरुवात कैसे और कहाँ से हुई?
विद्व-जन कहते हैं कि ईश्वर अव्यक्त है, निराकार है, असीम है तो फिर उन्होंने इसका साक्षात्कार कैसे कर लिया? वे यह भी कहते हैं कि ईश्वर एक रहस्य है जिसे जानने के बाद जानने वाला उसे किसी तरह भी व्यक्त नहीं कर सकता। फिर उस अव्यक्त को व्यक्त करने के लिए इतने प्रवचन क्यों? इतने भाषण क्यों? इतनी किताबें क्यों? इतने दावे क्यों? इतने झगडे क्यों?
-९:४५ p.m.
मेरा दिमाग चकरा रहा है। मुझे लगता है, मैं पागल हो जाऊंगा। इतना विचलन, इतनी अशांति मैंने पहले कभी अनुभव नहीं की। मैं बाहर से जितना शांत होता जा रहा हूँ, अंदर से उतना ही अशांत होता जा रहा हूँ।  मैं अपने अंदर के कोलाहल को ठीक उसी तरह सुन रहा हूँ जैसे समुद्र के किनारे बैठा कोई व्यक्ति उसकी लहरों के उफान को सुनता है। प्रश्नो की अनुगूंज मस्तिष्क की दीवारों को फाड़कर बाहर आना चाहती है। जबसे मैंने ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार किया है, तबसे मेरे मस्तिष्क में उस ईश्वर के अलावा और कोई विचार नहीं आया। ये निषेध का आकर्षण है या सचमुच ही कोई अलौकिक शक्ति है जो मुझे एक ही दिशा में खींचे जा रही है? जबसे मैंने ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार किया है तब से मेरा अंतर्जगत और बहिर्जगत इतना परिवर्तित क्यों हो गया है? ऐसा लगता है जैसे में स्वयं के लिए ही अपरिचित हो गया हूँ, जैसे वह जो अब तक मेरे अंदर जी रहा था, मर चुका है और उसकी जगह कोई नया व्यक्ति पैदा हो गया है।  मेरी दृष्टि इस संसार को एक अलग ही रंग में ढाल रही है। कौन जाने, ये किसी शक्ति की अनुभूति है की शक्ति के अभाव की, दुर्बलता की?
परिणाम चाहे जो भी हो, मुझे सत्य का मार्ग बनाना है, सत्य की खोज करना है, सारी रूढ़ियों और अंधविश्वासों से परे होकर। यही मेरे जीवन का चरम लक्ष्य है।
-१०:४२ p.m.
मेरा ह्रदय रोता है कि क्यों लोग हँसते हैं दूसरों की दुर्बलताओं पर, अज्ञानता पर, अयोग्यता पर, अक्षमता पर।
-१०:५८ p.m.
आज मैंने स्वयं को इतना अकेला महसूस किया है जैसे मैं इस संसार से नहीं बल्कि किसी जंगल से गुजर रहा हूँ। मानो चलते फिरते आदमी, आदमी न हों, जंगल में लगे पेड़ हों।
-११:५२ p.m.

Adventure of the Truth…

Discovery of truth ... 2

November 26, 2008, Sunday

Now, I have two questions before me-
1.     If God exists, why the creation of so called God, the world is so deformed? Why the world is full of sin, injustice, oppression, deceit, guile and rapes? Why the pain is more than the pleasure in the world? Why the so called God is so helpless and poor that he is unable to keep his creation dubbed with the pleasures and virtues? Why the God is so helpless that his creation could not overcome these evils? And if he is so helpless and poor then will he be God?
2.     If we suppose, God doesn’t exist, how the conduction of such a large creation is going on? How all the creation is running a law-abiding? And more importantly, how such a fantastic creation was created? How did it originate and where did it begin from?
Scholars say that God is latent, God is formless, infinite then how did they get him? They also tell that God is a mystery, even after knowing the God the knower cannot express the God in any way.
Then why so many discourses are there to express the latent? Why so many speeches? Why so many books? Why so many claims? Why so many argue and fight?
-9: 45 p.m.
My head is spinning. I feel like I will go mad. So much deviation, such a disturbance I have never experienced before. The more peaceful I am getting from outside, the more I am becoming turbulent from the inside. I am listening to the noise of my heart, just like someone hears the waves by sitting ashore the sea. The echo of the questions wants to come out tearing the walls of my brain. Since I have denied the power of God, since then there is no other concept except God in my mind. Is this the charm of prohibition or a supernatural power which is literally pulling me in the same direction?
Since I have refused the existence of God, since then why my inner world and outer world has so changed? It seems that I'm unfamiliar to myself, because he, who was living inside me till now, is dead and a new person has born in its place. My vision is giving a different color to the world. Who knows, whether this is a realization of strength, or realization of lack of strength? Whatever the outcome, I have to make the path of truth; I have to discover the truth, beyond all stereotypes and superstitions and this is the extreme goal of my life.
-10: 42 p.m.
My heart cries out, why people laugh at others' weaknesses, ignorance, ineptitude, incompetence.-10: 58 p.m.
Today, I felt myself so alone in this world, like I'm not passing through the world but going through a forest. Like walking men are not men but trees in the forest.            
 -11: 52 p.m.

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