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अंतर्प्रेरणा... (Instinct...)


अंतर्प्रेरणा...
पूर्णता एक शब्द है, एक मापदंड के लिए, लेकिन वास्तव में पूर्णता की स्थिति कभी प्राप्त नहीं की जा सकती। जिसे हम एक मापदंड के लिए पूर्णता कहते हैं, दूसरे बड़े मापदंड पर वह अपूर्ण सिद्ध होती है। जिस प्रकार एक गिलास में पानी पूरा भरा हुआ है और उस पानी को किसी बड़े जार में डाल दिया जाए तो जार अपूर्ण सिद्ध होगा अतः पानी कभी पूर्ण या अपूर्ण नहीं नहीं होता, केवल मापदंड पूर्ण-अपूर्ण हो सकते हैं। ठीक इसी प्रकार ज्ञान कभी पूर्ण नहीं हो सकता। जो यह कहते हैं कि मुझे इस विषय में पूर्ण ज्ञान है वे मूर्ख ये नहीं जानते कि मस्तिष्क का मापदंड बहुत स्थूल है इसलिए कोई भी किसी भी विषय में पूर्ण ज्ञानी नहीं हो सकता, ज्ञान तो अथाह है। केवल वह दूसरों के मापदंड से कम या ज्यादा हो सकता है...

मेरा लक्ष्य...
ज़िंदगी की राह पर चलते-चलते लगता है कि अपने-आप ही राहें आसान होती जा रही हैं लेकिन जैसा कि मानव स्वभाव है कि हर मंज़िल को वह केवल एक पड़ाव ही समझता है, उसी तरह मैं भी अपनी ज़िंदगी की छोटी-बड़ी सफलताओं  को पड़ाव ही समझता हूँ...
एक-एक करके हर रात गुजरती जाती है और सपनों की कड़ियों में एक और सपने को जोड़ जाती है और मन इन कड़ियों से खेलते-खेलते ताना-बाना बुनने लगता है।
बहुत कुछ इस ज़िंदगी में नया सा होता है लेकिन नया कुछ नहीं लगता बल्कि सब कुछ सामान्य सा लगता है। बहुत कुछ सामान्य जीवन से हटकर  घटित होता है लेकिन ये परिवर्तन अजीब नहीं लगते, लगता है कि यह सब मेरे लिए ही है, भगवान ने कुछ विशेष कार्यों की बागडोर मेरे हाथों में दी है, मेरे द्वारा कुछ अलग घटित होने वाला है, मेरा वर्तमान भविष्य के लिए इतिहास बनाने वाला है, फिर भी मैं अपने-आप में बड़ा महसूस नहीं करता बल्कि सब कुछ सामान्य सा महसूस करता हूँ, औरों की तरह हँसता हूँ, गाता हूँ, उदास होता हूँ, खुश होता हूँ लेकिन फिर भी अपने आप को भीड़ से अलग महसूस करता हूँ, जैसे मेरे भीतर मेरी पृष्ठभूमि में कोई और जी रहा हो, जो मुझे दुनिया से कुछ हटकर करने के लिए प्रेरित कर रहा हो। समय और परिस्थितियां अब मेरा साथ देने लगे हैं।  सारी सफलताएं और असफलताएँ इतने अर्से बाद अपने फल देने लगी हैं, जैसे सब कुछ पूर्व-निश्चित सा हो। असफलताएँ भी सफलताओं  की सीढ़ियां होती हैं, ये अब समझ आ रहा है। परिस्थितियां बहुत कुछ बनाती बिगाड़ती हैं लेकिन फिर भी मेरा दृढ़-संकल्प हमेशा मेरे साथ है। मैं दूसरों के लिए जीना चाहता हूँ।
वैसे तो इस दुनिया के हर कार्य के पीछे सम्पादित करने वाले का स्वार्थ होता है, लेकिन वह स्वार्थ अगर स्वयं से अधिक दूसरों को लाभ पहुंचाए तो वह स्वार्थ नहीं रह जाता, परोपकार हो जाता है।
मुझे मेरा उद्देश्य समझ आने लगा है, जो ठीक वैसा ही है, जैसा की उस मार्गदर्शक का होता है जो खुद काँटों भरी राह पर चलकर अपने अनुभवों द्वारा दूसरों को उन काँटों से बचाना चाहता है, उन्हें सही दिशा और सही राह दिखाना चाहता है।
कमाना, खाना और खाकर सो जाना, दुनिया का मूलमंत्र है लेकिन इसमें पड़कर मैं अपना अस्तित्व नहीं खोना चाहता। दुनिया के झमेलों में पड़कर अपनी मंज़िल नहीं बदल सकता, रास्तों को नहीं मोड़ सकता।
स्वाभाविक है कि आज तक ऐसा जिन आदर्श व्यक्तियों ने किया है वे अपनी व्यक्तिगत ज़िन्दगी के लिए दूसरों पर निर्भर रहे। मुझे भी अपने उद्देश्यों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना स्वीकार है।  मेरी पृष्ठभूमि जिन लोगों पर आधारित है, उनका मैं ऋणी हूँ और हमेशा रहूंगा।     
ज़िंदगी में बहुत कुछ गुलिवर के विस्मय जैसा घटित हो रहा है। दूसरे इस विस्मय को नहीं समझ सकते। खैर, मैं इस विस्मय को दूसरों में बांटकर उन्हें परेशान नहीं करना चाहता क्योंकि मेरी ज़िंदगी कोई और नहीं जी सकता और मैं किसी और की ज़िंदगी नहीं जी सकता।
मैं जानता हूँ मेरा लक्ष्य बहुत बड़ा है, बहुत कठिन है फिर भी मुझे स्वयं पर और उस शक्ति पर विश्वास है और जैसा कि मेरे पसंदीदा पवित्र ग्रन्थ श्रीमद्भागवतगीता ने कहा है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफल हेतुर्भुर्मा ते संगोस्तवकर्मणि।।
-२८ नवम्बर १९९७
मेरा ध्येय आम लोगों की धारणाओं, विचारों और भावनाओं को कला और विचारों की अभिव्यक्ति के माध्यम से निम्न स्तर से उच्च स्तर की ओर प्रेरित करना है।

-७ जून १९९८

स्वयं पर गर्व करो पर दूसरों से ईर्ष्या नहीं ...
-२७ जुलाई १९९८
एकमात्र मौन से अपने साथ कई लोगों पर उपकार किया जा सकता है। हम अपनी सृजनात्मक शक्ति का एक बड़ा हिस्सा व्यर्थ बकवास में गँवा देते हैं। मौन रहकर आत्मसंयम को बढ़ाया जा सकता है।  प्रायः बकवास करते वे ही लोग नजर आते हैं जो उथला ज्ञान रखते हैं। गहन ज्ञान रखने वाले लोग रहस्यवादी व गंभीर प्रवृत्ति के होते हैं।  
-९ अगस्त १९९८ 

Instinct...

Completeness is a word for a criterion but in real a state of completeness can never get. Completeness for one criterion proves incomplete for other criteria. Just as when a glass full of water is poured in a jar, the jar will be incomplete. So water is not ever complete or incomplete It is measure which may complete or incomplete. In similar manner Knowledge can never be complete or incomplete. One who says that he has full knowledge of the subject they fool do not know that the criterion of brain is too voluminous so nobody can be full of knowledge in any subject. Knowledge is immeasurable. Only it may be more or less than others criteria...
-13 Sep. 1997

My Goal...

While walking on the path of life, it seems that ways are getting easy automatically; targets are being achieved but as usual human nature, he consider every success as a milestone so do I...

Nights pass one by one. And adds one more dream in the episodes of dreams. And mind starts to play with these dreams and starts weaving warp-weft...

Quite few things happen new in life but never seem new, everything seems normal. Many things happen beyond the normal life but the changes do not seem weird. It seems that it all is for me only; God has given reins of some special functions in my hand, something different is going to happen by me; my present is going to make history for the future. Yet I do not feel myself greatness. I feel everything normal. Like others I laugh, sing, become sad yet I feel myself apart from the crowd. As someone else is living in my background and inspiring me to do something other than routine of this world. Time and circumstances are supporting me now. All successes and failures have begun to pay their results after so long, as everything is pre-determined. Failure is the ladder to success, now it is clear to me. The circumstances make and ruin much. Still my determination is always with me. I want to live for others.

Well, behind every act of this world there is a selfishness of doer. But if the Selfishness of the doer benefits others more than him then it is no longer selfishness it becomes philanthropy.

I began to understand my purpose which is exactly as the guide, who himself goes on the road full of thorns and wants others to save from the thorns, who wants to show them the right direction.

‘Earn, eat and go to sleep’ is the buzzword of the world but falling into it, I do not want to lose my existence and I cannot change my target by falling down in the mess of the world.
Naturally, the ideals that have done such a thing they are dependent on others for their personal life. I also accept to depend on others for my purposes. I am indebted to the people and always will be, on which my background is based on.
Many things in life are happening like Gulliver’s wonder. Others may not understand the amazement. Well, I do not want to disturb others, sharing the amazement in them because no one else can live my life and I cannot live someone else's life. I know, my goal is too big, too hard on myself and I still believe on that power. As my most favorite the holy book Gita says-
Your right is to work only and never to the fruit thereof. Do not consider yourself to be the cause of the fruit of action, nor let your attachment be to in action.
-28 Nov.1997
My goal is to motivate ordinary people's perceptions, thoughts and feelings through art and expression of thoughts from low level to high level
-7 June 1998
Pride on self but do not envy others.
-27 July 1998
Only quiescent can beneficence many people including self. We lose a large part of our creative strength in useless chatter. Practicing silence self control can be extended. Often the only people they seem to chatter which have shallow knowledge. Deeply knowledgeable people are mystic persons of serious nature.
-9 Aug 1998

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