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ज़िंदगी क्या है... (What is Life...)


ज़िंदगी क्या है...
ज़िंदगी,
एक समझौता है चंद सांसों का...
ज़िंदगी वह क्षितिज है, जो दूर से ज़मीन और आसमान को एक करती है,
पर वास्तव में क्या है?
एक भ्रम जिसमे सभी भ्रमित हैं...
ज़िंदगी रेगिस्तान की तपती धूप में वह मारीचिका है, जो मन के पथिक को दुःख के मरुस्थल में प्यासा भटकाती है। ज़िंदगी एक अनसुलझी पहेली है, ज़िंदगी एक ऐसा तिलिस्म है कि इसके एक दरवाजे को खोल कर हम समझते हैं कि हमने सफलता हासिल कर ली, लेकिन दरवाजा खोलने पर हम क्या पाते हैं ? हम पाते हैं एक और दरवाजा, और फिर उसे खोलने के लिए जुट जाते हैं। उसे खोल कर हम फिर वही स्थिति पाते हैं कि सामने एक और बंद दरवाजा मौजूद है खोलने के लिए, ठीक वैसे ही, जैसे एक आईने के सामने दूसरे आईने को रखने पर उसके असंख्य प्रतिबिम्ब बनते जाते हैं, आईने के अंदर आईना.. आईने के अंदर आइना... आईने के अंदर आइना, और इस तरह प्रतिबिम्ब के छोर को ढूंढ नहीं पाते। ज़िंदगी एक टूटता हुआ तारा है जो कभी किसी का नहीं हुआ और ब्रह्माण्ड में ही विलीन होकर रह गया। ज़िंदगी ओस की वे बूँदें हैं जो कोमल घांस के आधार पर सूरज की मेहरबानी पर टिमटिमाती हैं, कुछ पलों के लिए प्रकृति की छटा अपने भीतर कैद कर लेती हैं और फिर सूरज का विकराल रूप देखकर उसकी प्रचंडता से थोड़ी देर में लुप्त हो जाती हैं...
ज़िंदगी एक मस्ती है, जो नज़र आती है- कलियों के चुम्बन में, भंवरों के गुंजन में और पंछियों के कलरव में, पर कब तक? केवल तब तक, जब तक कि कली खिलकर फूल हो जाए, और फूल सूखकर, झड़कर उसी मिटटी में मिल जाए, जिससे कि उसका अस्तित्व है, ज़िंदगी एक मस्ती है, एक नशा है, एक धीमा ज़हर है, जो धीमे-धीमे अपने आगोश में लेती है, मदहोश करती जाती है और अंत में अपनी जगह छोड़ जाती है एक गहरी ख़ामोशी, सन्नाटा, सुनसान वीराना और पश्चाताप के चंद अश्क़, उन पाप, अन्याय और फरेब के बदले में, जो आदमी ज़िंदगी के विश्वास पर किये जाता है, जिए जाता है और जिए जाता है... और यह बेवफा महबूबा की तरह सब कुछ छोड़कर, अपना दामन झाड़कर चली जाती है, और जब तक आदमी समझ पाता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और सामने होती है मौत की गहरी खाई, जिसे देखकर वह छटपटाता रह जाता है और फिर ढूंढता है ज़िंदगी के क़दमों के निशान लेकिन वहां जाकर सब कुछ ख़त्म हो जाता है, सब कुछ... 
मैं आज तक अपने अनुभवों और प्रत्यक्षों के आधार पर ज़िंदगी को इससे ज्यादा नहीं समझ पाया हूँ और इस पहेली को जितना सुलझाया उतना ही इसमें उलझता गया।  अपनी इस छोटी सी ज़िंदगी में यदि इस रहस्य को किसी के मार्गदर्शन में सुलझा पाया तो अपने आप को उसका ऋणी समझूंगा...
-१५ फरवरी १९९७
What is life...

Life...
A compromise of a few breaths...
Life is the horizon, which makes one the land and the sky far...
But what is the life in real... an illusion, in which all of us are confused...
Life is a mirage in the hot desert sun which wanders the wanderer mind thirsty in the desert of sorrow...
Life is an unsolved puzzle, Life is one such magic that we open a door and consider that we had success, but after opening the door, what we find? We find one more door and then go ahead to open it... And then we find the same situation when it opens... we find one more door again to open, just as the other mirror in front of a mirror forms innumerable image... Mirror inside the mirror... Mirror inside the mirror... Mirror inside the mirror... And we cannot find the end of the image. Life is a bolide which never happened to anyone and ended up dissolving in the universe. Lives are the dew drops which flicker on the base of soft grass due to the kindness of velvet sunshine and trap the beauty of the nature for a few moments and then disappear in a while seeing the horrible sun with its impetuosity.
Life is a fun which appears in kiss of buds, in the hum of bumblebees, in the twitter of birds but for how long... until the buds do not become flower and until the flower do not dry and dissolve in the same soil with which it existed.
 Life is a fun... It is an opiate. It is a slow poison which slowly takes us in its arms and makes us plastered. And finally leaves a deep silence...  deserted wild...  and some tears of repentance...  The tears of repentance, which he gains by doing sin, injustice and deceit done in the whole life and he goes on and on to live his life. And the life, like a disloyal beloved goes away leaving everything and until man understands it is too late by then. And there is the deep abyss of death in front, seeing which he remains thrash about and then looks for the footprints of the life. But by going there everything is over... everything...
Based on my direct experience I ever not able to get more life. And as much as I solved this puzzle It went more complicated... In this small life if the mystery guidance of a sort found then I would consider myself his debtor.
-15 Feb 1997

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