Skip to main content

विद्रोह... (A rebellion...)


विद्रोह...
और कितने सपने दिखाएगा तू...!!!  और कितने सपने तोड़ेगा...!! सपने दिखाकर बहलाता भी तू है और सपनों को तोड़कर चकनाचूर भी तू ही करता है... आखिर सीधी-सादी राह पर चलने वाले को ही ऐसी सजा क्यूँ...?? इतने सारे सपने देकर मायूसियों और नाकामियों  से मेरा जीवन भरने से तुझे क्या हासिल होगा... हौसला भी कहाँ तक कोई रखे? आखिर उम्मीद की कोई तो झलक नजर आए... काँटों के जाल में एकाध तो फूल मिले... एकाध तो कामयाबी मिले...
आखिर क्या चाहता हूँ मैं ऐसा, जो तू मुझे नहीं दे सकता... सच्चाई और ईमानदारी की राह पर चलना चाहता हूँ। इस दुनिया में प्रेम और खुशियां बिखेरना चाहता हूँ, इतनी छोटी सी मर्ज़ी है मेरी, उस पर भी इतनी ज़िल्लत...! क्यूँ...? ऐसी नाकामी क्यूँ? आखिर क्यूँ मुझे इस तरह तोड़कर बर्बाद करना चाहता है... देख, देख...कहे देता  हूँ...इस तरह  मुझे मत आज़मा... अगर मैं टूट गया तो फिर कहीं का नहीं रहूंगा... अब और मेरे सब्र का इम्तेहान मत ले... अगर मैं बन नहीं सका तो इस कदर बिगड़ जाऊंगा कि तेरी तो क्या इंसानियत की भी रूह काँप उठेगी। अब तक तो मैं प्यार और सब्र के रास्तों पर चला मगर मुझे क्या मिला...नाकामियां! मायूसियां! तड़प और घुटन! अगर मेरा कदम नफरत की राह की ओर मुड़ गया तो मेरा तेरे जहाँ की ताक़त से विश्वास हट जाएगा...काश! आज तू मेरी आवाज सुन ले...वरना... मैं अब कभी  तेरी आवाज नहीं सुन पाऊंगा...
मैं अब तक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के लिए जीता रहा...मरता रहा... लेकिन अब लगता है कि तेरे जहाँ में मेरी कोई जरूरत नहीं...अब मुझे अपना जहाँ खुद बनाना पड़ेगा। जो चीज मांगने से नहीं मिली... अब वह छीनना पड़ेगा... मेरे अधिकार और कर्तव्य अब भी मेरे होंगे लेकिन केवल मेरी दुनिया के लिए...इनका अब तेरी दुनिया से कोई वास्ता नहीं...
मेरे जीवन के सत्ताईस साल गुजर गए...परिणामशून्य-निरर्थक-अनथक प्रयासों में... अब कोशिशें मेरी होंगी... नतीजा भी मेरा होगा, फैसले भी मेरे होंगे... और कामयाबी के पैमाने भी मैं ही तय करूंगा...और मंज़िलें भी...
तेरा होना भ्रम है... या मेरा होना भ्रम है...या ये दुनिया ही भ्रम है... तो फिर क्या ये नेकी-सच्चाई-ईमानदारी केवल एक ढकोसला बस है...केवल एक बेहूदा जूनून और सनक... और कुछ नहीं...? 
उफ़! कोई मुझे जवाब क्यों नहीं देता... मैं इन सवालों की गूंजती हुई आवाज में पागल हुआ जा रहा हूँ... मेरे दिमाग की नसें खिंची जा रही हैं... मगर, मैं किसके सामने रो रहा हूँ... क्या मैं दीवारों को सुना रहा हूँ..? मैं रो रहा हूँ कि हँस रहा हूँ...या दुनिया वालों को अपने हाल पर हंसने का मौका दे रहा हूँ...
देखो! मुझ अकेले को पागल मत समझना... क्योंकि मेरी नजर में तो सब लोग पागल हैं और दुनिया पागलखाना... कोई रुपयों-पैसों के लिए पागल है... तो कोई बीवी-बच्चों के लिए पागल है... तो कोई  किसी लड़की के पीछे पागल है... बेशक! मेरा पागलपन इन सबसे बड़ा है लेकिन मेरा पागलपन सच्चाई और ईमानदारी के लिए है... 
ये जूनून कब ख़त्म होगा... नहीं-नहीं! काश! ये जूनून कभी ख़त्म न हो... यूँ ही चलता रहे...
हो... हो...हो... हो...sss
हा... हा... हा... हा...ssss
मैं सचमुच पागल हो गया हूँ न...?
सचमुच पागल...?
-८ सितम्बर २००२

A rebellion...

Now how many dreams will show you... !!! How many dreams will you break... !! It is you, who shows the dreams and amuses and it is also you who shatters these dreams. Why such a punishment to a person who follows the path of truth...?? What will you achieve filling my life by so many desperations and failures... How long a person keeps courage?  At least a glimpse of hope should be appeared... At least a single flower should be seen in the trap of thorns... At least a success should be gotten in the round of failures...

After all what do I want, which you cannot give me... I want to walk on the path of truth and honesty. I want to strew love and happiness in this world, my wish is so small, that even so embarrassment...! Why...? Why these failures? After all why do you want to ruin me by breaking me such a way... look, look...  I tell you ... do not try me this way... If I broke down, then I will be undone... Do not test my patience now... If I could not be made then not even you the soul of humanity shall shudder. So far so I went on the paths of love and patience, but what I found... Failures! Despair! Yearning and suffocation! If my step has turned to the path of hate then my faith will diverge from the power of thy world... Alas! Today you may hear my voice... Otherwise ... I shall never hear your voice...

By now I have lived for my rights and duties ... I have died for them... but now it seems that you do not need me in your world... Now I have to make my world myself. What I did not get by asking... Now I have to snatch that... I will still have my rights and duties but only for my world... Nothing to do them with your world now...

Twenty-seven years of my life have passed ... zero results-fruitless-efforts... Now the efforts will be mine, the result will be mine, the decision will be mine... and I own will decide the scale of success... and destination too...

Your being is an illusion... or my being is an illusion... or the world is just illusion... Then the truth-honesty is only a gag... Only an inane obsession and whims... Nothing more...?

Oops! Why does not anyone answer me these questions ... I'm going mad in the resonating sound... My brain's nerves are being drawn... But, I'm crying in front of whom... Am I telling the walls..? I'm crying or I'm laughing... Or giving a chance to the world to laugh at my condition...

Look! Do not take me mad alone... Because in my view, all the people are mad and the world is a madhouse... someone is crazy for money... while someone is crazy for wife and children... and someone is crazy for a girl... Of course! My madness is the biggest but my madness is for truth and honesty...

When will this obsession end...? No-no! Alas! The obsession would never end ... may runs simply...
ho ... ho ... ho ... ho ... sss
ha ... ha ... ha ... ha ... ssss
Have I not really gone mad...?
Really mad...?

-8 September 2002

Comments

Popular posts from this blog

परमसत्य की खोज...16 (Discovery of the absolute truth ... 16)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...16 17 दिसम्बर 2003 यदि सच्ची सफलता चाहते हो तो कड़े से कड़ा अनुशासन अपनाना पड़ेगा। संघर्षो के कष्टों को झेलना पड़ेगा। जितना अधिक संघर्ष करोगे, जितना अधिक कष्ट झेलोगे, उतनी ही शीघ्र आगे बढ़ोगे, उतने ही लक्ष्य के समीप पहुंचोगे। संघर्षों से खुद को बचाने वाले और किस्मत के भरोसे बैठे रहने वाले कभी सच्ची सफलता नहीं पा सकते, उन्हें सिर्फ दूसरों की सफलता की जूठन मिल सकती है। गलत तरीके से तथा दूसरों के सहारे मिली सफलता ज्यादा दिनों तक ख़ुशी तथा संतुष्टि नहीं दे सकती, वह तो मरे हुए शिकार के समान होती है। मरा हुआ शिकार लोमड़ी को ही प्रसन्न कर सकता है, शेर को नहीं। मरा हुआ शिकार तथा दूसरों की जूठन शेर के किसी काम की नहीं होती। -10:15 a.m. एक पल का निर्णय ही काफी होता है आपकी ज़िंदगी को स्वर्ग में बदल देने के लिए और एक पल का निर्णय ही काफी होता है आपकी ज़िन्दगी को बर्बाद कर नर्क बना देने के लिये। -10:30 a.m. अगर किसी का चूल्हा फोड़ोगे तो उसका पेट भी तुम्हे ही भरना पड़ेगा। उसकी पेट की आग में तुमको ही जलना पड़ेगा। उसकी भूख में तुमको ही मिटना पड़ेगा। तुम्हारा ...

परमसत्य की खोज...18 (Discovery of the absolute truth ... 18)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...18 19 दिसम्बर 2003 लोग... अपने अज्ञान को अपना ज्ञान, अपने दोष को अपना गुण, अपनी कमजोरी को अपनी शक्ति, अपने अहंकार को अपनी शक्ति, अपनी शक्ति को अपनी कमजोरी, अपनी अक्षमता को अपना दुर्भाग्य, अपनी कायरता को चालाकी, भय तथा कापुरुषता को अक्लमंदी, भगोड़ेपन को अपनी होशियारी, सापेक्षिक भ्रमों को अपनी खुशियां, जीवन की सच्चाई को दुःख, असत्य (माया) को सत्य, सच्चे आनंद को चमत्कार, तथा सत्य को असंभव मानते हैं। -8:40 a.m. आज फिर वही विचित्र शक्ति दौड़ रही है मेरे शरीर में। आज फिर वही शक्ति मेरे रोम-रोम को स्पंदित कर रही है। आज फिर मैं रोमांचित हो रहा हूँ उसी शक्ति के प्रवाह में। अनगिनत तरंगें उठ रही हैं मेरे हृदयस्थल से और विस्तृत होकर फैलती जा रही हैं, विलीन होती जा रही हैं मेरे शरीर के चारों तरफ, आभामंडल में। आज फिर मेरे ह्रदय से उठ रहा है शक्ति का भूचाल और ले जा रहा है मुझे किसी दूसरी दुनिया में। मेरे मस्तिष्क के प्रकम्पन मुझे एक यात्रा का आभास करा रहे हैं, मानों मैं अपने सूक्ष्म शरीर के साथ किसी और ही दुनिया में विचरण कर र...

परमसत्य की खोज...11 (Discovery of the absolute truth ... 11)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...11 12 दिसम्बर 2003 विगत रात्रि का स्वप्न - मैं अपने एक मित्र सरदार जी के साथ अपने झोपड़ीनुमा सादे-कच्चे से मकान में एक रस्सी वाली नंगी खाट पर बैठा हूँ और हम खाना खा रहे हैं। सामने पटे पर सूखी रोटी और एक प्लेट में चटनी रखी है। मैं उसे प्रेमपूर्वक और लेने का आग्रह करता हूँ।   सरदार जी ताना मारते हुए कहते हैं -"ओए! ये भी कोई आदमियों का खाना है, चल मेरे साथ मैं बताता हूँ तुझे, आदमियों का खाना कैसा होता है।" मैं कहता हूँ -"भैया, हम गरीबों का खाना तो ऐसा ही होता है, हमें इसी खाने में वो संतोष मिल जाता है जो तुम्हें छप्पन तरह के पकवानों में नहीं मिलता।" सरदार जी कहते हैं -" तू मेरी एक बात बस मान ले, मैं तुझे बेईमान बनने को भी नहीं कह रहा हूँ और न ही कोई गलत काम करने को कह रहा हूँ, बस तू मेरा ये गिफ्ट ले ले। इसमें तो तुझे कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए।" मैं मना करना चाहता हूँ पर वह मेरे मुंह पर हाथ रखकर मुझे रोक देता है और वह गिफ्ट छोड़कर चला जाता है। मैं उसे खोलकर देखता हूँ तो उसमें एक सोने की ईंट रखी हुई मिलती है। उस ...