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तल्खियाँ... (Bitterness...)


तल्खियाँ...
मैं नहीं जानता कि कभी-कभी मेरा रुख इतना कड़वा क्यों हो जाता है। शायद दोष मेरा नहीं, सच का कड़वा होना नैसर्गिक है।  सच्चाई और ईमानदारी की राह पर चलते-चलते मुसाफिर कड़वा हो ही जाता है क्योंकि उसके जीवन में अनुभवों की कड़वाहट पर कड़वाहट घुलते जाती है।
मेरे सिद्धांत नंगे और बेबस खड़े हैं इस दुनिया में, पर इन्हे सहमति के कपडे पहनने वाला यहाँ कोई नहीं। 
समझौते के खिलौने मेरे सिद्धांतों को बहलाते हैं, फुसलाते हैं लेकिन सिद्धांत तो हठीले बालक होते हैं, ये अपनी हठ किसी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहते।
-१६ अगस्त २००२

Bitterness...
I do not know why sometimes my attitude is so bitter. Perhaps the fault is not mine, be bitter truth is natural. Walking on the path of truth and honesty, travelers become bitter because the bitterness of his experiences dissolves bitterness in life.
My principles are stand naked and defenseless in this world, no one is here to wear them the clothes of concurrence.
The toys of consent amuse my principles, cajole my principal but principles are stubborn children, they do not want to leave their persistence at any cost.
-16 August 2002

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