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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में श्रद्धा का महत्त्व... (Importance of reverence in the present context...)


वर्तमान परिप्रेक्ष्य में श्रद्धा का महत्त्व...
आधुनिक युग विज्ञान के चमत्कारों का युग है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य को हम भौतिकवाद से घिरा पाते हैं किन्तु वास्तव में हम जितने अधिक वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जुड़ते जाते हैं, यथार्थ के धरातल से परे उड़ते जाते हैं। आधुनिक युग में बाह्य आडम्बर, दिखावटीपन और खोखलेपन का समावेश है। हम जितना अधिक इससे जुड़ते जाते हैं उतना ही हमारा नैतिक स्तर गिरता जाता है।
यदि हम संसार के मूल में छिपे महत्त्व को जानना चाहें तो भौतिकवाद के पीछे निसर्ग का आवरण मिलता है। पहले प्रकृति उत्पन्न हुई और उसके बाद भौतिकता की धीरे-धीरे उत्पत्ति हुई। आधुनिक युग में हर बात को तर्क की तराजू में तौल जाता है लेकिन कुछ स्थितियां ऐसी होती हैं जिन्हें अवधारणा के रूप में स्वीकारना पड़ता है, जिनके कोई तर्कसंगत उत्तर नहीं मिलते। इस प्रकार की स्थितियों का सन्तुष्टिकरण तर्कों से नहीं वरन श्रद्धा से होता है। जैसे कोई बच्चा जब प्राथमिक शिक्षा का ज्ञान पाने पाठशाला जाता है। तो उसे वर्णमाला तथा अक्षर ज्ञान दिया जाता है। इनके पीछे कोई तर्क नहीं होता। इन्हें यथावत स्वीकार करना पड़ता है। शिशु के मुख से यदि पहला शब्द 'माँ' निकलता है तो उसके पीछे कोई तर्क नहीं होता। उसमें आतंरिक शक्ति श्रद्धा के रूप में निहित होती है। श्रद्धा का कोई रूप-आकार नहीं होता इसे तो मनः-शक्ति को केंद्रित और समायोजित करके जिस रूप में देखा जाता है उसी रूप में यह दिखाई देती है। श्रद्धा वास्तव में विश्वास का एक परिष्कृत रूप है जो विश्वास से ऊंचे स्तर पर होती है। यह एक मनः-स्थिति है जो विश्वास के पकने पर प्राप्त होती है। किसी भी वास्तु को हम जिस रूप में मान्य करते हैं, उसी में श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। एक पत्थर को राहगीर ठोकर मरकर चल देता है लेकिन उसे ही यदि किसी चबूतरे पर रखकर उस पर जल चढ़कर पुष्प, सिन्दूर अर्पण करने लगें तो वह भगवान का रूप ले लेता है किन्तु भगवान उस पत्थर में नहीं वरन हमारी मान्यता में होता है और यही मान्यता श्रद्धा होती है।
उपरोक्त व्याख्या को एक घटना द्वारा समझा जा सकता है -
एक बार स्वामी विवेकानंद को एक राजा ने अपने घर भोज पर आमंत्रित किया।  राजा नास्तिक था और ईश्वरीय शक्ति में आस्था नहीं रखता था।  स्वामी जी उसके यहाँ नियत समय पर पहुंचे, औपचारिक आवभगत के बाद राजा ने एक प्रश्न किया कि क्या आप भी भगवान के अस्तित्व में विश्वास करते हैं? सभी भगवान-भगवान करते हैं लेकिन भगवान है कहाँ?  मुझे तो कहीं दिखाई नहीं देता? स्वामी जी उसका प्रश्न सुनकर कुछ क्षण मौन रहे फिर उन्होंने अपनी दृष्टि भवन की दीवारों पर डाली और एक तस्वीर पर केंद्रित कर दी और राजा से उस तस्वीर के बारे में पूछा। राजा ने बड़ी श्रद्धा के साथ नत-मस्तक होते हुए बतलाया कि ये मेरे पूज्य पिताजी की तस्वीर है जिनका स्वर्गवास हो चुका है।  स्वामी जी ने उस तस्वीर को करीब से देखने की इच्छा व्यक्त की तो राजा ने वह तस्वीर सहर्ष उन्हें मंगवाकर दी। स्वामी जी ने अगले ही क्षण वह कीमती फ्रेमजड़ित तस्वीर उस राजा के पैरों के पास पटक दी और इससे पहले कि राजा कुछ समझ पाता या गुस्से से लाल-पीला हो पाता, स्वामी जी ने उसे उस तस्वीर पर थूकने को कहा और राजा बिना कुछ सोचे-विचारे बौखला गया और क्रोध में आकर उसने अपशब्द तक कह डाले। बाद में क्रोध की स्थिति से बाहर आने पर वह शर्मिंदा हुआ और शांत होते हुए उसने कहा कि ये मेरे पूज्य पिताजी हैं, मैं इन पर थूकने जैसा घृणित कार्य कैसे कर सकता हूँ?  यह  सुनते ही स्वामी  जी मुस्कुराये और बोले कि तुम्हें इस तस्वीर पर थूकना स्वीकार नहीं है और यदि मेरी जगह किसी और ने यह बात कही होती तो शायद तुम उसे नुकसान पहुँचाने से भी नहीं चूकते क्योंकि तुम्हारी दॄष्टि में इनके लिए असीम श्रद्धा है पर दूसरे के लिए तो यह मात्र एक कागज का टुकड़ा है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार दूसरे के लिए जो ईश्वर है वह तुम्हारे लिए पत्थर है, मेरी नजर में यही आस्था श्रद्धा है और श्रद्धा को किसी तर्क की आवश्यकता नहीं, श्रद्धा तर्कों से ऊपर है। यह सुनते ही राजा की आँखों से अश्रुधारा गिर पड़ी और अपनी गलती का एहसास कर वह स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा। 
अतः वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गिरते हुए नैतिक स्तर को बढ़ने के लिए आध्यात्मिक श्रद्धा (आस्था) का होना अत्यंत अनिवार्य है। 
-३१ जनवरी १९९६
Importance of reverence in the present context...

The modern era is the era of miracles of science. Current perspective we find surrounded by materialism. But in fact we all tend to engage in more current perspective, our ethical standards equally drops...
If we want the world to know the original significance, we find materialism is behind the cover of Nature. First nature occurred then materialism evolved gradually. In the modern era, everything is weighed in the scales of logic but there are some situations that have to accept as concept, which do not get a reasonable answer. Appeasement of such conditions is not by arguments but by faith. Such as when a child goes to school to gain knowledge of primary education, he tends to know the alphabets, he can’t find logic here. He has to accept all and everything as it is. If the first word from the mouth of the baby is 'mom' there is no logic behind it. There is an inner strength rooted in reverence. Faith does not have any form or shape nor any measure, as it is seen by adjusting and focusing the power of the mind it is seen the same. In fact, reverence is a refined form of belief. Reverence has higher level than trust. It is a state of mind which is derived from the ripening of trust.
A passer-by kicks a stone on his way and other can install it on a platform as a statue of God but the God is not in the stone, it is in our assumption. The above interpretation can be understood by an incident.
Swami Vivekananda (the famous Indian monk) once invited to dinner by a king. King was an atheist and was not a believer in Divine Power. Swamiji arrived at the time appointed with him. The king asked after the formal hospitality whether he believes in the existence of God. The king asked that he can’t see the God but why people recite God’s name very often. Swamiji was silent after hearing the questions. He cast his eyes on the walls of the castle then his vision stayed on a picture. When he asked about the picture the king bowed head with great reverence and told that he is his late father . Swami ji expressed his desire to see the picture by near. The king ordered to bring the picture and gave the picture to swamiji. Swamiji put the picture on the floor and asked the king to spit on the picture. So had to be the king became furious and replied that he can’t do such a foolish thing with the picture as it was his most respected father’s picture. After hearing  the king’s answer swamiji smiled and told him that this photo is nothing more than a glass and a piece of paper but it has a great value for you. Quite similar what is stone for you, is God for others. What you see It depends on vision not on the subject. So reverence is above arguments always.
*(written - 31 Jan 1996, It was my first article I think in some essay competition.)

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