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सत्य की खोज...15 (Discovery of the truth...15)

 (अंतर्यात्रा)

सत्य की खोज...15

29 नवंबर २००३

 कागज पर कलम की सहायता से निर्णय करना सबसे सरल उपाय है अपनी दुविधा के गणित को हल करने का।

-१२:२५ a.m.

 डायरी लेखन ने ही मुझे इतनी शीघ्रता से मेरी सफलता का आभास कराया है। लेखन ने ही मेरी वैचारिक प्रगति को प्रखर और तीव्रगामी बनाया है। आत्म प्रगति का मुझ जैसी साधारण बुद्धि मानव के लिए इससे अच्छा उपाय और कोई नहीं है।

-१२:२८ a.m.

अपमान का आहत भाव तुरंत प्रतिशोध का मार्ग तलाशने में जुट जाता है।

-12:32 a.m.

 हर बार किसी की गलतियों को सहन करने पर उसकी गलती का खामियाजा खुद को भुगतना पड़ता है। -१२:५२ a.m.

मुसीबतों के पर्वतारोहण में बार बार स्खलन तो होगा ही, जितनी बार हम स्खलित होंगे, उतनी बार ही ऊपर चढ़ने की कोशिश करनी होगी। नहीं तो नीचे ही कब्र बन जाएगी दुर्बलताओं की।

-१२:५८ a.m.

मुसीबतों का शुक्रिया अदा करो, विपत्तियों को धन्यवाद दो, जिन्होंने तुम्हारे साहस, शक्ति तथा आत्मबल को हर बार बढ़ाया है, आत्मविश्वास और आत्मगौरव को बढ़ाया है।

-१:१० a.m.

किसी और की समीक्षा में समय व्यर्थ न करो, स्वयं की खोज जारी रखो।

-८:०२ a.m.

क्या आपने कभी यह देखने की कोशिश की है कि मन उतनी ही शीघ्रता से समस्याओं का समाधान देता है, जितनी तेजी से एक माचिस की तीली जलती है। मन एक माचिस की भरी हुई डिब्बी है, जो समस्याओं के घर्षण मात्र से ही समाधान का उजाला और अग्नि बिखेर देता है, पर समस्याएँ तब विकराल हो जाती हैं, जब इस माचिस पर दुर्बलता, आलस्य और विकारों की नमी और सीलन चढ़ जाती है।

-८:०५ a.m.

मैं जान गया इस कलम की ताकत को, इससे शक्तिशाली कोई अस्त्र नहीं।

-८:०७ a.m.

एक बच्चा गिरता है, उठता है, संभलता है, फिर चलता है। ठीक से चलने के लिए वह यह प्रक्रिया न जाने कितनी बार दोहराता है, इसका मतलब ये तो नहीं कि भविष्य में वह कभी चल ही नहीं सकता गिरने के बाद। गिरना भी जरूरी है, सँभलने के लिए। पतन भी जरूरी है उत्थान के लिए।

-९:०५ a.m.

मैं तो नदी की बहती जलधारा के समान हूँ, सतत परिवर्तनशील। मेरा कोई मान या अपमान कैसे कर सकता है? मान-अपमान तो इस नश्वर, क्षण-भंगुर शरीर का हो सकता है, मेरा नहीं।

नदी की बहती जलधारा में कोई पूजा के फूल चढ़ाए या कूड़ा-करकट डाले, उसके लिए तो सब एक सामान है, थोड़ी देर तक वह कचरा उसके साथ चलता है फिर आप ही तली में बैठ जाता है, नदी की धारा तो आगे बढ़ जाती है, उस कचरे को छोड़।

जो मैं कल था वो आज नहीं। जो आज हूँ, वो कल नहीं रहूँगा।  मैं क्षण-प्रतिक्षण सतत परिवर्तित हो रहा हूँ। मेरे कल के दोष आज नहीं हैं, आज के दोष कल नहीं रहेंगे, मैं निरंतर आगे बढ़ रहा हूँ, प्रबल झरने की तरह 'कल-कल' 'कल-कल' का गर्जन करते हुए।

-९:४५ a.m.

पिछली समस्याओं को देखो कि आप असफल होने के बावजूद भी कैसे सफल हुए थे।

-९:५७ a.m.

तीर्थ आप किसे कहते हैं? उस जगह को, जहाँ जाकर आपके मन में सद्विचार आते हैं। मेरे लिए तो अब सारी सृष्टि ही तीर्थ है। मंदिर भी तीर्थ है, वेश्यालय भी तीर्थ है।

-९:५८ a.m.

वैचारिक क्रांति की बेला आ रही है।

-१०:१८ a.m.

रात भी दिन के उजाले की पहचान के लिए होती है।

-१०:२७ a.m.

जल्दबाजी में अक्सर हम बहुत कुछ पीछे छोड़ आते हैं। जल्दबाजी में अक्सर हम धोखा खा जाते हैं। जल्दबाजी में अक्सर हम सही को गलत और गलत को सही समझ बैठते हैं। थमकर देखों हर चीज को। थमकर देखो काम, क्रोध, मद, लोभ, दुर्बलता और विकार के प्रत्येक आवेग को। थमकर देखो इन्हें थोड़ी देर, बिना भयभीत हुए और तुम देखोगे कि ये कैसे भाग खड़े होते हैं। सत्य कड़ा धैर्य मांगता है।

-१०:५० a.m.

मेरे भीतर जो जड़ था वह ख़त्म हो गया, अब मैं नित्य चेतन हूँ, सतत परिवर्तनशील।

-११:०० a.m.

मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था कि आगे चलकर सत्य की खोज इतनी सुहावनी हो जाएगी।

-१:०० p.m.

तुम्हारे दुखों और दुर्बलताओं की जिम्मेदार न तो तुम्हारी पत्नी है, न ही तुम्हारे बच्चे हैं, न ही तुम्हारे माता-पिता और न हीं ये संसार। तुम्हारे दुखों और दुर्बलताओं का कारण तुम स्वयं हो, तुम्हारा स्वयं का अज्ञान है।

-२:०० p.m.

रात होते ही मेरे अंदर की शक्तियां करवटें बदलने लगती हैं और मेरे दिमाग की नसों को झिंझोड़ने लगती हैं।

-९:३० p.m.

शक्ति की आराधना करो, इससे बढ़कर और कोई आराधना नहीं इस कलयुग में। इसके लिए किसी मंदिर में जाने की जरूरत नहीं, किसी देवी की तस्वीर पर सिन्दूर, फूल-माला, अगरबत्ती प्रसाद चढाने की जरूरत नहीं। तुम्हे सिर्फ अपनी शक्तियां बढ़ानी हैं, अपने भीतर की सुप्त शक्तियों को जगाना है, जिसका केवल एक ही तरीका है, 'सत्य', सत्य को ढाल लो अपने जीवन में।

-९:३३ p.m.

Adventure of the Truth…

Discovery of the truth...15

November 29, 2003, sat,

To make decisions with the help of Pen to paper is the simplest way to solve the mathematics of your dilemma.

-12: 25 a.m.

Diary writing has realized me my success so quickly. Writing made my ideological progress sharp and rapid. There is no other better way of self-progress for a simple intelligence human like me.

-12: 28 a.m.

Hurting sense of humiliation begins a frantic search of the way of revenge immediately.

-12:32 a.m.

On bearing someone's mistakes every time, we have to suffer ourselves the brunt of his fault.

-12:52 a.m.

There will be frequent landslides in the mountaineering of troubles, as often as we will slide down, every time we will have to try to climb up otherwise it will make our grave down side.

-12:58 a.m.

Be thankful to the troubles, thanks to two plagues, which have increased your courage, strength and willpower each time, which have enhanced your confidence and self-esteem.

-1:10 a.m.

Do not waste your time any more in review of any other person, carry on pursuit of self.

-8: 02 A.m.

Have you ever tried to see that the mind solve problems as quick as a match stick burns, mind is a matchbox full of matchsticks that scatters light and fire of solution on the friction of problems but the problems becomes worse when the match stick has moisture and damp of infirmities and laziness.

-8:05 a.m.

I have known the power of the pen, there is no other weapon powerful than this.

-8:07 a.m.

A child falls, arises, balances then runs. To walk properly, don’t know he repeats this process how many times. This does not mean that he could not walk after falling. Falling is also necessary to learn to walk. Fall is also essential for regeneration.

-9:05 a.m.

I am like a river stream, continuously changing, how could someone respect or insult me? Respect and insult may be of this mortal, fleeting body, not mine.

In the flowing stream of river someone immerses ritual flowers or put rubbish, everything is equal for it. Everything flows with it for a while, then all settle in the bottom or accumulate aside, stream of the river moves forward leaving everything.

What I was yesterday am not today. What I am today will not remain tomorrow. I am changing every moment. My yesterday’s faults do not exist today; today’s faults will not remain tomorrow. I am continuously moving, like an egregious waterfall, making a roar of gurgle.

-9:45 a.m.

Look at past problems that despite failing how you have got success.

-9: 57 a.m.

What is a pilgrimage for you? The place where divine thoughts come to your mind? All creation is a pilgrimage for me now. Temple is pilgrimage, brothel is pilgrimage.

-9:58 a.m.

The time of ideological revolution is coming.

-10: 18 a.m.

The night is meant to identify the daylight.

-10: 27 a.m.

We often leave many things behind in a hurry. We are often deceived in haste. Very often we let right to wrong and wrong to right. Just stop and watch everything consciously. Be still and observe each impulse of your lust, your anger, your pride, your greed, your infirmity carefully, watch them silently, without fear for a while and you will see these will flee. Truth needs a hard patience.

-10:50 a.m.

The inertness within me has finished. Now I am always conscious, ever-changing.

-11: 00 a.m.

I did not anticipate at all that later the discovery of the truth will be so pleasant.

1: 00 p.m.

The responsible for your suffering and vulnerability is not your wife nor your children nor your parents and nor this world. The cause of your suffering and vulnerability is you; it is your own ignorance.

-2:00 p.m.

As night comes, the powers inside me start to roll up and start to shake the nerves of my brain.

-9: 30 p.m.

Worship power. Moreover, no spiritual discipline in this age of Kali (kaliyug). It does not need to go to a temple; it does not need to offer vermilion, flower-garlands, incense, offerings on a picture of a goddess. You just have to increase your powers; you have to awaken dormant powers within you, the only way is 'Truth', just mold the truth in your life.

-9: 33 p.m.


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