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सत्य की खोज...17 (Discovery of the truth...17)

 

(अंतर्यात्रा)

सत्य की खोज...17

1 दिसम्बर २००३

 रात भर मेरे भीतर की सकारात्मक ऊर्जा, नकारात्मक ऊर्जा से लड़ती रही और कड़े संघर्षों के बाद सकारात्मक ऊर्जा ने नकारात्मक ऊर्जा को परास्त कर दिया, काम के प्रबल आक्रमण को भी परास्त कर दिया। रात भर मैं शक्तियों के प्रहारों से व्याकुल हो करवटें बदलता रहा।

-३:५० a.m.

 अब मन मेरे आदेश मानने लगा है।

-९:०७ a.m.

मेरी सारी ऊर्जा नाभि पर केंद्रित हो रही है। यह ऊर्जा मुझे उष्णता और स्पंदन का बोध करा रही है। 

-११:४६ a.m.

 ज्योति तुम, प्रकाश तुम

पृथ्वी तुम, आकाश तुम।

दिग्दिगंत में हो तुम, कूल और कछार तुम,

शून्य से उपज रहे समग्र ये विचार तुम।

सूर्य तुम हो चंद्र तुम,

कण में सूक्ष्म रंध्र तुम।

शब्द तुम हो अर्थ तुम,

शून्य तुम समर्थ तुम।

शून्य में अनंत तुम,

जीव में जीवंत तुम।

पाश तुम हो मुक्ति तुम,

लोभ तुम विरक्ति तुम।

दृष्टि तुम हो, सृष्टि तुम,

व्यष्टि में समष्टि तुम।

स्वप्न तुम यथार्थ तुम,

कृत्य तुम कृतार्थ तुम।

शक्ति तुम, शक्ति तुम,

शक्ति तुम वो शक्ति तुम।

शक्ति और दुर्बलता में से आप किसे चुनोगे ?

-१०:५५  a.m.

सब दीवारें दुर्बलता की आज ढहा दो,

रग-रग में शक्ति की धारा आज बहा दो।

-१२:२० p.m.

पाप-पुण्य का भेद ह्रदय से आज भुला दो,

ह्रदय दीप में सत्य की केवल ज्योत जला दो।

-५:०५  p.m.

है अख्तियार में तेरे, अगर तू हाँ कर दे,

फलक को तोड़ के पैदा नया जहाँ कर दे।

-३:०० p.m.

 मुझे शब्दों की असम्पन्नता पर अफ़सोस होता है, दुनिया भर के शब्द कम हैं मेरे भावों को व्यक्त करने केलिए।

-३:५८ p.m.

अगर तिनके की तरह शक्तिहीन रहोगे तो कोई भी फूंक मार कर उड़ा देगा।

-९:१० p.m.

रात होते ही नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव तेज हो जाता है। मस्तिष्क बीच-बीच में शून्य पर अटकने लगता है। मस्तिष्क के प्रकम्पन तेज होने लगते हैं। श्वास के उतार-चढ़ाव तेज हो जाते हैं। वो परमशक्ति मुझ पर चाहे जितनी नकारात्मक शक्तियां आजमा ले, मैं मैदान छोड़कर भागने वालों में से नहीं। मुझे अपनी शक्तियों पर पूरा भरोसा है।

-९:१५ p.m.

जिसे दुनिया मेरी गंभीरता तथा उदासीनता समझती है, वह मेरा कड़ा आतंरिक संघर्ष है, मेरा सतत आत्म अवलोकन है। मैं देख रहा हूँ कि कैसे एक बीज धरती पर पड़ा, कैसे उस पर धूल मिटटी चढ़ी, कैसे वह अंकुरित हुआ, कैसे उसमे पत्तियां आईं, कैसे वह पौधा बना और अब कैसे वह एक गगन चुम्बी विशाल वृक्ष बनने जा रहा है।

पल, मिनट, पहर, दिन, रात, हफ्ते, महीने अब किसी चीज का कोई आभास नहीं। बस मैं बढ़ जा रहा हूँ निरंतर अपने लक्ष्य की ओर।

-१०:३० p.m.

अपनी दुर्बलताओं से भागने वाला कभी सत्य की खोज नहीं कर सकता।

-१०:४५ p.m.

दुनिया में कितने कीड़े, मक्खी, मच्छर हर घंटे में मरते हैं? उन पर कौन शोक प्रकट करता है? फिर क्यों तुम अपने किसी सगे-संबंधी के मर जाने पर कोहराम मचाकर उस परमात्मा को धरती पर बुलाना चाहते हो? क्यों उससे अपेक्षा करते हो कि वह भी तुम्हारे शोक पर शोक मनाने आए, उसके लिए तो तुम कीड़े-मकोड़े ही हो।

रोओ मत, गिड़गिड़ाओ भी मत, पत्थर पर सर भी मत पटको कि वह तुम्हारी क्यों नहीं सुनता। कीट-पतंगों की भिनभिनाहट उसके कानों तक नहीं पहुँच सकती। हाँ, वह तुम्हारी आवाज जरूर सुनेगा, पर उस वक़्त जब तुम कीट पतंगे नहीं रह जाओगे, जब तुम अपने भीतर इतनी शक्ति जागृत कर लोगे कि उसके समतुल्य हो जाओगे। तो फिर उठाओ आज ही से, अभी से, अपने भीतर सोई हुई उन शक्तियों को। न्याय-अन्याय तो तुम्हारी ही दी हुई परिभाषाएँ हैं, तुम्हारी कीट-पतंगों की दुनिया के नियम हैं। ये नियम उसकी दुनिया में नहीं चलते। वहाँ सिर्फ एक ही नियम चलता है- 'शक्ति का नियम।' शक्ति, शक्ति, शक्ति ही शाश्वत सत्य है।

-११:०० pm

मेरे जीवन के बंद द्वार जो अब तक मेरे लिए कैदखाने की दीवार थे, अब मेरे लिए खुलते चले हैं। इस कैदखाने में छटपटाता हुआ मैं बाहर की सुंदरता का अब तक सिर्फ अनुमान ही लगाता रहा, पर अब पता चला है कि आजादी क्या होती है, स्वच्छन्दता की उन्मुक्त उड़ान क्या होती है, खुले आसमान का सौंदर्य क्या होता है, धरती की हरियाली क्या होती है, बहते हुए सुरम्य झरने क्या होते हैं, पर्वत श्रृंखलाएं कैसे बांहें पसारे अपनी गोद में बुलाती है, वन का मनोरम दृश्य क्या होता है। अब मैं मुक्त हूँ सारे सांसारिक बंधनों से।

-११:४७ pm


Adventure of the Truth…

Discovery of the truth...17

December 1, 2003, Mon,


Whole night my inner positive energy fought with the negative energy and after a tough struggle the positive energy has defeated the negative energy, also defeated the intense invasion of sex. I undeterred by attacks of powers was tossing and turning all night.

-3: 50 A.m.

My mind has now started to obey my command.

-9: 07 A.m.

All my energy is focusing on my navel. This energy is now making me aware of the heat and vibrations.

-11: 46 A.m.

You are the flame, you are the light

You are the earth, you are the heaven.

You are in every direction, you are the sea shore and you are the bank of river,

You are all the thoughts originating from the zero.

You are the sun, you are the moon,

You are the microscopic stoma in the particles.

You are the word, you are the meaning,

You are the zero, you are the omnipotent.

You are the infinite inside the void,

You are the life inside the organism.

You are the trap, you are the liberation,

You are the greed, you are the tedium.

You are the sight, you are the creation,

You are the macro inside the micro.

 

You are the dream you are the reality,

You are the act you are the gratified.

You are the power, you are the power,

You are the power, you are that power.

 

Whom will you choose between the strength and weakness?

-10: 45 A.m.

Demolish all the walls of infirmity today,

Shed the current of power in each pulse today.

-12:20 p.m.

Forget the difference of sin and righteousness from your heart today,

Just lit the flame of the truth in the lamp of your heart.

-5: 05 p.m.

The rest with you, if you give a yes,

Break the pane and lead to a new world.

-3: 00 p.m.

I feel regret on the non-prosperity of words, worldwide words are short to express my feelings.

-3: 58 p.m.

If you will remain powerless like a straw, anyone will blow you.

-9:10 p.m.

As night falls, the effect of negative forces intensifies. In between brain seems stuck on zero. Vibrations of the brain seem to be fast. Fluctuations of breaths become faster. As much as the ultimate power may try the negative forces over me, I am not going to flee the field. I have full faith on my powers.

-9: 15 p.m.

To which the world considers my seriousness and indifference, it is my strong internal conflict, it is my constant self-observation. I see that how a seed fell on earth, how the dirt and clay covered it, how it sprouted, how the leaves came on it, how it became a plant and now, how it is going to be a sky-high huge tree.

Second, minute, hour, day, night, week and month nothing realizes me anything now. I'm just moving constantly toward my goal.

-10:30 p.m.

By escaping from his weaknesses, one cannot discover the truth.

-10: 45 p.m.

How many insects, flies, mosquitoes die every hour in the world? Who lament on those. Then why do you want to call the divine on the earth by stirring up the chaos on the death of any of your kinsfolk? Why do you expect him to come to mourn on your mourning, to weed, or to give you solace, you're all insects for him.

Don't cry, don't entreat, don't hit your head on stone that why doesn't he listen to you. Buzzing of insects can’t reach his ears. Yes, of course he will listen to your voice, but at that time when you will not be the moth-pests, when you will awake up so much inner strength, that you will be equivalent to him. Then wake those powers from today, from now, which are sleeping within. Justice-injustice are the definitions given by your own, these are the rules of the world of you insects. These rules do not go into his world. There runs only one rule is' the law of force.' Power, power, power! Power itself is eternal truth.

-11:00 p.m.

The closed doors of my life, which were walls of prison for me, are now open for me. Suffering in the prison I had been only guessing the beauty of outside, but now revealed that what is freedom, what is the free flight, what is the beauty of the open sky, What is the greenery of the earth, what are the flowing picturesque waterfalls, how the outstretched arms of mountain ranges calls on its lap, what is a panoramic view of the forest. Now I am free from all worldly ties.

-11:47 p.m.


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