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समर्पण या छल...? (Dedication or deceit...?)


प्रार्थना (पूजा) एक मानवीय संवेदना है, कृतज्ञता की सर्वोच्च अभिव्यक्क्ति है, मानवीय सभ्यता का एक अंग है, जो यह अनुभूति कराती है कि मनुष्य पशुओं से भिन्न है।
-२८ अगस्त २००१
सही और गलत का निर्णय हम अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर करते हैं और ये अनुभव घटनाओं की पुनरुक्ति के आधार पर बनी धारणाएं होती हैं अतः झूठ को बार-बार दोहराते रहने पर वह भी सच की शक्ल ले लेता है।
-१४ सितम्बर २००१
किसी समस्या अथवा सिद्धांत की आलोचना करना तो अत्यंत सरल कार्य है परन्तु उसका निदान या समाधान देना उतना ही कठिन। किसी लड़खड़ाती हुई प्रणाली को दोष देना तो सहज है पर उसे सहारा देना उतना ही कठिन है। आज के आदमी को दुनिया भर के ज्ञान ने निषेधों से भर दिया है कि ये मत करो, वो मत करो, ऐसा मत करो, वैसा मत करो और आदमी को अकर्मण्य बना दिया है, उसे नपुंसक बना दिया है। किसी भी गलती को दूर करने का एकमात्र सहज उपाय है कि गलती करने वाले को उस कार्य के करने का सही तरीका बता दें, गलती तो अपने-आप ही दूर हो जाएगी लेकिन केवल दोषों को कोसते  रहने से और मनुष्य में निषेधों को भरते रहने से वह दूर नहीं होगा वरन और विकृत हो जाएगा। जिस प्रकार अँधेरे को कोसते रहने से वह दूर नहीं होता। केवल प्रकाश की एक किरण उसे दूर कर सकती है। ज्ञान को दूर करने के लिए प्रत्यक्ष सत्य ही पर्याप्त है।
-२९ सितम्बर २००१
समर्पण या छल...?
सोचता हूँ कि समर्पण कहीं छल तो नहीं। जब आदमी अपने आप से टूट जाता है तो उसका स्वयं पर से विश्वास खंड-खंड हो जाता है। जब वह स्वयं में असहाय अनुभव करता है, जब वह अपने विचारों की हत्या कर देता है या मानसिक आत्महत्या कर लेता है, तब तनाव से मुक्ति पाने के लिए अथवा अपने द्वन्द से पलायन करने के लिए वह अपने आप से ही छल करने लगता है और इस तरह बिखरा हुआ  व्यक्ति अपने आप को समेत कर किसी अन्य आदर्श या काल्पनिक ईश्वर को सौंप देता है। इस प्रकार वह वास्तविकता से पलायन करने लगता है। कभी-कभी इसके परिणाम सकारात्मक भी होते हैं परन्तु वे परिणाम व्यक्ति में पहले से ही मौजूद होते हैं।
-२ नवंबर २००१
विश्वास करें, अपनी ज़िन्दगी के सफर में आप बिलकुल अकेले हैं...
-२७ दिसंबर २००१
Prayer (worship) is a human sensation. It is the highest expression of gratitude. It is a part of human civilization; it gives the feeling that man is different from animals.
-28 Aug 2001
 We decide right and wrong based on our previous experiences and these experiences are the assumptions based on the repeated events. Hence often the frequently repeated lie takes shape of the truth.
-14 Sep 2001
 To criticize any problem or theory is very simple task but it’s more difficult to give the diagnosis or solution. It is easier to blame a deterioring system but the more difficult to support it. World's knowledge has filled today's man with the prohibitions that don’t do this, don’t do that. It has made the man mandarin, it has made him impotent. The only solution to remove any fault is to tell the correct way to do that. Do not discuss fault. Fault will be away on its own. By only defects being bashed and only man to be filled with negatives mistakes will not be removed but will be even more distorted. The way, to curse the darkness it does not overcome. The only ray of light can take away it. To overcome ignorance the direct truth is enough.
-29 Sep 2001
Dedication or deceit...?
 I think, far and away, is dedication not a deceit? When the man breaks in its own, his self-confidence becomes fragmentary. When he feels helpless, when he kills his own ideas, he takes mental suicide. And to get rid of stress, to escape from his dilemma he seems to be deceit himself. And thus, He gathers his scattered existence and consigns it to any other ideal or imaginary God. Thus he seems to flee from reality. Sometimes its results are positive but the results are already present in the person.
-2 Nov 2001
 Believe, in the journey of your life you are all alone.
-27 Dec 2001

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