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प्रत्यक्षानुभूति... (Direct cognition...)

प्रत्यक्षानुभूति...
फ्रायड ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि मनुष्य के सारे क्रियाकलापों का मुख्य केंद्र बिंदु यौन-भावना (सेक्स) ही है। मानव जीवन एक वर्तुल में घूम रहा है जिसका केंद्र यौन-सुख है। सेक्स में लिपटे अपने जीवन की हकीकत को लगभग दुनिया का हर आदमी नकारता है।  एक सामान्य मनुष्य की विडम्बना यह है कि उसका जीवन सेक्स से बाहर हो ही नहीं सकता, उसका जीवन आरम्भ से अंत तक सिर्फ और सिर्फ सेक्स है। दुनिया का हर आदमी जिस सेक्स का सामना रोज करता है उसी को झुठलाना चाहता है इसलिए इस दुनिया में सेक्स इतना दमित, कुंठित और विकृत हो गया है। बहुत कम लोगों में इतना साहस होता है कि वे अपनी कमजोरियों को अपने अहम के परदे से ढांके बिना उसे यथावत स्वीकार कर लें।
मैं शुरू से स्वच्छंद व्यक्ति रहा हूँ। सिवाय अपने मनमौजीपन, ज़िद और सनक को पूरा करने के, मैंने और कुछ नहीं किया। मैंने अक्सर वर्तमान के लिए भविष्य को दांव पर लगाया है। मैंने पूरी स्वच्छंदता के साथ सिर्फ और सिर्फ वर्तमान को जिया है। मैंने फ्रायड का यह विवादास्पद कथन तो बहुत बाद में पढ़ा पर इसका अनुभव अपनी १४-१५ वर्ष की आयु में ही कर लिया था। तबसे मैं अपने भीतर के इस सेक्स से लड़ते आ रहा हूँ। मैंने भी फ्रायड के सिद्धांत को नकारने की भरपूर कोशिश की लेकिन अंत में यही पाया कि फ्रायड की खोज मनोविज्ञान के जगत में सबसे अहम खोज है लेकिन शायद फ्रायड को खुद यह पता नहीं था कि उसकी यह खोज, जिसे वह सिर्फ एक रुग्णावस्था या एक बीमारी मानता है, एक नए आयाम को जन्म दे सकती है। फ्रायड के विचार में मनुष्य की चेतना में सेक्स के आगे सिर्फ अन्धकार है और कुछ नहीं लेकिन में इस अन्धकार में भी एक ज्योति देख रहा हूँ, मैं देख रहा हूँ कि इस अन्धकार में ही चैतन्यता का सितारा टिमटिमाना चाहता है पर इसके लिए केंद्र का एहसास होना जरूरी है और इसके लिए परिधि का टूटना जरूरी है।
-११ मार्च २००१
मुझे शान्ति भांग करने वालों से बेहद नफरत है, चाहे वह धर्म अथवा मज़हब के नाम पर हो अथवा किसी और आडम्बर की आड़ में...
-८ अप्रैल २००१
सत्य का मार्ग बहुत लम्बा और कष्टप्रद है इसलिए सामान्य व्यक्ति इस पर चलने का साहस नहीं जुटा पाता। सत्य के मार्ग पर तो केवल वे ही चल सकते हैं जिन्हे न तो आत्मसंतुष्टि के अलावा और कुछ पाने की आकांक्षा होती है और न ही कुछ खो देने का भय...
-९ अप्रैल २००१
शरीर की सारी शक्तियां मन से संचालित होती हैं। यदि मन को बीमार कर लें तो शक्तियों का अपव्यय होता है और मन की संचालक शक्ति है- 'आत्मविश्वास'.
-९ अप्रैल २००१
एक स्त्री के चरित्र को कोई नहीं पहचान सकता...
-८ मार्च २००१

Direct cognition...

Freud rendered the theory that the main focus of all human activities is the sexual feeling. Human life is moving in a circle whose center is sexual pleasure. Almost every man in the world denies the sex-coated reality of his life. The irony of a normal man is that Sex cannot be out of his life. His life from beginning to end is only and only sex. Due to social decency every man in the world wants to belie the sex which he faces every day. So in this world sex become so repressed, frustrated and distorted. Very few people have the courage to accept their weaknesses without covering them with the membrane of their ego.

I have been wayward since beginning.  I have done nothing in life than to satisfy my insistence and whims. I often put the future at stake for the present. I have lived only and only present with full freedom. So I read Freud's controversial statement much later, I have experienced it in my 14-15. Since then, I'm fighting within sex. I also strived to deny Freud's theory but at the end found that Freud’s discovery is the most important discovery in psychology. But perhaps Freud himself did not know it's his discovery, which he considers just a disease condition may lead to a new dimension.

In Freud's view, there is just the darkness and nothing else ahead the sex in man's consciousness but I'm seeing a light in the darkness I see that a star of consciousness wants to shimmer in the darkness. But for this, the center is to be realized and for this the breakdown of circumference is essential.
-11 Mar 2001

I extremely hate those who disturb the peace whether it is in the name of religion or in the name of any other hypocrisy.
-8 Apr 2001

The path of Truth is very long and annoying so normal person cannot gather the courage to follow. Only those can walk on the path of truth, who want nothing other than self satisfaction nor do they have any fear of losing something.
-9 Apr 2001
All the powers of the body are governed by the mind. If we make sick our mind then there is wastage of powers and the driving force of mind is self-confidence...
-9 Apr 2001
 No one can identify character of a lady.
-8 Mar 2001

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