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'सुकून' (‘Peace’)


मेरे प्रिय मित्रों,
आज मैं आप लोगों को अपने प्रिय मित्र दीपक तिवारी 'दिव्य' से मिलाना चाहूँगा।  इन्होने मेरे पूर्व लिखित ब्लॉग 'विद्रोह' का सकारात्मक पक्ष दिखलाया। इन्होने उस समय मेरी डायरी में 'विद्रोह' के जवाब में 'सुकून' लिखा था।  आज यहाँ मैं उसे प्रस्तुत करना चाहूंगा।  हम दोनों एक दूसरे के लिए प्रेरणा हैं। हम दोनों एक दूसरे के लिए मार्गदर्शक हैं। और हम दोनों एक दूसरे के कार्यों के समीक्षक भी हैं। मैं अपने इस मित्र का ह्रदय से आभारी हूँ। तो अब समय है उस 'सुकून' को पढ़कर महसूस करने का...
'सुकून'
काले पत्थरों की ऊंचाइयां, दोनों ओर,
तल की गहराइयों में मैं हूँ,
ऊपर के किसी बिंदु पर एक सूक्ष्म धुंधलका सा है, जो 'था' हुआ जाता है।
जैसे जैसे वक़्त गुजरता जा रहा है, मेरी तड़प बढ़ती जा रही है।
शायद आखिरी तड़प,
वो धुंधलका शायद अब मुझे देख नहीं पा रहा है, जिस पर मेरा सारा ध्यान लगा है।
शरीर का एहसास नहीं, आभास नहीं, विश्वास नहीं,
कि ध्यान भी धुंधलके के साथ जा रहा है।
अब कौन है अकेला, केवल शरीर, माटी, या फिर तलछटी की रेत,
और छटपटाहट से चीखता चारों ओर का पानी...
मुझे देखकर जागते हैं सोते से, चारों तरफ के जीव-जंतु,
और खुश है, उनके चेहरे पर मुस्कान है, जिसका कारण मैं हूँ,
मैं उन्हें एक ख़ुशी दे रहा हूँ, वे मुझे देख कर ख़ुशी के मारे झूम रहे हैं।
कुछ देर में हमारी क्षुधा शांत हो गई, मेरी भी उनकी भी,
उन्हें भोजन मिल गया और मुझे रौशनी।
मैं चल पड़ा कि सारा जहाँ है सितारों का,
कारवां है सितारों का, मेरे सपने, मेरी तृष्णाएं सब कुछ साथ हैं,
उस अनंत लहर में विलीन होने को आतुर,
साथी निराश न होना, उदास न होना।
इस धरती पर जीवन को सार्थक करना है।
अपना कर्म आत्मसंतुष्टि के साथ करते चलना,
परे हो जाना वासना से, वासना को बदलना उपासना में,
तुम्हारे साथ मैं हूँ, हर कहीं,
मेरे हमदम, मैं ही हूँ तुम्हारे साथ, हमेशा।
अहा... ये सुकून...
ख़त्म सा जूनून...
सुकून
 -९ सितम्बर २००२

Hi friends...

Today I would like to introduce you my dear friend Mr. Deepak Tiwari 'Divy'. He showed me the positive face of my earlier blog 'Rebellion'. He wrote 'Peace' that time in my diary in reply of 'Rebellion'. I would like to present that here. We both are inspiration for each other we both are guide to each other and we both are reviewer of each other’s works. I am very grateful to him. Now it’s time to feel ‘peace’ by reading ‘peace’...

‘Peace’

Black stone heights, both sides,
I'm at the bottom of the depths,
At some point a subtle bit of the Twilight, which has occurred ‘was’,
As time passes, my yearning is increasing,
Perhaps the last yearning,
Maybe now I cannot be seen by that Twilight, on which I am focused entirely.
The body does not realize, no inkling, no faith,
With the twilight my focus is also going.
Who is now alone, only the body, soil, or sand sediments,
And the screaming water around with the writhing movements...
Seeing me, animals awake by sleep around,
And they are happy; there is smile on their faces, because of me,
I am giving them happiness; they are whirling in the happiness seeing me,
Our apps were quiet in a while, my too, theirs too
They got food and I got the light.
I walked with all worlds of the stars,
Caravan of stars, my dreams, my desires all are along with,
Eager to lose in the endless wave,
Buddies bear up, not be sad.
Life on this earth is to be meaningful.
Go on to do your deeds with self-satisfaction,
Go beyond the lust; change the desires in veneration,
I'm with you, everywhere,
My companion, I am with you, always.
Aha ... the peace...
The obsession is about to over...
Peace

-9 September 2002

Comments

  1. मेरे दोस्त मेरे शब्दों को अपने ब्लॉग में स्थान देकर तुमने इन्हें प्रचारित और प्रसारित किया है तुम्हारी प्रेरणा से उत्पन्न मेरे अंतर से यह शब्द इस उम्मीद के साथ तुम्हारे माध्यम से पूरे विश्व को समर्पित कर रहा हूं कि यह मेरे नाम को सार्थक करेंगे और जिस प्रकार दीपक मार्गदर्शन करता है उसी प्रकार मार्गदर्शक का कार्य मेरे यह शब्द इनके पाठकों का मार्गदर्शन करेंगे.... योगेश भाई अबकी बार मिलेंगे तो फिर कुछ नया लिखेंगे जीवन में बड़े परिवर्तन हो रहे हैं अंतस में बड़े परिवर्तन हो रहे हैं और उनकी एक झलक एक बार फिर शब्दों में उकेरने का समय आ गया है। मेरी तरफ से आपको और आपके इस प्रयास को कोटि-कोटि धन्यवाद और मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं और इस प्रयास के साथ हैं आपका मित्र कवि दीपक तिवारी दिव्य

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  2. मेरे प्रिय मित्र बहुत बहुत धन्यवाद। निस्संदेह तुम दीपक हो, और काम तुम्हारा उजियारा फैलाना है, अपने लेखन के माध्यम से, अपने शब्दों के माध्यम से, अपनी कविता के माध्यम से। मैं ऋणी हूँ उस क्षण का, और उन मित्रों का जिनसे मेरा तुमसे परिचय हुआ और साथ ही एक नए आयाम से मेरा परिचय हुआ। तुम्हारे इन अमूल्य शब्दों के लिए मेरे साथ साथ मेरा जीवन मेरी डायरी, मेरी लेखनी और मेरा ब्लॉग भी कृतज्ञ है। एक बार फिर तुम्हारी इन शुभकामनाओं के लिए साधुवाद।

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