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उलझने... (Mazes...)


उलझने...
जुगनू चमकते थे तो लगता था कि सहर होने वाली है...
पर अपनी किस्मत में तो काली अँधेरी रात ही थी...
सोचा कि उलझनों को सुलझा लूँगा...
पर इन्हे सुलझाते-सुलझाते खुद एक उलझन बन गया... 
रिश्तों की दरारों में एक ज़ख्म भी भर नहीं पाता था की और दो चार नए ज़ख्म मिल जाते थे...
उम्र यूँ ही गुजरती जा रही थी...
ज़ख्मों को गिनने और सहलाने में...
सोचता था कि शायद कोई मसीहा मिल जाए...
जो कभी मेरे दर्द को समझ सके...
पर ज़िंदगी केवल पूरी हो जाने वाली हसरतें ही नहीं हुआ करती...
प्यास भी होती है...
नफरतों की आंधी हर शै बहा कर ले गई...
अब कुछ भी नहीं बचा मेरे पास...
दूसरों को ख़ुशी देने की तमन्ना भी ग़मों के समंदर ही लेकर आई...
किसी का भी किसी चीज़ पर अख्तियार नहीं...
हवाओं के इशारों पर उड़ता हुआ पत्ता जानता है कि उसका हवाओं पर कोई अख्तियार नहीं...
मगर फिर भी हवाओं से लड़ता चला जाता है...
-२० जुलाई २००२
Mazes...

 Fireflies shone then it seemed that dawn is about to come...
But my luck had only a black dark night...
I thought I will solve the mazes...
But solving them I myself became a maze...
In the crevices of relationships even a wound was unable to fill and two-four new injuries were found...
Age was simply passed...
In counting and caressing the wounds...
Thought that maybe get a Messiah...
Who could ever understand my pain...
But the life does not only the desires to be completed...
There is a thirst too...
The storm of hates washed away everything...
Now I have nothing left...
The desire to give pleasure to others also brought the sea of sorrows...
No one has right on anything...
Leaf flying at the behest of winds knows that it has no right on the winds...
Still goes fighting with the winds...
-20 July 2002



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