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अंतहीन...अविराम... (Endless ... non-stop...)


अंतहीन...अविराम...


ज़िन्दगी की राह पर चलते-चलते अचानक यूँ लगा...
जैसे राहें अचानक ख़त्म हो गईं और जीने के लिए कोई राह नहीं बची...
मैं उदासीन होकर थक-हारकर बैठ गया...
पर मेरी आत्मा के किसी छोर से आवाज़ आई कि चलते-चलते राही ख़त्म हो जाते हैं
पर राहें ख़त्म नहीं होतीं...
ये तेरी नज़रों का धोखा है...
एक फरेब है...
चल! आगे बढ़...
थक-हार कर बैठ जाना तेरा काम नहीं...
तेरा काम है आखिरी सांस तक आगे बढ़ते जाना...
चलते जाना...
और जैसे कोई मेरा हाथ थामकर मुझे आगे ले जाने लगा...  
और चंद कदमो पर ही चलकर मुझे रास्ता साफ़ नज़र आने लगा...
राह खत्म हो जाने का फरेब केवल एक अँधा मोड़ था...
हाँ! केवल एक अँधा मोड़...
अक्सर हम मोड़ को राह का खत्म समझ बैठते हैं और राह छोड़ कर खड़े हो जाते हैं...
पर जीवन केवल दुखद अनुभूतियाँ नहीं है...
बल्कि एक दिव्य शक्ति भी है...
-७ जून २००२

Endless ... non-stop...

While moving on the way of the life, suddenly it seemed...
As paths were ended abruptly and there is no way left to live...
I sat listless and tired as I lost...
But a voice came from an edge of my soul that the passer by vanish by walking on the paths but the path does not end...
This is confusion of your eyes...
It is a deception...
Come on! Go ahead...
Sitting tiresomely defeatedly is not your job...
Your job is to go forward to the last breath,
to move on...
And felt like someone held my hand and took me further...
And just a short walk on the path I could see clear...
The illusion of way to end was only a blind turning...
Yes! Only a blind turning...
Often we consider a turn as end of the path and left it and stand aside...
But life is not only painful sensations...
But a divine power also...
-7 June 2002


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