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लेखा-जोखा... (What is in my account...)


लेखा-जोखा...
पेड़ों के झुरमुट से किरणों ने झाँका...
सूरज अपना सर उठाए बढ़ रहा था...
और पंछी शोरगुल मचा रहे थे...
मैं एक पेड़ के नीचे बैठा था...
आधा जागा सा आधा सोया सा...
और अचानक मन अतीत के झूले पर सवार होकर झूलने लगा...
और मैं सोचने लगा कि अपने अतीत के पिछले सत्ताईस सालों में मैं कब-कब जागा था और कब-कब सोया था...
पर शायद प्रश्न ही अटपटा था या उत्तर...
और अगले एक ही पल में अतीत के सत्ताईस साल पन्नों की तरह फड़फड़ाते हुए सामने से निकल गए...
बिलकुल एक सपने की तरह...
शायद हम ज़िंदगी सपने में ही जीते हैं...
या शायद ज़िंदगी ही एक सपना है...
-२७ अप्रैल २००२

What is in my account...

Rays peeped from the clump of trees...
The sun was moving his head raised...
And the birds were making noise ...
I was sitting under a tree ...
Half awakened, half slept ...
And suddenly mind started swinging riding on the swing of the past ...
And I began to think that in my past twenty-seven years how often I was awakened and how often slept...
But perhaps the question was odd or answer ...
And in the next moment the past twenty-seven years have passed from the front like pages flapping ...
Just like a dream ...
Perhaps we lives the life in a dream ...
Or Perhaps life is just a dream ...
-27 April 2002

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