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मोहभंग... (Disillusionment...)



मोहभंग...

जैसे-जैसे ज़िंदगी की रेल आगे बढ़ती चली जा रही थी...
रिश्तों के मोहजाल का कुहरा छंटता चला जा रहा था...
मक़ाम पर मक़ाम ग़ुजरते जा रहे थे और रिश्ते-नातों की परिभाषाएँ सुलझतीं जा रहीं थी...
एक-दूसरे के दिलों से जुड़े भावनाओं के तार स्वार्थ के खिंचाव के कारण उलझते और टूटते जा रहे थे...
और रह-रह के सामने आ रहा था स्वयं के वजूद का प्रश्न...
दुनिया के रिश्ते-नातों के जंगल में गूंजता एक मूक प्रश्न...
जैसे-जैसे मैं खुद में डूबने की कोशिश करता, वैसे-वैसे ये दुनिया मुझमे डूबने का प्रयत्न करती...
और मेरे अंदर की गहराइयों में भावनाओं के समुद्र में हलचल मचाती  जाती...
और उलझने पैदा करती जाती...
पर शायद ये उलझने भी मेरे भविष्य की किताब के चेप्टर हैं... 
-११ जून २००२ 

Disillusionment...

As the train of life was going to move forward...
The haze of pishogue of relationships was scattering...
Territories were passing one by one and the definitions of the relationships-kinships were solving...
The strings of emotions associated with each other's hearts were involving and breaking due to the pull of selfishness...
And the question of self-existence was exposing ever and anon...
A dumb question echoing in the world of the forest of relationships-kinships...
As I was trying to drown myself, so the world was trying to drown in me...
And was screaming commotion in the sea of emotions deep inside me...
And was causing complications...
Perhaps these complications are the chapters of the book of my future...
-11 June 2002

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