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बेखुदी...कब तक? (Senselessness ... How long?)


बेखुदी...कब तक?
साक़ी (ईश्वर) शराब (ज़िंदगी) उड़ेलता रहा और पैमाने छलकते रहे...
मैं पीता गया और खुमार बढ़ता गया...
पैमाने बदलते गए...
और जाम छलकते रहे...
महफ़िल में सुरूर बढ़ता गया...
और मदहोशी बढ़ती गई...
और अचानक महफ़िल इन्तहां (समाप्ति) पर आ गई...
मयकश पीते-पीते झूमते-झूमते बेहोश होने लगे...
लेकिन मुझमें अभी थोड़ा सा ख़ुलूस (होश) बाकी था...
साक़ी के चेहरे पर अब तक नक़ाब था... 
पीनेवाले जाम के नशे में साक़ी के हुस्न को भूल गए...
मेरा खुलूस मुझसे कह रहा था कि इससे पहले कि तू भी बेखुद हो जाए...
नक़ाब उलट दे...
और हुस्न के ताब का दीदार कर ले...
और मैं अपनी बेखुदी से लड़ता गया...
लड़ता गया...
और अब तक लड़ता आ रहा हूँ...
-२९ अप्रैल २००२

Senselessness ... How long?
 Barmaid (God) had been pouring wine (life) and glasses had been spilling...
I had been drinking and hangover had been rising...
Glasses had been changing...
And drinks had been overflowing...
Aftereffect of intoxication had been growing in the gathering...
Inebriation had been growing...
And suddenly gathering had come to the climax...
Drinkers began to become unconscious while drinking and vacillating...
But I still had a little conscience left...
There was still mask on the face of the barmaid...
Drinkers had forgotten the beauty of the barmaid in the intoxication of the wine...
My conscience was telling me that before you become too unconscious...
Invert the mask...
And take a look at the glamour of the beauty...
And I fought my senselessness...
I fought...
And still I'm fighting...
-29 April 2002

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