Skip to main content

गुफ़्तग़ू... (Interlocution..)


गुफ़्तग़ू...

·                     ये रात की तन्हाई... ये रात का सन्नाटा... न जाने क्या कह रहे हैं... अपनी ही गुनगुनाती आवाज़ एक नए आत्मिक संगीत को जन्म दे रही है... ज़हन में कल्पनाओं के पर फड़फड़ाने लगे हैं...
·                     ये रात की तन्हाई... ये रात का सन्नाटा... रौशनी घुप्प अँधेरे को चीरती जा रही है... अँधेरा रौशनी को निगलता जा रहा है... रौशनी अँधेरे में सिमटती जा रही है...
·               ये रात की तन्हाई... ये रात का सन्नाटा... दिल-ऐ-नादाँ फिर से अजीब सी सनकों और फ़ितरतों से घिरने लगा है... कभी एक पल में इस पर रोने का जी करता है तो कभी एक पल में इस पर हंसने का जी करता है... वो ही जाने... ये मुश्किलें हैं कि हल...
·                     ये रात की तन्हाई... ये रात का सन्नाटा... उफ़! तूने ये रातें क्यों बनाईं...खयालों के कई जलते हुए शोले भभकते हुए दिल-ओ-दिमाग की इस झील में गिरते जा रहे हैं...मैं बुझता जा रहा हूँ कि जलता चला जा रहा हूँ...  
·                     ये रात की तन्हाई... ये रात का सन्नाटा... चाँद-सितारों का सफर जारी है... काले आसमान पर कारवां चल रहा है...
·                     ऐ हमसफ़र... ऐ चाँद... जरा देर तो रुक जा... जरा तो दम ले ले...जरा देर तो रुक कर मुझसे बातें कर ले... या तू भी दुनिया की तरह मुझे पीछे छोड़ कर आगे बढ़ जाना चाहता है...
·                     ये रात की तन्हाई... ये रात का सन्नाटा... फिर से मैं  अकेला रह गया हूँ... नहीं, नहीं... अकेला कहाँ कितनी बिखरी यादों के हूजूम बाँहें पसारे मुझको घेरे खड़े हैं... फिर से इनकी महफ़िल जम रही है... लो! फिर से यादों की शहनाई बजने लगी... पर ये इनकी खुशियां हैं या मातम...
·                     उफ़! ये क्या हो रहा है...? क्या फिर से सवेरा होने वाला है...? क्या फिर से दुनिया जागने वाली है...? क्या चाँद तारों की मंज़िल पहुंची है...? क्या ये यादों के हूजूम उठकर जाने लगे है...? क्या फिर से खत्म हो जाएगा सब...? हाँ! सहर होने वाली है.. चलो अब सोया जाए...
-९ जुलाई २००२ 

आवश्यकता से अधिक अपेक्षाएं और महत्वाकांक्षाएं ही हमारे दुखों का कारण बनती हैं।
-१० जुलाई २००२

Interlocution...


§  The loneliness of the night... the silence of the night... do not know what are saying...  my own chanting voice is giving a rise to a new spiritual music...... wings of fantasies are flapping in the mind...
§  The loneliness of the night... the silence of the night... light is splitting the pitch darkness... darkness is gobbling up the light...  light is shrinking in the darkness...
§  The loneliness of the night... the silence of the night... Innocent heart is again surrounding strange whims and slyness... In a moment heart says to cry, in other moment heart says to laugh... God knows... These are difficulties or the solutions...
§  The loneliness of the night... the silence of the night... Oops! Why you made these nights... Many embers of burning thoughts are falling into the lake heart-o-minded sputteringly... I'm extinguishing or going on burning...
§  The loneliness of the night... the silence of the night... Moon-stars make way... Caravan is moving on the black sky...
§  O companion... O moon ... stop a while ... Just take a rest... stop a little longer to talk with me... Or you also want to move forward leaving me behind like this world...
§  The loneliness of the night... the silence of the night... Again I am left alone. .. No, no ... where alone! How many scattered memories’ crowd are standing with outstretched arms surrounding me... Again they are arranging their gathering... Look! Clarinet of memories started blowing again... but it's their joy or grief...
§  Oops! What's happening...?  Is going to be morning again...? The world is going to wake up again...?  Has the moon and stars come to their destination...? Has the crowd of these memories gotten up to go...? The loneliness of the night... the silence of the night... Will all be over again...? Yes! Morning is occurring... Let's now go for sleep...
-9 July 2002
 The expectations and ambitions in excess of requirement cause our suffering.
-10 July 2002


Comments

Popular posts from this blog

परमसत्य की खोज...16 (Discovery of the absolute truth ... 16)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...16 17 दिसम्बर 2003 यदि सच्ची सफलता चाहते हो तो कड़े से कड़ा अनुशासन अपनाना पड़ेगा। संघर्षो के कष्टों को झेलना पड़ेगा। जितना अधिक संघर्ष करोगे, जितना अधिक कष्ट झेलोगे, उतनी ही शीघ्र आगे बढ़ोगे, उतने ही लक्ष्य के समीप पहुंचोगे। संघर्षों से खुद को बचाने वाले और किस्मत के भरोसे बैठे रहने वाले कभी सच्ची सफलता नहीं पा सकते, उन्हें सिर्फ दूसरों की सफलता की जूठन मिल सकती है। गलत तरीके से तथा दूसरों के सहारे मिली सफलता ज्यादा दिनों तक ख़ुशी तथा संतुष्टि नहीं दे सकती, वह तो मरे हुए शिकार के समान होती है। मरा हुआ शिकार लोमड़ी को ही प्रसन्न कर सकता है, शेर को नहीं। मरा हुआ शिकार तथा दूसरों की जूठन शेर के किसी काम की नहीं होती। -10:15 a.m. एक पल का निर्णय ही काफी होता है आपकी ज़िंदगी को स्वर्ग में बदल देने के लिए और एक पल का निर्णय ही काफी होता है आपकी ज़िन्दगी को बर्बाद कर नर्क बना देने के लिये। -10:30 a.m. अगर किसी का चूल्हा फोड़ोगे तो उसका पेट भी तुम्हे ही भरना पड़ेगा। उसकी पेट की आग में तुमको ही जलना पड़ेगा। उसकी भूख में तुमको ही मिटना पड़ेगा। तुम्हारा ...

परमसत्य की खोज...18 (Discovery of the absolute truth ... 18)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...18 19 दिसम्बर 2003 लोग... अपने अज्ञान को अपना ज्ञान, अपने दोष को अपना गुण, अपनी कमजोरी को अपनी शक्ति, अपने अहंकार को अपनी शक्ति, अपनी शक्ति को अपनी कमजोरी, अपनी अक्षमता को अपना दुर्भाग्य, अपनी कायरता को चालाकी, भय तथा कापुरुषता को अक्लमंदी, भगोड़ेपन को अपनी होशियारी, सापेक्षिक भ्रमों को अपनी खुशियां, जीवन की सच्चाई को दुःख, असत्य (माया) को सत्य, सच्चे आनंद को चमत्कार, तथा सत्य को असंभव मानते हैं। -8:40 a.m. आज फिर वही विचित्र शक्ति दौड़ रही है मेरे शरीर में। आज फिर वही शक्ति मेरे रोम-रोम को स्पंदित कर रही है। आज फिर मैं रोमांचित हो रहा हूँ उसी शक्ति के प्रवाह में। अनगिनत तरंगें उठ रही हैं मेरे हृदयस्थल से और विस्तृत होकर फैलती जा रही हैं, विलीन होती जा रही हैं मेरे शरीर के चारों तरफ, आभामंडल में। आज फिर मेरे ह्रदय से उठ रहा है शक्ति का भूचाल और ले जा रहा है मुझे किसी दूसरी दुनिया में। मेरे मस्तिष्क के प्रकम्पन मुझे एक यात्रा का आभास करा रहे हैं, मानों मैं अपने सूक्ष्म शरीर के साथ किसी और ही दुनिया में विचरण कर र...

परमसत्य की खोज...11 (Discovery of the absolute truth ... 11)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...11 12 दिसम्बर 2003 विगत रात्रि का स्वप्न - मैं अपने एक मित्र सरदार जी के साथ अपने झोपड़ीनुमा सादे-कच्चे से मकान में एक रस्सी वाली नंगी खाट पर बैठा हूँ और हम खाना खा रहे हैं। सामने पटे पर सूखी रोटी और एक प्लेट में चटनी रखी है। मैं उसे प्रेमपूर्वक और लेने का आग्रह करता हूँ।   सरदार जी ताना मारते हुए कहते हैं -"ओए! ये भी कोई आदमियों का खाना है, चल मेरे साथ मैं बताता हूँ तुझे, आदमियों का खाना कैसा होता है।" मैं कहता हूँ -"भैया, हम गरीबों का खाना तो ऐसा ही होता है, हमें इसी खाने में वो संतोष मिल जाता है जो तुम्हें छप्पन तरह के पकवानों में नहीं मिलता।" सरदार जी कहते हैं -" तू मेरी एक बात बस मान ले, मैं तुझे बेईमान बनने को भी नहीं कह रहा हूँ और न ही कोई गलत काम करने को कह रहा हूँ, बस तू मेरा ये गिफ्ट ले ले। इसमें तो तुझे कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए।" मैं मना करना चाहता हूँ पर वह मेरे मुंह पर हाथ रखकर मुझे रोक देता है और वह गिफ्ट छोड़कर चला जाता है। मैं उसे खोलकर देखता हूँ तो उसमें एक सोने की ईंट रखी हुई मिलती है। उस ...