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राज़... रात का... (Secret ... of the night...)


राज़... रात का...
उसने हर चीज़ के दो रूप बनाए...
हर सिक्के के दो पहलू बनाए...
दहकता सूरज बनाया तो चमकता चाँद भी बनाया...
ज़मीन बनाई तो आसमान भी बनाया...
नदियां बनाई तो पहाड़ भी बनाए...
बेजान पत्थर बनाए तो जज़्बातों से सराबोर इंसान भी बनाए...
फिर उसने इंसानी फितरत के भी दो रुप बनाए...
एक तो सच्चाई और भलाई का और दूसरा शैतानी बुराई का...
उसने दिन बनाए नेकी और सच्चाई को उभारने के लिए तो रातें बनाईं काले गुनाहों को रात की कालिख में छिपाने के लिए...
हर वो काम जो इंसान दिन के उजाले में करने से डरता है, रात के अँधेरे में आसानी से कर जाता है...
रात के अँधेरे में उसके अंदर सोया हुआ शैतान जाग जाता है...
हर वो काम जो इंसान को रात के अँधेरे में छिपकर करना पड़े और इंसान को कमजोर बनाए, गुनाह है...
-१७ मई २००२
परोपकारी हर परिस्थिति में परोपकार ही करते हैं चाहे कोई उनकी प्रशंसा करे चाहे बुराई। प्रशंसा या निंदा उनके कर्तव्य पथ को प्रभावित नहीं करती क्योंकि उनकी प्रकृति ही परोपकार करने की होती हैं। उनका अस्तित्व ही परोपकार करने के लिए बना होता है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार की एक फलदायी पेड़ हर परिस्थिति में फल देता है, चाहे कोई उसे प्रेम भरी दृष्टि से देखे, प्यार से सहलाए या उसे पत्थर मारे।
-३० मई २००२
Secret ... of the night...


He created two of everything...
Every coin has two sides created...
If shining sun is made so glowing moon is also created...
Ground is created so sky is also created...
Rivers are created so mountains are also created...
Lifeless stones created so man filled with feelings are also created...
Then he created two forms of the human spirit also...
One truth and goodness and second demonic evil...
He made a day to highlight righteousness and truth so made the night to hide the black sins in the soot of night...
The work which a person fears to do in daylight is made easily in the darkness of the night...
The sleeping devil inside him awakes in the darkness of night...
All those work which every human being have to do prowling at night and makes vulnerable a person, is a sin...
-17 May 2002

Altruistic do benevolence in every circumstance regardless of their praise or condemnation. Praise or condemnation does not affect their path of duty to charity because it is their nature. Their existence is made to charity. In the same manner as a fruitful tree gives fruit in every circumstance, whether seen in terms of love, caress with love or cast a stone.
-30 May 2002

Life is not just a tale full of suffering but a divine power too.
-2 In June 2002

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