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मैं और वो... (I and she...)


मैं और वो...
मैं- क्या तुम्हे लगता है कि ये फैसला तुमने ठीक लिया है? कभी कभी हम अपने फैसले जज़्बातों की रौ में आकर करते हैं और फिर पछताते रह जाते हैं।
वो- कभी-कभी फैसले हम नहीं करते, ज़िन्दगी करती है और हम खड़े देखते रह जाते हैं... शतरंज की बिसात पर मोहरों की तरह... हम चलते चले जाते है पर चाल ज़िंदगी की होती है... 
मैं- क्या तुम्हे लगता है कि तुम जीवन के इस मोड़ पर आकर मेरे साथ-साथ चल सकोगे? मैं तो हर कदम पर कई बार ठुकराया गया हूँ। दुनिया की भीड़ में कुचला गया हूँ...मेरा जीवन सिर्फ प्यास ही प्यास है, तड़प ही तड़प है, और कुछ नहीं, मैं तुम्हे क्या दे पाउँगा...?
वो- ये भी तो हो सकता है कि तुम मुझमे समा जाओ और मैं तुममे समा जाऊं और दोनों का वजूद एक-दूसरे के लिए  दरिया बन जाए और हम दोनों की प्यास बुझ जाए...
मैं- दो प्यासे एक-दूसरे की प्यास को बढ़ा तो सकते हैं मगर बुझा नहीं सकते और दो दरिया भी कभी एक साथ नहीं चल सकते। जो खुद प्यासा हो उसका वजूद क्या दूसरे के लिए दरिया बनेगा...?
वो- खैर! मैं तो शुरू से दुनिया के रिवाज़ों की पटरी पर रेल की तरह हूँ, जो चाहकर भी इससे जुदा नहीं हो सकती... 
मैं- और मैं... बचपन से ही खुले आकाश में उड़ने का आदी एक (उकाब) बाज की तरह... जो अपनी नज़र केवल अपनी मंज़िल पर रखता है... पर ये क्या? एक प्यासे की आँखों में आंसुओं का समंदर कैसा? सम्भालो इन्हे! कहीं ये बिखरकर दिल में रखे सपनों को चूर-चूर न कर दें...
 वो - सपनों का क्या! सपने हमेशा तो सच नहीं होते?
मैं - हाँ... ज़िन्दगी महज़ पूरी हो जाने वाली हसरतें ही नहीं, प्यास भी है...
वो - क्यूँ अपने आप को इतना तड़पाते हो? खयालों और फलसफों की दुनिया से बाहर आओ, इनमे प्यास और दुःख के सिवा कुछ भी नहीं...
मैं - अगर मेरी ज़िन्दगी में प्यास नहीं तो कुछ भी नहीं, तड़प नहीं तो कुछ भी नहीं...
वो - तो तुम्हे यूँ आवारा तमन्नाओं की तरह दरबदर भटकना क्या अच्छा लगता है...?
मैं - शायद...  हाँ! शायद... नहीं! कुछ कह नहीं सकता, फिर भी ज़िंदगी अब तक  तो भटकाव ही निकली... 
वो - तो क्यूँ न इस भटकाव को यहीं ख़त्म कर दें...
मैं - वो कैसे...?
वो - मैं तुम्हें और तुम मुझे अपनी मंज़िल मानकर...
मैं - तुम्हारी मंज़िल शायद मैं हो जाऊं पर मेरा सफर तुम पर ख़त्म नहीं होता... दो हमसफ़र एक साथ चलकर कभी भी अपनी-अपनी मंज़िलें नहीं पा सकते... मंज़िल पाने के लिए हमें अकेले ही चलना पड़ेगा... हक़ीक़त में 'हमसफ़र' शब्द ही ज़िंदगी के सफर में गलत है...वहां गिरने पर किसी के हाथों का सहारा नहीं मिलता... थक-हारकर चूर हो जाने पर किसी की गोद नहीं मिलती... धूप में झुलसने पर किसी के दामन का साया नहीं मिलता... लड़खड़ाते हुओं को किसी का आग़ोश नहीं मिलता... वहां हमसफ़र होती हैं - ठोकरें, सन्नाटे और तन्हाई...शायद तुम्हे मेरे पास से निराशा के सिवा और कुछ नहीं मिल सकता... कुछ भी नहीं... ओह्ह! कभी-कभी लगता है कि मैं इतना स्वार्थी क्यों हूँ ?
वो - आखिर तुम्हे मुझे अपना हमसफ़र मानने से इंकार क्यों है? तुम ऐसा क्यों समझते हो कि मैं तुम्हारे रास्ते की रुकावट हूँ ? हो सकता है कि मैं ही तुम्हे मंज़िल तक पहुँचाने में मदद करूँ...
मैं - दूसरों पर विश्वास करना अपने आप से छल है, फरेब है।  विश्वास अँधा है। दूसरों पर विश्वास ही तो सारे दुखों की जड़ है। आत्मविश्वास एक उपलब्धि है पर औरों पर विश्वास भुलावा है... अभी तुम्हे लगता है कि तुम्हारी और मेरी मंज़िल एक हो सकती है पर ये केवल दूरी का भ्रम है क्योंकि वर्तमान हमेशा वर्तमान नहीं रहता, हर आज को कल में बदल जाना होता है...जैसे-जैसे हम मंज़िल के करीब पहुंचेंगे, मंज़िलें अलग-अलग होती चली जाएंगी और हमें फिर या तो बिछड़ना होगा या भटकना पड़ेगा...पर मैं नहीं चाहता कि तुम मेरी खातिर अपनी मंज़िल छोड़ दो... और मैं तो अपनी मंज़िल किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ सकता...
वो - तो फिर इस कहानी का अंजाम क्या होगा?
मैं - अंजाम, ये भी हो सकता है कि हम अपनी-अपनी मंज़िल तक पहुंच जाएं और उन ऊंचाइयों को छू कर एक हो जाएं और ये भी हो सकता है कि राह पर कोशिश करते- करते फ़ना हो जाएं...
अच्छा दोस्त! अलविदा!
-२४ जुलाई २००२

I and she...


I - Do you think that you have taken the right decision? Sometimes we take our decision in the flow of emotions and then left to repent.
She- Sometimes the decisions are not taken by us, they are taken by the life and we left standing to see... Like pawns on the chess board... We go on to move but the move is followed by the life...
I- Do you think you will be able to move along with me after this turn of life? I've been kicked numerous times at every step. I was crushed in the rush of the world... My life is just a thirst, a yearning and nothing, what would I give you...?
She- It could also be that you get dissolve into me and I get dissolve into you and the existence of both could become a river for each other to quench the thirst both of us...
I- Two thirsty can raise each other's thirst but cannot quench and two rivers cannot go with ever. One who is thirsty himself, how will his existence become the river for the other...?
She- Well! Since childhood, I am like a train on the track of world's customs, which cannot be separated with it, even if I wish...
I- And ... I am like an eagle used to fly in the open sky since childhood... Who keeps his eyes on his destination... But what is this? How the sea of tears in the eyes of a thirsty? Control them! Do not they shatter the dreams lay inside the heart...
She - What of the dreams! Dreams are not always true?
I - Life is not just desires to be completed, the thirst also...
She - Why are you so torturing yourself? Come out of the world of thoughts and philosophies, there is nothing but thirst and pain...
I - Nothing in my life if not the thirst... nothing if not yearning...
She – Then do you like to wander hither and thither like stray desires...?    
I - probably ... yes! Maybe ... No! Cannot say, but life turned out so far only the deviation, nothing else...
She - So why not eliminate the deviation here...
I - How's that...?
She - I assume you and you assume me our destination...
I - Perhaps I might be your destination...But my journey does not end up on you... Two companions together can never go to their destinations. We'll have to walk alone... In fact the word ‘companion’ is wrong in the journey of life...One does not get the prop of any hands on falling there... When tired, defeated and shattered does not get anyone's lap... Sun-scorched does not get someone’s scarf’s shadow... wobbled do not get embrace of anyone... there companion are - dusting, silence and loneliness... perhaps you cannot get anything else except despair from me... nothing... Oh! Sometimes I think that Why I am so selfish?
She - After all why are you rejecting me as a companion? Why do you think I am your path interruption? Maybe I should help you to reach the destination...
I - Believe on others is maneuver to self, It is deceit. Faith is blind. Believe on others is the root of all suffering. Confidence is an achievement but believe to others is feint... Now you think that your and my destination might be one but it is only the illusion of distance because the present is not always present, every day is to be turned into the yesterday... As we come closer to the destinations, destinations will become individual and then we have to be separate or to be deviate from our destination... I do not want you to leave your destination for the sake of me...  And I cannot leave my destination at any cost ...
She - Then what will be the climax of the story?
I - The consequences, it can happen that we arrive to their destination and become one of those heights and maybe die down while trying on the way...
O. K. friend!Good Bye!
-24 July 2002

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