Skip to main content

सावधान ! शायद आपके अंदर भी छिपा है एक बम... (Beware! Probably you also have hidden a bomb inside...)


सावधान ! शायद आपके अंदर भी छिपा है एक बम...
अकेला आदमी एक विस्फोटक बम की तरह होता है बशर्ते वह अपने अंदर छिपी हुई क्षमता को पहचान ले। एक अकेले आदमी में इतनी क्षमता छिपी होती है कि वह सारी दुनिया में उथल-पुथल मचा सकता है। पदार्थ के सबसे छोटे भाग एक अकेले नाभिक में इतनी क्षमता होती है कि वह सारी दुनिया में तहलका मचा सकता है। समाज आदमी के इसी अकेलेपन के विस्फोट से डरता है, इसी अकेलेपन को ख़त्म करने के लिए तरकीबें जुटाता रहता है, एक अकेले आदमी को दुश्मन के नज़रिये से देखता है, उसके चारों तरफ नियमों, सीमाओं और बंधनों के मकड़जाल फैलाता है ताकि उसमे छिपी हुई शक्तियां इसी जाल से लड़ने और इनको तोड़ने में उलझकर ख़त्म होती चली जाएँ। जिस तरह एक शिकार खतरनाक शिकार को पकड़ने या मारने के लिए आकर्षक चारे का उपयोग करता है यह समाज व्यक्ति की अदृश्य विस्फोटक शक्तियों को मारने के लिए स्त्री अथवा पुरुष का चारे के रूप में प्रयोग करता है, एक अकेले पुरुष के साथ एक स्त्री को जोड़ देता है या एक अकेली स्त्री के साथ एक पुरुष को जोड़ देता है और फिर शुरू हो जाता है सामाजिक दायरों, नियमों, बंधनों और सीमाओं का कसाव, जो व्यक्ति की विस्फोटक क्षमता का हनन करने लगता है। यही कारण है कि हर एक क्रन्तिकारी, सन्यासी, वैज्ञानिक या नई चेतना लाने वाले को पहले सामाजिक दायरे तोड़ने पड़ते हैं और सामाजिक दायरे से बाहर आना पड़ता है। शायद इसीलिए हमारे आध्यात्मिक दर्शन में ब्रह्मचर्य को इतना महत्त्व दिया गया है।
-८ जून २००२
Beware! Probably you also have hidden a bomb inside...


A man is like an explosive bomb if he recognizes his ability hidden inside... There is the potential lie in a man alone that he can be upheaval cause in the world. The smallest part of the substance, a single nucleus has the potential to produce the panic in the entire world. The society is afraid of that explosion of the loneliness of a man, raises the tricks to eliminate that loneliness, sees a single man in enemy's point of view, spreads hassle of navigating through rules, limitations and bonds around him so that his hidden powers may vanish in fighting and breaking the trap... As a hunter uses attractive fodder to capture or kill a dangerous prey, the same way the society uses a woman or a man as fodder to kill the invisible explosive powers of a man, adds a woman with single guy or adds a man a single woman and then begins impaction of the social sphere, regulations, bonds and limitations, which abuses the explosive ability of a person. That is why every single revolutionary, ascetic, scientific or bringer of a new consciousness has to break social circle first and have to come out of the social circle. Maybe, that's why so much importance is given to celibacy in our spiritual philosophy.
-8 June 2002

Comments

Popular posts from this blog

परमसत्य की खोज...16 (Discovery of the absolute truth ... 16)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...16 17 दिसम्बर 2003 यदि सच्ची सफलता चाहते हो तो कड़े से कड़ा अनुशासन अपनाना पड़ेगा। संघर्षो के कष्टों को झेलना पड़ेगा। जितना अधिक संघर्ष करोगे, जितना अधिक कष्ट झेलोगे, उतनी ही शीघ्र आगे बढ़ोगे, उतने ही लक्ष्य के समीप पहुंचोगे। संघर्षों से खुद को बचाने वाले और किस्मत के भरोसे बैठे रहने वाले कभी सच्ची सफलता नहीं पा सकते, उन्हें सिर्फ दूसरों की सफलता की जूठन मिल सकती है। गलत तरीके से तथा दूसरों के सहारे मिली सफलता ज्यादा दिनों तक ख़ुशी तथा संतुष्टि नहीं दे सकती, वह तो मरे हुए शिकार के समान होती है। मरा हुआ शिकार लोमड़ी को ही प्रसन्न कर सकता है, शेर को नहीं। मरा हुआ शिकार तथा दूसरों की जूठन शेर के किसी काम की नहीं होती। -10:15 a.m. एक पल का निर्णय ही काफी होता है आपकी ज़िंदगी को स्वर्ग में बदल देने के लिए और एक पल का निर्णय ही काफी होता है आपकी ज़िन्दगी को बर्बाद कर नर्क बना देने के लिये। -10:30 a.m. अगर किसी का चूल्हा फोड़ोगे तो उसका पेट भी तुम्हे ही भरना पड़ेगा। उसकी पेट की आग में तुमको ही जलना पड़ेगा। उसकी भूख में तुमको ही मिटना पड़ेगा। तुम्हारा ...

परमसत्य की खोज...18 (Discovery of the absolute truth ... 18)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...18 19 दिसम्बर 2003 लोग... अपने अज्ञान को अपना ज्ञान, अपने दोष को अपना गुण, अपनी कमजोरी को अपनी शक्ति, अपने अहंकार को अपनी शक्ति, अपनी शक्ति को अपनी कमजोरी, अपनी अक्षमता को अपना दुर्भाग्य, अपनी कायरता को चालाकी, भय तथा कापुरुषता को अक्लमंदी, भगोड़ेपन को अपनी होशियारी, सापेक्षिक भ्रमों को अपनी खुशियां, जीवन की सच्चाई को दुःख, असत्य (माया) को सत्य, सच्चे आनंद को चमत्कार, तथा सत्य को असंभव मानते हैं। -8:40 a.m. आज फिर वही विचित्र शक्ति दौड़ रही है मेरे शरीर में। आज फिर वही शक्ति मेरे रोम-रोम को स्पंदित कर रही है। आज फिर मैं रोमांचित हो रहा हूँ उसी शक्ति के प्रवाह में। अनगिनत तरंगें उठ रही हैं मेरे हृदयस्थल से और विस्तृत होकर फैलती जा रही हैं, विलीन होती जा रही हैं मेरे शरीर के चारों तरफ, आभामंडल में। आज फिर मेरे ह्रदय से उठ रहा है शक्ति का भूचाल और ले जा रहा है मुझे किसी दूसरी दुनिया में। मेरे मस्तिष्क के प्रकम्पन मुझे एक यात्रा का आभास करा रहे हैं, मानों मैं अपने सूक्ष्म शरीर के साथ किसी और ही दुनिया में विचरण कर र...

परमसत्य की खोज...11 (Discovery of the absolute truth ... 11)

  ( अंतर्यात्रा) परमसत्य की खोज...11 12 दिसम्बर 2003 विगत रात्रि का स्वप्न - मैं अपने एक मित्र सरदार जी के साथ अपने झोपड़ीनुमा सादे-कच्चे से मकान में एक रस्सी वाली नंगी खाट पर बैठा हूँ और हम खाना खा रहे हैं। सामने पटे पर सूखी रोटी और एक प्लेट में चटनी रखी है। मैं उसे प्रेमपूर्वक और लेने का आग्रह करता हूँ।   सरदार जी ताना मारते हुए कहते हैं -"ओए! ये भी कोई आदमियों का खाना है, चल मेरे साथ मैं बताता हूँ तुझे, आदमियों का खाना कैसा होता है।" मैं कहता हूँ -"भैया, हम गरीबों का खाना तो ऐसा ही होता है, हमें इसी खाने में वो संतोष मिल जाता है जो तुम्हें छप्पन तरह के पकवानों में नहीं मिलता।" सरदार जी कहते हैं -" तू मेरी एक बात बस मान ले, मैं तुझे बेईमान बनने को भी नहीं कह रहा हूँ और न ही कोई गलत काम करने को कह रहा हूँ, बस तू मेरा ये गिफ्ट ले ले। इसमें तो तुझे कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए।" मैं मना करना चाहता हूँ पर वह मेरे मुंह पर हाथ रखकर मुझे रोक देता है और वह गिफ्ट छोड़कर चला जाता है। मैं उसे खोलकर देखता हूँ तो उसमें एक सोने की ईंट रखी हुई मिलती है। उस ...