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सत्य की खोज...4 (Discovery of the truth ... 4)


(अंतर्यात्रा)

सत्य की खोज...4

१८ नवंबर २००३, मंगलवार

किताबों से हमें हमारे विचारों को सजाने संवारने के लिए शब्दों के कपडे मिलते हैं पर ध्यान रहे, ये कपडे किसी की उतरन न हों। कहीं दूसरों के विचार ही आपके अपने विचार न बन जाएं, कहीं आपके विचारों की मौलिकता ख़त्म न हो जाए। आपके विचार आपके स्वयं के अनुभव हों, किसी और के नहीं।
-८:०५ a.m.

मुझे सुख की परिभाषा एक बार फिर ढूंढनी होगी क्योंकि अब तक जो मेरे लिए सुख था अब वह मेरे लिए झूठ है, भ्रम है। अब तक मैं भ्रम में जी रहा था, झूठ को सच समझकर, परन्तु अब मेरे लिए पुरानी खुशियां किसी बच्चे की सपने की मिठाई की तरह निरर्थक हैं, बेकार हैं क्योंकि मैं भ्रम से जाग चुका हूँ। मेरा सपना टूट चुका है।
भ्रम सदैव सुखद होता है क्योंकि हमारी कल्पना के अनुरूप होता है परन्तु सत्य हमारे अनुरूप नहीं होता बल्कि उसे जैसा होना होता है, वैसा ही होता है  इसलिए सत्य सुखद नहीं होता।
किसी भ्रम को सत्य मानकर जीना सरल है परन्तु किसी सत्य को भ्रम नहीं माना जा सकता।
-८:४५ a.m.

खोना भ्रम है पाना सत्य।
कहाँ तो मैं निकला था सत्य की खोज में और कहाँ वास्तविकता ही स्वप्न बनकर रह गई।
-९:३० a.m.

सभी धर्मों के धर्मग्रंथों का अधिकांश भाग काल्पनिक है, कल्पना पर आधारित है क्योंकि कल्पनाशीलता के बिना सृजन में सुंदरता नहीं आ सकती इसलिए इनके रचयिताओं ने इन्हे रचने के लिए कल्पनाओं का आश्रय लिया। साहित्य के लोकप्रिय होने की कसौटी है, उसमे किसी अचम्भे या कुतूहल का वर्णन, जो कल्पनातीत हो, कल्पना से परे हो, तभी साहित्य मजेदार, रोमांचक और लोकप्रिय बनता है। नीरस सत्य कभी भी लोकप्रिय नहीं हो सकता क्योंकि लोग सत्य नहीं आनंद पाना चाहते हैं इसलिए सभी धर्मों के धर्मग्रंथों में इस तरह के विस्मय और अचम्भों वाली घटनाओं का मसाला डाला गया है, ये अतिशयोक्तियां या तो इन्हे रोमांचकारी बनाने के लिए डाली गई या प्रतीकात्मक रूप में किसी तर्क अथवा तथ्य को रखने के लिए। इससे इनकी लोकप्रियता और आस्था सुरक्षित हो गई। पर इन अतिशयोक्तियों से लोगों का लाभ कम, नुकसान अधिक हुआ है। सबसे बड़ा नुकसान यही है कि लोग इन्ही में उलझ कर रह गए और अब सत्य को जानना ही नहीं चाहते, सत्य इन लोगों के लिए अग्राह्य हो चुका है।
-१०:३० a.m.

जीवन एक नाटक से बढ़कर कुछ नहीं, लेकिन ये किसके इशारे पर हो रहा है?

क्या आप परमसत्य को पाना चाहते हैं? सत्य को जानना चाहते हैं? तो जान लें कि सत्य केवल एक प्रश्न है जिसका उत्तर आपको स्वयं ढूंढना है। किसी और का उत्तर आपके किसी काम का नहीं।

झूठी आशाएं जितनी जल्दी टूट जाएं, उतना अच्छा।
-११:१० a.m.

नारी पुरुष की आत्मिक प्रगति में बाधक है, लेकिन ये नारी का दोष नहीं बल्कि उस पुरुष का दोष है कि वह अनियंत्रित होकर फिसल जाता है। गति अवरोधक तो गति को नियंत्रित करने के लिए बनाए जाते हैं।
-११:३० a.m.

दुनिया ने मेरी योग्यता को मेरी अयोग्यता माना, कोई आश्चर्य नहीं, पर घोर आश्चर्य कि दुनिया मेरी अयोग्यता को मेरी योग्यता मान रही है।
-११:५० p.m


Adventure of the Truth…

Discovery of the truth ... 4
November 18, 2008, Tuesday

We get clothes of words from books to enhance and decorate our ideas. But keep in mind that these clothes should not be worn clothes of others. Lest others thoughts may become your thoughts. Lest ideas you have may lose its originality. Your thoughts should be your own experiences, not someone else's.
-8: 05 p.m.
I have to seek the definition of happiness once again, because so far which was pleasure for me now it is untrue, it is a delusion to me. By now I was living in illusion, I was supposing truth to the untrue, but now the old joys are like a sweet of a child's dreams for me, meaningless, useless because I've woken up from the illusion. My dream has broken.
Confusion is always pleasant because it is always consistent to our imagination, but reality does not suit us, but it happens as it is to be, that’s why the truth is not pleasant.
It is simple to live assuming truth to a delusion No truth can be considered as confusion
-8: 45 p.m.
It is an illusion that we have lost, the truth is that we always get something.
There I went to search the truth but here reality became a dream.
-9: 30 a.m.
Much of the scriptures of all religions are fictional, these are based on imagination because without imagination beauty cannot come in the creation therefore creators relied on the fantasies to create them. The criterion of a literature to be popular is to include a surprise or curiosity in it, which should be unthinkable, unimaginable, only then literature can be funny, exciting and popular. Monotonous truth can never be popular because people do not want to get the truth but the joy therefore in the scriptures of all the religions such spice of events of amusement and amazement is poured. These exaggerations are put either to make them thrilling or to put any argument or fact in symbolic form. This has made their popularity and faith secured. But these exaggerations made more disadvantage than advantage to the people. The biggest disadvantage is, they got entangled in these exaggerations and now do not want to know the truth; the truth has become inadmissible for the people.
-10: 30 a.m. 
Life is nothing more than a drama, but at whose gesture it is happening?
Do you want to get the absolute truth? Want to know the truth? Then know that the truth is only a question and you have to seek its answer yourself. And any other’s answer is useless for you.
The sooner the false hopes may break the better.
-11: 10 a.m.
Woman is obstacle in man's spiritual progress, but it’s not the woman's fault but the fault of the man that he slips by getting uncontrolled. While speed breakers are made to control the speed.
-11: 30 a.m.
The world has recognized my disqualification as my ability, no wonder, but what a wonder the world is assuming my ability to my ineptitude.
-11: 50 p.m.





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