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पृष्ठभूमि... (Background...)


आज के योगी की आत्मकथा भाग - दो
(अंतर्यात्रा)
पृष्ठभूमि...
अपने और उस तीसरी अज्ञात शक्ति (प्रकृति या ईश्वर?) के अस्तित्व को जानने के प्रश्न तो बहुत अल्पायु से ही उठते रहे मेरे मन में, पर इन प्रश्नों को सही दिशा नहीं मिल पाई और मैं भटकता रहा किताबों में, मंदिरों में, पाषाण-प्रतिमाओं में, उस परम शक्ति को जानने के लिए। कभी-कभी *मर्कट (क्षणिक) वैराग्य भी उत्पन्न हो जाता था, जो थोड़ी देर में चला भी जाता था और मैं इसी दुनिया में रमकर रह जाता था।
मेरे प्रश्नो और मेरे प्रयासों ने सही दिशा और सही प्रबलता पाई गुवाहाटी-दादर एक्सप्रेस में हुए उस पैशाचिक कृत्य और उसके बाद हुए नर-संहार से। वहां हुए अन्याय और अत्याचार ने मेरे भावुक मन को झिंझोड़ कर रख दिया, मेरे अस्तित्व को हिलाकर रख दिया। और मेरे प्रश्न जहरीले बाण बन गए जो मुझे हर समय छेदते रहे और मेरे घावों को कुरेद-कुरेद कर गहरा करते रहे। उस पर ईश्वर के अस्तित्व के प्रश्न ने इन घावों पर तेजाब का काम किया और मैं छटपटा उठा, बिलबिला उठा, व्याकुल हो उठा। मेरे मन ने उसी समय से इस झूठे ईश्वर के अस्तित्व को मानने से इंकार कर दिया। मेरा मन विद्रोह कर उठा उस झूठे ईश्वर से,दुनिया के झूठे उसूलों से, प्रवंचना से और मैं ढूंढने लगा कि अगर ईश्वर नहीं है तो फिर वह कौन सी शक्ति है जो सारी सृष्टि का संचालन कर रही है। वह कौन सी शक्ति है जो एक माँ की तरह पोषण कर रही है। उस दिन से शुरू हो गई उस शक्ति की खोज और इसी के साथ शुरू हुआ सत्य की खोज का ये सिलसिला...  
इसे मेरे चिंतन की खोज नहीं कहिये, ये मेरे जीवन की खोज है। सत्य मेरे चिंतन का परिणाम नहीं, जीवन का परिणाम है। सत्य पर मैंने विचार नहीं किया , वरन सत्य को जिया है। सत्य पर मैंने विचार नहीं किया, वरन  सत्य को जिया है और इस तरह  जिया है कि मेरे खून की एक एक बूँद सत्य बन गई , मेरी एक-एक सांस सत्य बन गई। मेरा मन, मस्तिष्क, मेरी आत्मा, मेरे शरीर का अंग-प्रत्यंग सत्य हो गए, तब कहीं जाकर साक्षात्कार हुआ है मेरा शक्ति से और फिर हुआ सत्य का ये विस्फोट...

*एक बन्दर का बच्चा जब बाढ़ में डूबने पर मर जाता है तब उसकी माँ उसे अपने गले से लिपटाए यहाँ वहां घूमती रहती है। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वह उसे किसी कीमत पर नहीं छोड़ेगी पर जब पानी उसके गले तक आ पहुँचता है तब वह अपने उस मरे हुए बच्चे को अपने पैरों के नीचे डालकर उस पर खड़ी होकर अपने आप को बचाने की कोशिश करने लगती है।

Autobiography of a modern yogi part – II
Adventure of the Truth…
Background...
The questions to know the existence of self and the third unknown force (nature or God?) were rebelling in my mind from a very tender age, but these questions could not get the right direction and I kept wandering in books, temples, stone statues to know the ultimate power. Sometimes *monkey (transient) quietude also generated, which went in a while, and I got entangled in this world.
My questions and my efforts found the right direction and the right intensity when I came to know about the Guwahati-Dadar Express fiendish acts, which led a huge massacre. The injustice and oppression shook my emotional mind, it shook my existence. And my questions became poisonous arrows which kept piercing my wounds all the time and kept deepening by scratching them. And on that the question of the existence of God acted like an acid on the wounds and I writhed in agony. My mind refused to accept the existence of this false god from that time. My mind revolted from the false gods, false principles of the world, from trickery and I started to search that if God is not here, then what is the power which is operating the whole universe. What is the power that is nurturing like a mother? That day began with the discovery of the power and that led this sequential search of the truth...
Don't say that it is a search of my thinking; it is the search of my life. Truth is not the result of my thinking but is the result of life. I did not think of the truth rather I have lived it and I have lived it such a way a single drop of my blood became the truth; my each breath has become truth. My heart, my brain, my soul, each of my body's organs has become the truth and then I realized the power and then somewhere truth exploded...

*when a baby monkey dies in flood, her mother wander here and there embracing it letting that it is not died. It seems she does not leave it at any cost but when the water comes to her neck, she puts the dead baby monkey under her feet and stands on it to save herself.

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