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फरेब-ए-वफ़ा... ज़िंदगी... (Life... The deceit of dedication)


फरेब-ए-वफ़ा... ज़िंदगी...
ऐ ज़िंदगी! तूने मेरे साथ कैसे-कैसे खेल खेले हैं? जिस पर यकीन किया, वो दग़ा दे गया और जिस पर यकीन नहीं किया, जिसको अपनी ज़िंदगी से दूर करने की कोशिश करता रहा... जिससे दूर भागता रहा...वही मसीहा निकला... उसी ने मेरे ज़ख्म सहलाए...वही हमदर्द निकला... उसकी दर्द में डूबी हुई फ़रियाद को मैं नफरत और बदले की आग समझता रहा... उसके आंसुओं के सैलाब को मैं झूठ और फरेब समझता रहा... 
हाय री अक्ल! मुझे तुझ पर कितना नाज़ था... मुझे तुझ पर बदगुमानी थी...जहाँ खुद को जोड़ना चाहा, वहां से तूने तोड़ दिया और जहाँ से टूटना चाहा, वहां इस कदर बाँध दिया कि जिंदगी भर कोशिश करूँ तो भी उन नाजुक जज्बाती रिश्तों से खुद को अलग नहीं कर सकता...
ऐ ज़िंदगी! बता ये तेरे कैसे खेल हैं..? उम्र को दांव पर लगा कर भी तेरे दांव समझ नहीं पाया...जीत मिली तो हार के सदमे ग़म के समंदर में डुबोते रहे...
ऐ ज़िंदगी! बता, ये तेरे कैसे खेल हैं..? झूठी उम्मीदों के सहारे उम्र कटती रही... और मैं खुद को पराई आस पर बहलाता रहा... अब तो तूने ख्वाबों की सिपर (ढाल) भी डाल दी है... हक़ीक़त के जहर बुझे खंजर आते हैं, यादों के जहर बुझे खंजर आते हैं और दिल को छेदते हुए निकल जाते हैं...
- ८ नवंबर २००२



Life... The deceit of dedication
O life! What games have you played with me? One who is believed, he betrayed and one who did not believed, one whom I tried to get away from my life... by whom I tried to protect myself continuously... From whom I ran away ... It was he who was the Messiah in my life... It was he who caressed my wounds... He was the sympathizer... I was considering his hate and fire of revenge to his complaint immersed in pain... I was considering his lies and deceit to his swamped tears...
Alas the sense! How I had proud of you... I was suspicious at you... Where I wanted to tie myself, you broke away and from where I wanted to rupture; there I was so tied that even if I try whole life I cannot separate myself from those fragile emotional relationships...
O life! Tell, what games are you playing...? Even putting the age at stake did not understand your bets... If victory is found then shocks of defeat immersed in a sea of sorrow...
O life! Tell, what games are you playing...? With the support of false hopes the age was passing...  And I was cajoling myself on a strange hope...  So now you have dropped shield of the dreams... The poisoned daggers of the reality comes to me, the poisoned daggers of memories comes to me and go forth with heart penetratingly...
-8 November 2002

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