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तृष्णा... (Craving...)


तृष्णा...
/ आधी रात का वक़्त...
चारों ओर सुनसान अंधेरा...
बाहर चारों तरफ चीखती ख़ामोशी...
और अंदर...
हलचल, कोलाहल और भूचाल...
मैं जाग रहा था... और जाग रही थी, पेट की क्षुधा...
मैं भूख से छटपटा रहा था...
और अंतड़ियां कीड़ों की तरह कुलबुला रहीं थी...
बादलों पर उभरा हुआ चाँद तवे पर सिकती हुई रोटी की तरह नजर आ रहा था...
मैं जान गया, ये उदर पिपासा है...
पेट की आग है... जो सब कुछ अपने अंदर जला देने के लिए आकुल है... 
मैं जान गया और मिटा ली अपनी उदर पिपासा...

/   अगले दिन...
आधी रात का वक़्त...
चारों ओर सुनसान अँधेरा...
चारों तरफ फिर वही गहरी झील सी ख़ामोशी...
और अंदर वही हलचल... वही कोलाहल...
आज उदर पिपासा शांत थी पर भूख फिर भी जाग रही थी... 
पेट की  भूख  नहीं... शरीर की भूख...
वासनाएं चीत्कार कर रहीं थीं...
दिल-दिमाग और जहन एक जुट होकर चीखे चले जा रहे थे-
'काम पिपासा...! काम पिपासा...!'
हवस दबाने पर और भड़कती जा रही थी...
उफ़! कैसा उन्माद था...
कैसा पागलपन था...
लगता था सारी दुनिया एक ही बिंदु पर सिमट आई है...
अब भी चाँद आसमान से झांक रहा था...
पर उसमे प्रियतमा के चेहरे का सौंदर्य झलक रहा था...
कैसी मादकता थी उस चाँद में !
चाँद ही नहीं, दुनिया की तमाम चीजें प्रेयसी के हुस्न के रूप में उभर कर आ रहीं थीं...
कहीं रक्तिम कपोल (गाल) नजर आते थे... तो कहीं गुलाबी होंठ...
कहीं तरसती हुई आँखें... कहीं बाँहें पसारे हुए हाथ...
तो कहीं सुराही का सा उसका समूचा बदन...
लगता था सारी कायनात ही उसके हुस्न में ढलती जा रही है...
और मैं जान गया कि ये काम-पिपासा है...
मैं समझ गया कि ये वह आग है, जिससे सारी दुनिया को अपने अंदर समां रखा है...
सारी दुनिया को अपने अंदर बांध रखा है...
सारी दुनिया इस भट्टी में जल रही है फिर भी इससे बाहर निकलने की बजाय अपने आप को जान-बूझ कर इसी में झोंके जा रही है...
और मेरी भी काम-पिपासा (काम-क्षुधा) शांत हो गई...

/ अगले दिन...
सुबह का वक़्त...
पंछियों की चहचहाहट के साथ सूरज की किरणों ने सारी प्रकृति को सुनहरे रंग में रंग दिया...
ओस की बूंदों ने पेड़-पौधों को अमृत रस में नहला दिया...
फूल और पत्तियां ताज़गी से खिल उठे...
मैंने आँखे खोलीं... पश्चाताप के पलों के साथ...
उनींदी आँखे... थके हुए पल... और आँखों के सामने बिखरा हुआ अतीत का घना कुहरा...
अंदर फिर वही व्याकुलता...
अंतर्चेतना में फिर एक भूख जगी...
और अंतर्चेतना बोल उठी-
' उठ! कब तक अतीत के गलियारों में मुंह छिपाकर सोता रहेगा...
कब तक अपनी आत्मा की अग्नि (पवित्रता) को पाप और दुर्बलता की राख से ढँकता रहेगा...
अपने अंतर्मन को झंकझोर दे...
और निकल पड़ अपनी आत्मा की तलाश में...
बदल दे अपनी सारी दुर्बलता और उदासी को अपनी अंतर्चेतना की शक्ति से...
भड़क उठने दे! अपने भीतर क्रांति की ज्वाला...
भस्म कर दे अपना अहम क्रांति की इस ज्वाला में...
और बदल डाल इस सारी दुनिया का नक्शा...
उठने दे अपने अंदर भावनाओं का तूफ़ान...
और डुबो दे! अपने आप को इस तूफ़ान में...
पहचान! अपने अंदर की विस्तीर्णता को...
संकीर्णता तो एक भ्रम है... एक बंधन है...
कब तक कालचक्र के पहियों में पड़ा पिसता रहेगा...
तोड़ दे! इन काल के बंधनों को...
और बन जा कालपुरुष...
आजाद हो जा इन भ्रमों से...'

/ ओह! कैसी विचित्र भूख थी वह...
कैसी विचित्र आग थी...
हाँ! मैंने जान लिया, यह ज्ञान-पिपासा है...

/  मैंने जान लिया... समूचे व्यक्तित्व का रहस्य...
मैंने जान लिया... सम्पूर्ण प्रकृति का रहस्य...
मैं जान गया कि उदर पिपासा, काम-पिपासा और ज्ञान पिपासा  तीनो एक चक्र में चलती रहती हैं...
जब उदर-पिपासा शांत होती है तो काम-पिपासा विचलित करने लगती है...
जब ये दोनों शांत हो जाती हैं तो ज्ञान-पिपासा उद्वेलित करने लगती हैं...
सारे जीवन भर व्यक्ति इन्हीं में उलझा रहता है...
और एक के बाद दूसरे को पूरी करते-करते अपना जीवन लुटाता जाता है,
यही तृष्णा है...
-२४ सितम्बर २००२

Craving...

/ Hour of midnight...
Deserted dark around...
Outside screaming silence all around...
And inside,
Bustle, clamor and temblor...
I was awake... and my abdominal app was waking...
I was restless in hunger...
And entrails had been rebelling like insects...
Embossed moon on clouds was looking like bread baking on a pan...
I knew, this is the abdominal app...
The fire burned in my stomach ... which is distressed for burning everything within...
I knew and quenched my stomach app...

/ Next day...
Time of midnight...
Dreary darkness around...
Again the deep lake like silence around...
And inside the same bustling... the same clamor...
Today stomach app was cool but hunger was still awake...
Not the stomach hunger...  It was the hunger of the body...
Sexual desires were screaming...
Mind and heart together were going on to scream-
'Lust...! Lust...! '
On suppressing the lust was flaring up...
Oops! How was hysterical...
What was madness...
It seemed that the whole world is reduced to a single point...
Still the moon was peeping from the sky...
But now the beauty of the face of the beloved was reflected inside it...
How the drunkenness in the moon!
Not only moon, the worldly things were coming emerged as beloved beauties...
Somewhere reddish cheeks were seen ... and somewhere pink lips...
Somewhere her yearning eyes... somewhere outstretched arms...
And somewhere her jug shaped entire body...
It seemed the whole universe is coming to an end in his beauty...
And I knew that this is the lust...
I understood that it is the fire, which has existed in the whole world...
The whole world is captivated within...
The whole world is burning in this furnace but instead of exiting from it, throwing them in it deliberately...
And my apps for lust subsided...

/ Next day...
The morning time...
With the chirping of birds, the rays of the sun colored all the nature in golden...
Dew drops washed the plants by nectar juice...
The flowers and leaves delighted with freshness...
I opened eyes... with moments of remorse...
Sleepy eyes...  Weary moments...  And a dense fog of the past, spread before the eyes...
Inside, the same distraction...
Again a hunger awake in inner consciousness...
And inner consciousness spoke out -
‘Arise! How long will you sleep hiding your face in the corridors of past...
How long you will cover the fire of the soul (purity) by the ashes of sin and weakness...
Make a whirlwind to your conscience...
And go in search of its soul...
Change your all weakness and sadness into the power of the inner consciousness...
Let flare-up! The flame of revolution within...
Let consume your ego in this fire of revolution...
And change the map of the whole world...
Let give a rise to storm of emotions inside...
Let drown! Yourself in this storm...
Identity! The extensiveness spread within...
Promiscuity is a fallacy ... is a bond...
How long will you crush lying in the wheels of time cycle...
Break! These bonds of the time cycle...
And be a man of the time...
Be free from such illusions ...’

/ Oh! How bizarre that hunger was...
What bizarre was the fire...
Yes! I got that, it was the thirst for knowledge...

/  I knew ... all the secrets of personality...
I got that ... the mystery of whole nature...
I knew that abdominal apps, thirst of lust and thirst for knowledge the three moves in a circle...
When the stomach apps are relieved thirst for the lust seems to be distracted...
If these two are calm thirst for knowledge begins to agitate...
All life a person indulges in these thirsts...
And squander the whole life in completing one after another
That is the craving...
-24 September 2002

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