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वियोग का योग... (Sum of the separation...)


वियोग का योग...

वियोग ही शाश्वत है, मिलन क्षणिक है। मिलन के आनंद की कल्पना असंभव है विरह के दर्द के बिना। मिलन की एकरसता बहुत जल्दी उबाऊ बन जाती है। वह वियोग ही है जिसके क्षणों में प्रेमी प्रेमास्पद से एकाकार हो जाता है और अपने अस्तित्व को उसके अस्तित्व में विलीन कर देता है। वह वियोग की ही पीड़ा है जिसकी भट्टी में तपकर भक्त ईश्वर को पा लेता है। 
देखने वाले को विरह एक पीड़ा प्रतीत होती है, एक वेदना प्रतीत होती है पर वास्तव में इस वेदना में वही आनंद छुपा होता है जो प्रसव वेदना में होता है। प्रेम में शारीरिक मिलन अथवा भौतिक मिलन का उतना महत्त्व नहीं है जितना कि उन अनुभूतियों का है, जो कि वियोग के क्षणों में होती है। ये अनुभूतियाँ व्यक्ति को सरलहृदयता और निष्कपटता की ओर प्रेरित करती हैं। इन अनुभूतियों के बिना प्रेम की कल्पना ही असंभव है।
वियोग ही प्रेम की संकीर्णता को विस्तीर्णता  में बदल सकता है। जब प्रेम कुछ पाना चाहता है तब वह संकुचित  होने लगता है और संकुचित होकर वासना में परिवर्तित होने लगता है पर जब प्रेम सब कुछ लुटाना चाहता है तब वह विस्तारित होने लगता है। प्रेमी अथवा प्रेमिका का वास्तविक रूप उतना आकर्षक नहीं होता जितना की आभासी रूप। वह आभासी रूप जो वियोग के क्षणों में प्रेमी की कल्पना में जन्म ले लेता है।
जिस तरह प्यास के बिना जल का अस्तित्व नहीं, उसी तरह वियोग के बिना मिलन का अस्तित्व नहीं।
-७ नवंबर २००३
जो बात को तौलकर नहीं बोलते, वे खुद तो शर्मिंदा होते ही हैं साथ ही दूसरों को भी शर्मिंदा करते हैं।
-९ नवंबर २००३

Sum of the separation...

Separation is eternal, union is transient. Pleasure of Union is impossible to imagine without the pain of separation. Monotony of union becomes boring very quickly. That is the separation only in the moments of which lover becomes a metaphor with his/her beloved and dissolve own existence into the existence of beloved. It is the pain of separation in the furnace of which devotee heat to attain God.
To the viewer the separation appears to be a pain but in fact, the joy hidden in the pain can be compare with the pain experienced in labor pains. In love, the physical union or the sexual intercourse is not as important as that of those feelings, which is experienced during the moments of separation. These sensations drive a person toward simple heartedness and sincerity. Without these feelings it is impossible to imagine the love.
Only separation can change the narrowness of love in the vastness. When love wants to get something it seems to be compressed and after compressing it converts into lust but when love wants to squander everything it seems to be extended. Actual form of lovers is not as attractive as the virtual form. The virtual image, that takes birth in the imagination of lovers in the moments of separation.
As the thirst does not exist without water, the existence of the union does not exist without separation.
-7 November 2003
Those who does not speak words weighing; they feel embarrassed himself as well as make others too embarrassed.
-9 November 2003

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