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मन के हारे हार है... (The losers have lost their mind...)


मन के हारे हार है...

हमारा मन एक ज़िद्दी बच्चे की तरह चंचल होता है, जो कहीं भी मचल जाता है। जो इसकी हर जायज-नाजायज मांग को मानकर इसे उन्मुक्त बनाते हैं, वे अस्थिर प्रवृत्ति के हो जाते हैं।  उनके अंदर भोग-लिप्सा जागने लगती है,जिससे उनका चारित्रिक पतन होने लगता है। जो इसकी हर बात न मानकर अपने विवेक से उचित-अनुचित का निर्णय कर इसे अपने वश में कर लेते हैं वे कालजयी हो जाते हैं और मन को काबू में करने की सबसे पहली सीढ़ी है - स्वादेंद्रिय पर नियंत्रण।
आवश्यकता से अधिक और ज्यादा स्वादिष्ट भोजन आलस्य और प्रमाद को जन्म देता है। हमारे अंदर काम-वासना को जगाता है इसलिए हमारे धर्म-ग्रंथों में उपवास पर अधिक जोर दिया गया है।
-२२ नवंबर २००२
कायरता भरे जीवन से साहसपूर्ण मौत अच्छी।
-२५ नवंबर २००२
यदि इस दुनिया में कोई सबसे बड़ा पाप है तो वो है किसी की मजबूरी का फायदा उठाना...
-३० जनवरी २००३ 
आदमी अपनी हीनता को छिपाने के लिए ही झूठे और बाहरी आडम्बर को ओढ़ता है।
-१६ मई २००३
सामान्यतः व्यक्ति अपनी गलतियों को अपना कौशल और अपनी असफलताओं तथा अक्षमताओं को अपना त्याग सिद्ध करना चाहता है।
-१३ अगस्त २००३
कैसी विडम्बना है, कैसा कटु सत्य है कि एक दिन अपने ही किसी अपने की मौत की कामना करते हैं। जब शरीर पर लगा कोई घाव सड़ जाता है, उसके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं होती तब यही श्रेयस्कर होता है कि शरीर के उस अंग को काटकर फेंक दिया जाए। जब परिवार का कोई सदस्य परिवार के लिए नासूर बन जाए तो उसका मर जाना ही बेहतर होता है।
-२२ अगस्त २००३
भूख, प्यास, भय, प्रेम, वासना, सेक्स, आदि का सम्बन्ध केवल वर्तमान परिवेश से ही नहीं होता। इनका अनुभव तो क्षुद्र से क्षुद्रतम कीड़े से लेकर बड़े से बड़े जानवर भी करते हैं। ये चीजें केवल समकालीन नहीं होतीं बल्कि जन्मजात होती हैं, इनका अनुभव सहजात प्रवृत्ति होता है। ये संवेदनाएं पूर्वजन्म के अनुभव पर आधारित होती हैं, तभी तो एक नवजात शिशु भी इन चीजों को अनुभव कर सकता है। ये जरूरी नहीं कि इनके प्रति आदमी की अनुभूतियाँ और प्रतिक्रियाएं केवल वर्तमान अनुभवों पर आधारित हों। इसलिए किसी कम आयु के व्यक्ति की इन प्रतिक्रियाओं को अनुभवहीन और आधारहीन मानना उचित नहीं...
-२३ अगस्त २००३
जो दूसरों के साथ छल करता है वह वस्तुतः अपने ही साथ छल करता है।
-१ सितम्बर २००३
प्राप्त करने में समर्थ होते हुए भी प्राप्त करने की कामना न करना अथवा उसकी ओर से विमुख हो जाना त्याग है, वैराग्य है किन्तु सामर्थ्य न होने पर विमुख हो जाना त्याग अथवा वैराग्य नहीं पलायन है, त्याग का ढोंग है, दुर्बलता है...
-९ सितम्बर २००३
वैराग्य की स्थिति भोग के बाद आती है बिना भोग-विलास के वैराग्य का कोई अस्तित्व नहीं। वैराग्य भोग की चरम सीमा है। त्याग वही कर सकता है जो भोग करने में सक्षम हो। किसी भिखारी को वैराग्य प्राप्त नहीं हो सकता। वैराग्य का रास्ता भोग-विलास से होकर जाता है किन्तु जो इनमे उलझ कर रह जाते हैं वे वैराग्य तक नहीं पहुँच पाते।
-१० सितम्बर २००३ 
अपने आपको अपनी अभिरुचियों में डुबो देना ही हसीन ज़िन्दगी जीने का राज है।


The losers have lost their mind...

Our mind is flickering like a stubborn child who grizzles anywhere. Who persuade with its every legitimate-illegitimate demand and make it unleashing, they tend to become unstable. Indulgence libido seems to be waking up in their inside, which seems to be the characteristic degradation in them. Who did not follow it’s insisted and decides justifications in their discretion and manages to tame it, they become classics and the first step to control mind is – Control on the taste sense.
More than necessity and more delicious food lead to laziness and mishit. It awakens lust in us. That’s why our religious texts emphasized much on fast.
-22 November 2002
Courageous death is better than a cowardly life.
-25 November 2002
The greatest sin in the world it is to take advantage of anyone’s compulsion...
-30 January 2003
Man enshrouds false and external ostentation to hide his inferiority.
-16 May 2003
Generally a person wants to prove his skills to his mistakes and his sacrifice to his failures and inabilities.
-13 August 2003
What an irony, what is the harsh reality that one day someone nearest wishes for the death for his near one. When wound on the body rots, there is no hope of its recovery, then that is better to cut and dump that part of the body. When a family member becomes a menace to the family, his death is better.
-22 August 2003

Hunger, thirst, fear, love, lust, sex, etc. are not related only with the current environment. These are experienced by the smallest worms to largest animals. These things are not only contemporary, but are born, their experience is congenital tendency. These sentiments are based on the experience of past life, and only if a newborn can experience these things. This is not necessary that a man's perceptions and responses to them are based on the current experience. Therefore it is not fair to consider naive and baseless the responses of any person under the age...
-23 August 2003
Deceit with others is literally deceit with own.
-1 September 2003
Despite being able to receive do not wish to receive or to become alienated from it is the sacrifice or mortification, but to be alienated in the absence of the power is not the scarification or mortification but retreat. It is the pretense of sacrifice, it is the infirmity...
-9 September 2003
The position of mortification comes after the luxury and enjoyment. The mortification does not exist without luxury and enjoyment. Mortification is the height of enjoyment. The same might be able to abandon who is able to live the life of luxury and enjoyment. A beggar cannot achieve mortification. But the path to mortification goes through indulgence. But those who get entangled in it, can never reach the mortification.
-10 September 2003
Dunk ourselves into our interests is the secret of living a beautiful life.

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